आज 26 जनवरी है। पूरा देश गणतंत्र दिवस का पर्व हर्षोल्लास से मना रहा है। हर ओर तिरंगे लहरा रहे हैं, देशभक्ति के गीत गूंज रहे हैं, स्कूलों में परेड और कार्यक्रम हो रहे हैं। लेकिन हमारे घर में आज कोई उत्सव नहीं है। हमारे यहाँ आज भी सन्नाटा है। क्योंकि हमारे घर की मुस्कान, हमारी लाडली जिज्ञासा, छह महीने पहले हम सबको छोड़कर चली गई।

उस दिन के बाद से हर तारीख़ हमारे लिए एक-सी हो गई है। हर त्योहार फीका है। और आज, जब पूरा देश आज़ादी और संविधान का जश्न मना रहा है, तब हमारे घर में जिज्ञासा की कमी और भी गहराई से महसूस हो रही है।

जिज्ञासा सिर्फ एक बेटी नहीं थी। वह माँ की हर दुआ थी, पिता का हर सपना थी, भाई की दुनिया थी, और पूरे परिवार की धड़कन थी। उसकी एक मुस्कान घर के हर कोने को रोशन कर देती थी। आज घर वही है, लेकिन रौनक नहीं है।

दादी के लिए जिज्ञासा सिर्फ पोती नहीं थी, वह उनके बुढ़ापे की सबसे बड़ी खुशी थी। वही उनकी लोरी थी, वही उनकी पूजा। आज दादी अक्सर भगवान के सामने बैठकर सबसे पहले जिज्ञासा का नाम लेती हैं। होंठ राम-राम कहते हैं, लेकिन आँखें उसी को खोजती हैं।

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चाचा-चाची के लिए जिज्ञासा घर की शान थी। चाचा उसे अपनी बेटी जैसा मानते थे और चाची उसे अपनी गोद की रौनक। आज भी घर में कोई हँसता है तो दोनों की आँखें भर आती हैं, क्योंकि हर हँसी में उन्हें जिज्ञासा की हँसी सुनाई देती है।

जिज्ञासा के जीवन में उसकी बड़ी माँ की बेटी का स्थान बहुत विशेष था। वह रिश्ते में बड़ी बहन थी, लेकिन जिज्ञासा उसे अपनी सगी बड़ी बहन से कम नहीं मानती थीं। हर सुख-दुख की साथी, हर राज़ की हमराज़। आज वही बड़ी बहन हर त्योहार, हर खुशी में जिज्ञासा को खोजती है।

और जिज्ञासा के जीजा… जिन्हें वह दुनिया के सबसे अच्छे दोस्तों में गिनती थीं। उनसे वह बिना झिझक हर बात कहती थीं। आज वही जीजा बाहर से मजबूत दिखते हैं, लेकिन भीतर से हर दिन टूटते हैं। वह जिज्ञासा की यादों में पल-पल मरकर जी रहे हैं।

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जिज्ञासा के जाने से पूरा परिवार जैसे बिखर गया। माँ आज भी रसोई में काम करते हुए अचानक रुक जाती है, जैसे जिज्ञासा ने आवाज़ दी हो। पिता आज भी दरवाज़े की ओर देखते हैं, जैसे वह अभी आने वाली हो। भाई आज भी फोन हाथ में लेकर बैठ जाता है, जैसे उससे बात करनी हो। दादी आज भी भगवान से पहले उसी का नाम लेती हैं। चाचा-चाची आज भी उसके कमरे की ओर देख लेते हैं।

आज गणतंत्र दिवस है, लेकिन हमारे घर में न झंडा लगाने का मन है, न मिठाई बाँटने का। क्योंकि जिस बेटी के हाथों से हर त्योहार सजता था, वही आज तस्वीरों में रह गई है। हम सब जी तो रहे हैं… लेकिन सिर्फ यादों में।

आज इस पावन दिन पर भगवान से बस एक ही प्रार्थना है — हे प्रभु, हमारी लाडली जिज्ञासा को अपने श्रीचरणों में स्थान दें।उसे वहाँ वह शांति दें, जो इस धरती पर उसे न मिल सकी।और यदि कभी उसे फिर धरती पर भेजें,तो उसी अधूरे घर को पूरा करने भेजें।उसी माँ-पिता की बेटी बनाकर,उसी दादी की पोती बनाकर,उसी चाचा-चाची की लाडली बनाकर, बड़े भाई की बहन, बड़ी बहन की छोटी बहन बनाकर,और उसी दोस्त जैसे जीजा की सखी बनाकर भेजें।

क्योंकि जिज्ञासा बिना… गणतंत्र दिवस भी फीका है,

हर खुशी अधूरी है, और हमारा पूरा परिवार… अधूरा है।


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