गरियाबंद/फिंगेश्वर (गंगा प्रकाश)। धान कटाई के बाद देवी-देवताओं के आभार और खुशहाली के प्रतीक मड़ई महोत्सव की आड़ में फिंगेश्वर विकासखंड के गांव-गांव इस वक्त जो चल रहा है, वह संस्कृति नहीं बल्कि खुला अपराध है। मड़ई मेलों के शुरू होते ही पूरे इलाके में खड़खडि़या जुए का ऐसा जाल फैल चुका है, जिसने ग्रामीण समाज को हिला कर रख दिया है। जिस परंपरा का मकसद लोकसंस्कृति, मेल-मिलाप और उल्लास होता है, उसी मंच से अब लाखों नहीं, करोड़ों के दांव लग रहे हैं।
मंडाइयों के आसपास, खेतों के किनारे, जंगल से लगे इलाकों और सुनसान मैदानों में दिन-रात जुए के फड़ धधक रहे हैं। ढोल-नगाड़ों और सांस्कृतिक कार्यक्रमों की आवाज़ के बीच खड़खडि़या की खनखनाहट गूंज रही है। ग्रामीणों का कहना है कि इस बार हालात पहले से कहीं ज्यादा बेकाबू हैं। दिसंबर से फरवरी तक चलने वाला यह खेल अब सीमित नहीं रहा — इसमें दूर-दराज़ जिलों से पेशेवर जुआरी ट्रकों-कारों से पहुंच रहे हैं।
न दिन की परवाह, न रात का डर — कानून मानो गांवों से गायब है।

बिना संरक्षण कैसे संभव?
ग्रामीण इलाकों में अब सबसे बड़ा सवाल यही गूंज रहा है कि इतनी बड़ी अवैध गतिविधि आखिर किसके संरक्षण में चल रही है? सूत्रों के मुताबिक मेला शुरू होने से पहले ही कई जगह “सेटिंग” हो जाती है। मोटी रकम पहुंचाई जाती है, जिम्मेदार आंखें मूंद लेती हैं और फिर पूरे मड़ई सत्र में जुआ निर्बाध चलता है। शिकायतें होती हैं, खबरें पहुंचती हैं, लेकिन जमीन पर कार्रवाई नदारद है। यही वजह है कि जुआ संचालकों के हौसले बुलंद हैं और फड़ों का नेटवर्क लगातार फैलता जा रहा है।
परजीवी पत्रकारों की एंट्री!
इस अवैध धंधे में एक और खतरनाक परत जुड़ चुकी है। सोशल मीडिया पर वायरल हो रहे कुछ फोटो और वीडियो में कुछ कथित “परजीवी पत्रकार” खड़खडि़या संचालकों से बातचीत करते नजर आ रहे हैं। स्थानीय लोगों का आरोप है कि ये लोग मीडिया मैनेजमेंट के नाम पर फड़ों पर पहुंचते हैं, खबर दबाने या अनुकूल कवरेज देने के बदले पैसे की मांग करते हैं। इससे न सिर्फ जुए को परोक्ष सुरक्षा मिल रही है, बल्कि ईमानदार पत्रकारिता की साख भी कटघरे में खड़ी हो गई है।
ग्रामीणों का साफ कहना है — अगर ऐसे चेहरे मीडिया की आड़ में दलाली करेंगे, तो अपराधियों का मनोबल टूटेगा नहीं, और बढ़ेगा।

घर टूट रहे, भविष्य बर्बाद हो रहा
खड़खडि़या अब सिर्फ खेल नहीं रहा, यह गांवों की बर्बादी का कारण बनता जा रहा है। कई घरों की शांति लुट चुकी है। मेहनत की कमाई कुछ ही घंटों में फड़ों पर उड़ रही है। कर्ज बढ़ रहा है, घरेलू झगड़े, मारपीट और तनाव के मामले सामने आ रहे हैं।
सबसे डरावनी तस्वीर युवाओं की है। बड़ी संख्या में युवक इस लत की गिरफ्त में फंसते जा रहे हैं। मड़ई देखने के बहाने बच्चे और किशोर फड़ों के आसपास मंडराते दिख रहे हैं। सामाजिक कार्यकर्ताओं का कहना है कि अगर अभी नहीं रोका गया, तो आने वाली पीढ़ी को इसका खामियाजा वर्षों तक भुगतना पड़ेगा।
संस्कृति नहीं, साजिश बनती मड़ई
मड़ई ग्रामीण संस्कृति की आत्मा है। यह देवी-देवताओं के प्रति आभार, भाईचारे और उत्सव का प्रतीक है। लेकिन खड़खडि़या ने इस पवित्र परंपरा को जुए का ब्रांड एम्बेसडर बना दिया है। अब गांवों में चर्चा ढोल-नगाड़ों की नहीं, फड़ों की रकम और जुआरियों के ठिकानों की हो रही है।
गांवों का अल्टीमेटम
अब गांवों से साफ और तीखी आवाज उठ रही है — खड़खडि़या जुए पर तुरंत प्रतिबंध लगे,फड़ संचालकों की गिरफ्तारी हो,संरक्षण देने वालों को बेनकाब किया जाए,मीडिया मैनेजमेंट के नाम पर घूमने वालों पर भी कार्रवाई हो,मड़ई स्थलों पर स्थायी पुलिस निगरानी तैनात की जाए
ग्रामीणों का कहना है कि अगर इस बार भी प्रशासन ने आंख मूंद ली, तो हर साल मड़ई के साथ जुए का यह जहर और गहराई तक गांवों में उतरता जाएगा — और फिर संस्कृति नहीं, सिर्फ तबाही बचेगी।

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