रायपुर और कनसिंघी की मिसालें सामने, नगर पंचायत की कार्यशैली पर उठा सबसे बड़ा सवाल

 
 
छुरा (गंगा प्रकाश)। दान – यह शब्द भारतीय संस्कृति में सबसे पवित्र माना गया है। भूदान आंदोलन से लेकर व्यक्तिगत पहल तक, हमारे समाज में सैकड़ों उदाहरण हैं जहाँ लोगों ने अपनी मेहनत और पुश्तैनी ज़मीन को समाज के लिए अर्पित कर दिया। इन दान की गई ज़मीनों पर आज अस्पताल, छात्रावास और जनसेवा के केंद्र संचालित हैं।लेकिन छुरा नगर पंचायत का हाल इन परंपराओं को शर्मसार करता है। स्व. जुगरी बाई ध्रुव द्वारा वर्ष 1985 में जनकल्याण हेतु दान दी गई भूमि पर निर्मित धर्मशाला आज दुकानों और गोड़ाउन में तब्दील कर दी गई है। यह न सिर्फ दानदाता परिवार, बल्कि पूरे समाज के विश्वास के साथ विश्वासघात है।

रायपुर का उदाहरण – भूदान से बना अस्पताल, हर दिन हजारों को जीवनदान

राजधानी रायपुर का उदाहरण सामने है। शहर के प्रसिद्ध दाऊ कल्याण सिंह ने अपने जीवनकाल में राज्य शासन को अपनी भूमि भूदान की थी। उस भूमि पर आज डी.के. हॉस्पिटल संचालित है, जहाँ हर दिन हजारों मरीज इलाज पाते हैं। यह न केवल दानदाता की महान भावना का जीवित उदाहरण है, बल्कि समाज और शासन की संवेदनशीलता का प्रमाण भी है।

कनसिंघी की मिसाल – छात्रावास हेतु दिया गया भूदान, आज भी संचालित

इसी तरह छुरा विकासखंड के ग्राम कनसिंघी में ग्राम मालगुजार लीलाधर ठाकुर ने तत्कालीन मुख्यमंत्री श्यामाचरण शुक्ल, कृष्णा कुमार दीक्षित और ग्राम प्रमुख की उपस्थिति में भूमि दान की थी। उद्देश्य था – शासकीय विद्यालय के पास छात्रावास का निर्माण। आज भी उस दान की गई भूमि पर छात्रावास संचालित है और सैकड़ों बच्चों का भविष्य संवार रहा है।

अनगिनत उदाहरण – जहाँ दान हुआ, वहाँ सेवा हुई

इतिहास गवाह है कि भूदान और परोपकार की भावना से दी गई भूमि को कभी भी व्यक्तिगत या व्यावसायिक हित के लिए प्रयोग नहीं किया गया। अस्पताल, छात्रावास, विद्यालय, धर्मशाला – इन सभी भवनों ने समाज को ही लौटाया है। लेकिन छुरा नगर पंचायत का मामला इन सभी मिसालों को ध्वस्त करता हुआ नज़र आता है।

छुरा की धर्मशाला – सेवा से व्यापार तक का सफर

वर्ष 1985 में जब छुरा ग्राम पंचायत था और युवराज ओंकार शाह सरपंच थे, तब स्व. जुगरी बाई ध्रुव ने सदर रोड स्थित कीमती भूमि दान दी थी। उस पर बनी धर्मशाला वर्षों तक राहगीरों का सहारा, ग्रामीणों की बैठक और सामाजिक आयोजनों का केंद्र रही। लेकिन जैसे ही छुरा नगर पंचायत बना, प्रशासन ने इस पवित्र स्थल को व्यापार का साधन बना डाला। धर्मशाला को दुकानों और गोड़ाउन में बदलकर किराये पर दिया जाने लगा।

दानदाता परिवार का आक्रोश – यह भूदान की आत्मा की हत्या है

परिजनों का कहना है कि उनकी माता-पिता और पूर्वजों ने इस भूमि को समाज की सेवा के लिए दान किया था। –  हमारे पुरखों ने धर्मशाला समाज को समर्पित की थी। आज वहां बोरे, गोड़ाउन और दुकानें हैं। यह जनहित के साथ धोखा और भूदान की आत्मा की हत्या है। – दानदाता परिवार।

हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट का स्पष्ट आदेश

कानून भी यही कहता है।
  •  मध्यप्रदेश हाईकोर्ट (2007) – दान या भूदान की गई भूमि का उपयोग केवल उसी उद्देश्य के लिए किया जा सकता है, जिसके लिए दी गई है।
  • सुप्रीम कोर्ट (2010, Public Trust Doctrine) – जनसेवा हेतु दी गई भूमि जनता की संपत्ति है, इसे निजी लाभ में नहीं बदला जा सकता।
  •  छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने भी कई मामलों में कहा है कि दान की गई भूमि का दुरुपयोग संविधान और समाज दोनों के साथ धोखा है।
इसलिए छुरा नगर पंचायत की कार्यवाही सिर्फ नैतिक ही नहीं, कानूनी अपराध भी है।

जनता का सवाल – जब बाकी जगह भूदान बचा, तो छुरा में क्यों बिक गया?

  • रायपुर में दाऊ कल्याण सिंह का भूदान अस्पताल बन गया।
  • कनसिंघी में लीलाधर ठाकुर का भूदान आज भी छात्रावास है।
  • अनेक जगह भूदान समाज के हित में उपयोग हो रहा है।
तो फिर छुरा में ही क्यों दान की गई भूमि पर दुकानों का खेल खेला जा रहा है? क्या नगर पंचायत की जिम्मेदारी सिर्फ व्यापार बढ़ाना है?

नगर पंचायत की चुप्पी टूटी – पर जनता को भरोसा नहीं

हमारे संवाददाता से चर्चा में सीएमओ यमन देवांगन ने कहा – मैंने विभागीय कर्मचारी को निर्देशित किया है कि दानदाता के मूल दस्तावेज़ और भवन की आबंटन प्रक्रिया की जानकारी जुटाई जाए। दस्तावेज़ आने के बाद आगे की कार्रवाई होगी। लेकिन जनता और दानदाता परिवार इसे समय टालने की चाल मान रहे हैं। उनका कहना है कि दस्तावेज़ पहले से ही उपलब्ध हैं और बहाने बनाकर मामले को लंबा खींचा जा रहा है।

जनता की चेतावनी – अब मौन नहीं, आंदोलन होगा

जनता ने साफ कहा है कि यदि धर्मशाला से व्यावसायिक कब्ज़ा तुरंत नहीं हटाया गया, तो आंदोलन की राह अपनानी पड़ेगी। – यह छुरा की आत्मा है। यदि भूदान का अपमान होगा, तो जनता चुप नहीं बैठेगी। – समाजसेवी।

छुरा को चुनना होगा रास्ता

रायपुर और कानसिंघी की मिसालें बताती हैं कि भूदान को सम्मान देने पर समाज को अस्पताल और छात्रावास जैसी धरोहरें मिलती हैं। लेकिन छुरा में नगर पंचायत ने इसे दुकानों और गोड़ाउन में बदलकर समाज के विश्वास की नींव हिला दी है।

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