अरविन्द तिवारी 

जगन्नाथपुरी (गंगा प्रकाश)- हिन्दुओं के सार्वभौम धर्मगुरु एवं हिन्दू राष्ट्र के प्रणेता पूज्यपाद पुरी शंकराचार्यजी अग्नि शब्द का विश्लेषण करते हुये संकेत करते हैं कि यज्ञ, दान और तप मनीषियों को पवित्र करने वाले हैं। मैत्रायण्य उपनिषत् के अनुशीलन से यह सिद्ध है कि अग्नि में सम्यक् प्रदत्त आहुति यज्ञ है। श्रीमद्भगवङ्गीता के अनुशीलन से यह सिद्ध है कि प्राणियों के समुत्पादक और पोषक देवता के उद्देश्य से हवनीय द्रव्य का हवन यज्ञ है। अन्नादि ओषधि , पशु , वृक्ष , लता , घृत , दुग्ध , दधि , अन्यान्य हविष्य , भूमि , दिशा , श्रद्धा , काल , ऋक् , यजुः , साम , यजमान तथा गार्हपत्य अग्नि – ये सत्रह यज्ञाङ्ग हैं। यज्ञ इस जगत् की स्थिति का मूल कारण है। सर्ग के प्रारम्भ में सर्वेश्वर प्रभु के मुख से ब्रह्मा और सामगान करने वाले उद्गाता, दोनों भुजाओं से होता तथा अध्वर्यु , ब्रह्मा से ब्राह्मणाच्छंसी और प्रस्तोता , पृष्ठभाग से मैत्रावरुण और प्रतिप्रस्तोता , उदर से प्रतिहर्ता और पोता , ऊरुओं से अच्छावाक् और नेष्टा , हाथों से आग्नीध्र , जानुओं से सुब्रह्मण्य तथा पैरों से ग्रावस्तुत और यजुर्वेदी उन्नेता – समुद्भूत हुये। सम्पूर्ण यज्ञों के प्रवक्ता उक्त षोडश श्रेष्ठ ऋत्विक् और दक्षिणाओं के साथ ये सब मिलकर यज्ञ का निर्वाह करते हैं। पत्नी सहित यजमान, सोलह ऋत्विक् तथा दक्षिणा – सहित अन्नादि पूर्वोक्त सोलह वस्तुओं का संग्रह करके यज्ञ का अनुष्ठान करते हैं। वेदो के ब्राह्मण भाग से यज्ञ का प्राकट्य हुआ है। यह यज्ञ ब्राह्मणों को ही अर्पित किया जाता है। यज्ञ के पीछे सारा जगत् और जगत् के पीछे सदा यज्ञ रहता है। ध्यान रहे, ऋग्वेद आग्नेय है। अग्नियों की संख्या के अनुरूप ही सोमयाग की भी संख्या सिद्ध है। यज्ञ के प्रधान अङ्ग अग्निदेव हैं। वेदों में सोमयाग की भी संख्या सिद्ध है। वेदों में प्रथम ऋग्वेद है। उसका प्रारम्भ अग्नि शब्द से होता है। शाक्पूणि – नामक निरुक्ताचार्य के अनुसार अग्नि शब्द तीन धातुओं से निष्पन्न होता है। अ – अञ्ज अर्थात् प्रकाश का द्योतक है। ग् – ह – दह अर्थात् दाह का द्योतक है। नि – नी अर्थात् नयन के अर्थ में प्रयुक्त है। अभिप्राय यह है कि अग्नि तत्त्व प्रकाशक और दाहक है तथा यज्ञ के भागों का वाहक है। भगवान् श्रीकृष्ण के अनुसार सर्वभ्रष्टा सर्वेश्वर स्वयं उन्होंने त्रिवृत्करण की प्रक्रिया के अनुसार अथवा रूपयुक्त मूर्त्त भूतों में सर्वप्रथम सर्व देवात्मक देवमुख वह्निका अपने मुख से निर्माण किया , अतः मूर्त्ताग्रज होने के कारण पुराण मनीषिगण उसे अग्नि कहते हैं। पूर्व प्रज्वलित वह्नि में आहुति दी जाने के कारण भी यह अग्नि नाम से अमित है। अधिकृत द्विजों द्वारा विधिवत् पूजित – सेवित होने पर यह उन्हें अग्रय गति ( परमपद ) प्रदान करता है, अत: इसे अग्नि कहते हैं। ध्यान रहे , अग्नि में अ – विष्णु स्वरूप आहवनीय का , ग् – गार्हपत्य का और नि – दक्षिणाग्नि का द्योतक है। सर्व संज्ञक आहुति और वहन – संज्ञक हव्य अर्थात् सर्वविध हव्य को होम के आरम्भ से अन्त तक स्वीकार करने वाला महाद्युति सम्पन्न त्रिभुवन विजय में हेतुभूत वह्नि ओंकार गत अकारात्मक विष्णुरूप है। गृहों का आधिपत्य गृहपत्य है। ब्रह्मा इस ब्रह्माण्डात्मक गृह के अधिपति हैं। उनसे प्रादुद्भूत ओंकार गत उकारात्मक ब्रह्मरूप अग्नि गार्हपत्य है। यजमान को दक्षिण मार्ग से स्वर्ग में ले जाने वाला दक्षिण दिशा में प्रतिष्ठित तथा ओंकार गत मकारात्मक रुद्ररूप प्रचण्ड अग्नि दक्षिणाग्नि है।


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