देवभोग में 15 वर्षों से झोपड़ी में जीते लोहा-लाखट: बे-मौसम बारिश ने उजाड़ा आशियाना, सिस्टम मौन

गरियाबंद/ देवभोग (गंगा प्रकाश)। गरियाबंद जिले का सीमावर्ती आदिवासी अंचल देवभोग इन दिनों केवल गर्मी या बारिश से ही नहीं, बल्कि मानवीय उपेक्षा और सिस्टम की बेरुखी से भी झुलस रहा है। क्षेत्र में 15 वर्षों से लोहा-लाखट समुदाय के लोग, जो परंपरागत रूप से लोहे के औजार, बर्तन और खेती-किसानी में इस्तेमाल होने वाले उपकरण बनाकर जीवन-यापन करते हैं, आज भी झोपड़ियों में रहने को मजबूर हैं।

हाल ही में आई बे-मौसम बारिश ने इन परिवारों की सालों की मेहनत, छत और चैन — तीनों को बहा दिया। बांस-तिरपाल की झोपड़ियां तेज हवा और पानी के सामने टिक न सकीं, और न ही कोई सरकारी राहत उनके पास तक पहुंची।

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लोहा-लाखट: परंपरा से पेशा, लेकिन घर अब भी अस्थायी

यह समुदाय मूलतः दूसरे राज्यों और जिलों से आकर देवभोग में बसा है। लोहे के औजार और पारंपरिक कृषि उपकरण बनाना इनका मुख्य पेशा है। ये लोग हाट-बाजारों में छोटे अस्थायी स्टॉल लगाकर गांव-गांव जाकर अपना सामान बेचते हैं। लेकिन 15 वर्षों से इस क्षेत्र में बसने के बावजूद इन्हें न तो स्थायी जमीन का अधिकार मिला, न ही पक्के घर का हक।

वे जहां रहते हैं, वो ज़मीन भी किसी गांव के कोने पर जंगल या खाली पड़े सरकारी भूखंड पर बनी हुई झोपड़ियों की एक बस्ती है। न बिजली की पक्की व्यवस्था, न पीने के पानी की सुविधा। लेकिन इसके बावजूद वे यहीं रहकर सालों से मेहनत कर रहे हैं।


बे-मौसम बारिश का कहर: छतें उड़ीं, दीवारें बह गईं

अचानक आई बारिश और आंधी के दौरान इन झोपड़ियों का हाल सबसे खराब रहा।

  • छत पर पड़ी तिरपाल की चादरें हवा में उड़ गईं।
  • बांस और लकड़ी की दीवारें मिट्टी के साथ धंस गईं।
  • झोपड़ी के अंदर रखा अनाज, कपड़े, औजार और खाना पकाने की सामग्री सब भीग गया।

बच्चे गीली जमीन पर बैठते देखे गए, बुज़ुर्ग बाहर कीचड़ में बैठकर पानी रुकने का इंतजार करते दिखे। मवेशियों को बांधने की जगह भी न बची।

मानवता की सबसे बड़ी त्रासदी: वर्षों की मेहनत, पर कोई पहचान नहीं

इन परिवारों को न आवास योजना का लाभ मिला, न ही कोई जमीन का पट्टा। सरकारी दस्तावेजों में ये लोग आज भी ‘बाहरी’ हैं। जब तक कोई सर्वे नहीं होता, न कोई फॉर्म भरा जाता है, तब तक ये लोग राहत, राशन या पुनर्वास जैसी किसी भी योजना से बाहर रहते हैं।

बारिश के बाद न कोई अधिकारी आया, न कोई स्वास्थ्यकर्मी, न कोई पंचायत प्रतिनिधि।

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घर नहीं, सिर्फ रहने की जगह

इन झोपड़ियों को घर कहना ही अन्याय होगा — ये केवल रहने की जगह हैं, जो समय की मार के साथ बस बदलती रहती हैं:

  • बरसात में चूने लगती हैं
  • गर्मी में आग उगलती हैं
  • और सर्दियों में कंपा देती हैं

लेकिन इन लोगों के पास कोई विकल्प नहीं है।

सवाल बाकी हैं: क्या 15 साल भी काफी नहीं?

  • क्या 15 साल किसी क्षेत्र में रहने के लिए स्थायी अधिकार पाने के लिए काफी नहीं होते?
  • क्या मेहनत करने वाले समुदाय को सिर्फ इसलिए नज़रअंदाज़ कर दिया जाए क्योंकि उनके पास वोटर कार्ड या जमीन का पट्टा नहीं है?
  • क्या तिरपाल और बांस के सहारे जीवन भर गुजर-बसर करना न्याय है?

जरूरत है न्याय, न कि दया

देवभोग में लोहा-लाखट समुदाय के लिए तत्काल सर्वे, आवास योजना का समावेश, और स्थायी पुनर्वास अब केवल एक आवश्यकता नहीं, बल्कि मानव अधिकार का प्रश्न है।

सरकार और प्रशासन को चाहिए कि वो इन मेहनतकश परिवारों की पीड़ा को समझे — क्योंकि 15 साल का इंतजार अब बहुत हो चुका है।


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