गरियाबंद(गंगा प्रकाश)। जिला प्रशासन के नाक के नीचे सरकारी खजाने की राशि में गोलमाल करने की छूट मिली हुई है । शिकायत पर पकड़े गए तो वापस नहीं तो सारी राशि अंदर ,जिले में इन दिनों अधिकारी कर्मचारियों को सरकारी खजाने में सेध लगाते देखा जा सकता  है । इसका मुख्य कारण अनुभवहीन प्रशासन या इस भ्रष्टाचार में इनकी मिली भगत है ? नही तो ऐसा कैसे हो सकता है की कई दिनों से कई मामले में केवल जांच ही चल रही है । जिसका निर्णय आया इस पर कोई कार्यवाही ही नहीं हो रही ,दागी अफसर अपने विभाग के नुमाइन्दो को बचाने के जतन कर रहे है । जांच को भी गलत दिशा में ले जाकर भटकाया जा रहा है  जिले के कलेक्टर  को बदनाम करने कोई कोर कसर नहीं छोड़ रहे ।  शासन के आंखो में घुल झोका जा रहा है सो अलग । ऐसे  मामलो को लेकर शिक्षा विभाग वित्तीय अनिमित्ताओ के कारण बदनाम हो रहा है । शासन की छबि अलग धूमिल हो रही है ।

     मामला है कस्तूरबा गांधी  आवासीय विद्यालय देवभोग का मामला है जिसमे अपने रिश्तेदार को नौकरी लगा कर बीस हजार रुपए मासिक प्रदान कर दो लाख चालीस हजार का शासन की क्षति पहुंचाया 

जिसमे केवल राशि ही जमा करा कर मुक्ति पा ली । जबकि इस मामले में  किसी प्रकार की कोई वैध कार्यवाही नही की गई । जांच भी तय ढर्रे पर ही की गई  जबकी वित्तीय अनिमित्तता का मामला था आरोपित कर्मचारी का  वित्तीय अधिकार आगामी जांच तक दूसरे कार्यालय को हस्तांतरण किया जा सकता था  न ही उक्त कर्मचारी को अब तक हॉस्टल से हटाया गया है जिसके चलते अब भी कई गोलमाल बदस्तूर जारी है । 

         जिले में ट्रेजरी की जांच से लेकर कस्तूरबा गांधी बालिका आवासीय विद्यालय देवभोग तक जो भी जांच हुई सभी में आरोपी को भ्रष्टाचार करने की छूट दी गई । जांच को भी गंभीरता  से नहीं किया गया । जांच उपरांत केवल सरकारी खजाने में राशि वापसी तक ही कार्यवाही की गई जो यह दिखाने के लिए काफी है की इस मामले में कुछ तो हुआ है । यह  जांच के बाद शिकायत सही पाए जाने से अफसरों की मिलीभगत सामने न आ जाए ,इसलिए राशि जमा करा कर प्रशासन से इतिश्री कर ली । जबकि 

एसे कई मामले में पूर्व में कठोर कार्यवाही की गई ।

 यहां ऐसी ही बात हुई की सरकारी खजाने से चोरी करो पकड़े गए तो वापस जमा करेगे नहीं तो सरकारी खजाने पर हक आपका, इस मामले में हालत कुछ भी रहे हो परंतु जांच पर उंगलियां उठनी तय है। जांच में कई मामले को अनदेखा किया गया प्राप्त जानकारी के अनुसार जिस कर्मचारी के नाम से रुपए निकाला गया वह काम किया ही नहीं,

पूर्व डी एम सी की भी मिलीभगत, कलेक्टर को भी किया गुमराह ?

      इस मामले में गौर करने वाली बात यह है की प्रशासन जिस विभाग का भ्रष्टाचार का मामला होता है उसी विभाग को उसकी जांच का जिम्मा सौंपा जाता है । जिले में पहले से खेलगड़िया जैसे मामले में फसे अधिकारी को भ्रष्टाचार के मामले में जांच करने आदेश किया गया । अपने ही विभाग के इस मामले में पूर्व डी एम सी ने अपने कर्मी को बचाते हुए की गई जांच में उसे केवल उसे अत्यधिक राशि निकालने का दोषी ही माना और कलेक्टर जैसे अधिकारी को भी गुमराह करने में कोई कोर कसर नहीं छोड़ी । जांच के बाद यह बात भी उठना लाजमी है की डी एम सी जैसे जिला स्तर के पद में रहते हुए एक वर्ष तक अपने कर्मचारी को देखा पूछा भी नही और ऐसा कैसे हो गया की पूरे एक वर्ष विभाग के नाक के नीचे यह खेल चलता रहा विभाग को पता तक भी नहीं चला । लिहाजा  मिलीभगत से इंकार नहीं किया जा सकता ।

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