“न्याय या अन्याय? हाईकोर्ट का चौंकाने वाला फैसला- ‘प्राइवेट पार्ट्स छूना रेप नहीं : ‘ देशभर में आक्रोश, सुप्रीम कोर्ट से हस्तक्षेप की मांग तेज़!”…

 

नई दिल्ली (गंगा प्रकाश)। भारत की न्यायपालिका से एक ऐसा बयान आया है जिसने पूरे देश को हिला कर रख दिया है! इलाहाबाद हाईकोर्ट के एक जज ने फैसला सुनाते हुए कहा कि पीड़िता के प्राइवेट पार्ट्स को छूना और पायजामी की डोरी तोड़ना “बलात्कार या बलात्कार की कोशिश” के अंतर्गत नहीं आता! इस बयान ने जनता, महिला संगठनों और कानूनी विशेषज्ञों को झकझोर दिया है।

अब सवाल उठ रहा है – क्या यह न्याय है या अपराधियों को बचाने की साजिश? क्या इस फैसले के बाद यौन उत्पीड़न करने वालों को खुली छूट मिल जाएगी?

पूरे देश में गुस्सा, सड़क से संसद तक बवाल

इस फैसले के खिलाफ लोगों का गुस्सा उबल पड़ा है। सोशल मीडिया पर #ShameOnJudiciary और #JusticeForVictims जैसे हैशटैग ट्रेंड कर रहे हैं। हजारों लोग सुप्रीम कोर्ट से इस फैसले पर तुरंत दखल देने की मांग कर रहे हैं। दिल्ली, मुंबई, लखनऊ, कोलकाता और पटना में विरोध प्रदर्शन शुरू हो चुके हैं। कई महिला संगठनों ने हाईकोर्ट के इस फैसले को “न्याय का मजाक और अपराधियों को खुला लाइसेंस” करार दिया है।

सुप्रीम कोर्ट पहले भी दे चुका है कड़ा संदेश, फिर हाईकोर्ट क्यों भटक रहा है

 यह पहली बार नहीं है जब किसी हाईकोर्ट के विवादित फैसले ने जनता को निराश किया हो। पिछले साल सुप्रीम कोर्ट ने कलकत्ता हाईकोर्ट को जमकर लताड़ लगाई थी, जब उसने पॉक्सो (POCSO) के तहत आए एक यौन शोषण मामले में ‘समझौते’ जैसी बातें की थीं। सुप्रीम कोर्ट ने तब कहा था – “कोई अपराध अगर कानून के तहत दंडनीय है, तो उसे रोमांटिक रिश्ता कैसे कहा जा सकता है?” अब सवाल यह है कि क्या सुप्रीम कोर्ट इलाहाबाद हाईकोर्ट के इस फैसले को भी खारिज करेगा? क्या अब अपराधियों को बचाने के लिए कानून का सहारा लिया जा रहा है?

लीगल एक्सपर्ट्स की दो टूक-यह फैसला अपराधियों को संरक्षण देता है

 कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि यह फैसला बलात्कार और यौन शोषण के खिलाफ लड़ाई को कमजोर करेगा। वरिष्ठ अधिवक्ता ने कहा – “अगर हाईकोर्ट इस तरह के बयान देगा, तो यौन शोषण करने वाले बेखौफ हो जाएंगे। यह फैसला पूरी न्याय व्यवस्था पर एक धब्बा है!”

क्या सुप्रीम कोर्ट अब इस अन्याय को रोकेगा

पूरा देश सुप्रीम कोर्ट की ओर देख रहा है। क्या यह फैसला पलटा जाएगा? क्या जजों को ऐसी गैरजिम्मेदार टिप्पणियों से रोका जाएगा? अगर इस फैसले को चुनौती नहीं दी गई, तो यह देश में यौन शोषण को वैध करने जैसा होगा! क्या हम इस अन्याय को सहन करेंगे? या सुप्रीम कोर्ट जनता की आवाज़ सुनेगा?


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