रिपोर्ट:मनोज सिंह ठाकुर
आगरा(गंगा प्रकाश)। एक जमाना था जब पत्रकारों से मिलने के लिए जिले का कलेक्टर और एसपी समय लिया करते थे। आज पत्रकार खुद ही उनके आगे- पीछे घूमते रहते हैं। इसके पीछे हमारी कोई न कोई स्वार्थ नीति छुपी रहती है। इसकी वजह से आज पत्रकारों की जमीर एक तरह से खूंटी पर टंगी हुई है।आज अधिकतर पत्रकार खबर के नाम पर प्रशासनिक अधिकारियों, पुलिस अधिकारियों के पास डेरा डाले चापलूसी व दलाली करते दिखाई दे जाते हैं। आप मानो या ना मानो वही अपने को बड़ा पत्रकार साबित कर लेते हैं। कोई तो अपने आपको आठ आठ अखबार सहित चैनलो का जिला ब्यूरो बताते फिरता हैं।चापलूसी करने की आदत उन्हें अपने जमीर से नीचे गिरा देता है। कहां गई वह कलम की ताक़त जिसमे सच्चाई और ईमानदारी के साथ पत्रकारों की खुद्दारी होती थी। बस, आज के दौर में लगता है कि पत्रकारों को पत्रकारिता के नाम पर अधिकारियों की ही जी- हजूरी दलाली आती है और तो और अधिकारियों को भी यह समझ में आता है कि इन्हें पत्रकारिता के नाम पर बस दलाली आती है। उन्होंने भी इनकी कैटेगिरी बना रखी है। कई पत्रकार सुबह से शाम तक अपने कार्यक्रमों के आयोजक ही ढूंढते रहते हैं। मेरे कहने का आशय यह है कि पत्रकार अपने जमीर को खूंटी पर न टांगें। ऐसे भाड़ पत्रकारों की वजह से ही सच्चे पत्रकारों को अपनी पत्रकारिता की कुर्बानी देनी पड़ रही है।
पत्रकार और पत्रकारिता की गरिमा समय समय पर गिरती रही है. कभी सरकारों द्वारा अर्दब में ले लिए जाने से तो कभी खुद के कर्मों से पत्रकारों ने खुद की इज्जत गिरा ली है. ताजा मामला राजस्थान पत्रिका में कार्यरत, आगरा के वरिष्ठ पत्रकार और कई किताबों के लेखक भानु प्रताप सिंह के साथ घटा, जिसने पत्रकारिता का चीर हरण कर लेने में कोई कसर नहीं छोड़ी।
दरअसल, भानु प्रताप प्रजापिता ब्रह्मकुमारी ईश्वरीय विश्वविद्यालय के विश्व मुख्यालय ज्ञान सरोवर, माउंट आबू, राजस्थान में राष्ट्रीय मीडिया महासम्मेलन में भाग लेकर 26 मई 2024 को आगरा लौट रहे थे. वह जब आबू रोड रेलवे स्टेशन पर पहुंचे तो तबीयत में कुछ असहजता दिखी. स्टेशन पर उन्होंने शौचालय तलाशा।
काफी तलाशने के बाद पे एंड यूज के स्लोगन वाला शौचालय मिला. बाहर बैठे संचालक ने भानु प्रताप से 10 रुपये मांगे. लेकिन शौचालय आने से पहले भानु पर्स व जेब में पड़े रुपये पत्नी को पकड़ाकर आए थे. अलबत्ता उन्होंने संचालक से कहा कि वे निपटकर आने के बाद दे देंगे. गार्ड ने हामी भर दी।
शौचालय से बाहर आने पर संचालक ने 10 रुपये मांगे. जिसपर उन्होंने कहा कि पत्नी से लेकर देता हूं. यह सुनकर शौचालय का संचालक मुस्कराया और बोला, कोई लौटकर नहीं आता. पैसे तो आपको देकर ही जाना पड़ेगा. तभी उसने भानु प्रताप से पूछा क्या करते हैं..आप? “पत्रकार हूं”, भानु प्रताप ने जवाब दिया।
पत्रकार सुनकर संचालक ने व्यग्यपूर्ण लहजे में कहा, अच्छा पत्रकार हो. पत्रकार तो बिना पैसे के खबर नहीं छापते हैं. समाज में पत्रकारों की ये वाली छवि सुनकर भानु प्रताप अंदर तक हिल गए. भानु को लगा कि यह किसी पत्रकार द्वारा पीड़ित है, जाने नहीं देगा. इसी गरज से उन्होंने शौच के 10 रुपये के बदले अपनी उँगली में पड़ी सोने की अंगूठी उसे उतारकर दी और बाद में पत्नी से 10 रुपये लाकर उसे दिए. 10 रुपये देने के बाद उनकी सोने की अंगूठी छूटी.
यह किस्सा जब उन्होंने चलती ट्रेन में अपनी पत्नी को सुनाया तो उसने भी माथा पीट लिया. इसलिए आप भी अगर पत्रकार हैं तो किसी को परिचय देते समय 10 बार जरूर सोचें. और हां सोने के आभूषण भी पहनना शुरू कर दीजिए. क्या पता कब कैसी जरूरत पड़ जाए, क्योंकि आप पत्रकार हैं?
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