कुछ लोग सिर्फ रिश्ते नहीं होते, वो पूरा घर होते हैं। हमारी अपनी कोख की बेटी भी कुछ ऐसी ही थी। वह केवल बेटी नहीं थी, वह माँ-पापा की मुस्कान थी, उनके चेहरे की वो रौशनी जो बिना कहे थकान मिटा देती थी। वह भाई की ढाल थी — ऐसी ढाल जो सामने खड़ी होकर हर दर्द, हर आघात और हर मुश्किल को पहले अपने सीने पर ले लेती थी।
उसे किसी से पूछने की ज़रूरत नहीं पड़ती थी कि घर में कौन उदास है, कौन परेशान है। उसकी आँखों में ऐसी समझ थी जो शब्दों से पहले हालात पढ़ लेती थी। माँ की खामोशी, पापा की चिंता, भाई की बेचैनी — वह सब पहचान लेती थी। कई बार तो हम खुद नहीं समझ पाते थे कि हमें क्या हो रहा है, लेकिन वह जान जाती थी।
घर में उसकी मौजूदगी किसी दीपक की तरह थी। छोटी-छोटी बातों में हँसी ढूँढ लेना, बिगड़े माहौल में भी अपनापन घोल देना, और सबके बीच संतुलन बनाकर रखना — यह सब उसके स्वभाव में था। वह बोलती कम थी, निभाती ज़्यादा थी।
आज वह हमारे बीच नहीं है। लेकिन सच यह है कि वह गई नहीं है। वह घर की हर दीवार में बस गई है। जहाँ बैठकर हँसा करती थी, वहाँ उसकी हँसी गूंजती है। जहाँ खामोशी से किसी के आँसू पोंछती थी, वहाँ आज भी उसकी मौजूदगी महसूस होती है। उसका कमरा, उसकी चीज़ें, उसकी आदतें — सब कुछ किसी न किसी रूप में उससे बात करता है।
माँ-पापा की आँखों में अब भी वही बेटी रहती है, जो हर सुबह उनसे पहले उठ जाती थी, जो उनकी चिंता अपने आँचल में बाँध लेती थी। भाई के लिए वह आज भी ढाल है — फर्क सिर्फ इतना है कि अब वह सामने नहीं, दुआ बनकर खड़ी है।
अपनी कोख की बेटी का जाना सिर्फ एक इंसान का जाना नहीं होता, वह पूरे घर का एक हिस्सा अपने साथ ले जाती है। उसके जाने के बाद घर वही रहता है, पर घर जैसा नहीं लगता। दीवारें खड़ी होती हैं, पर उनमें धड़कनें कम हो जाती हैं।
आज वह याद है…पर ऐसी याद, जो हर साँस में चलती है।
ऐसी याद, जो हर दर्द में ढाल बन जाती है।
ऐसी याद, जो माँ-पापा की मुस्कान में और भाई की खामोशी में आज भी ज़िंदा है।
