CGNEWS:”फ्री में हटाने का नियम, लेकिन मांग रहे डेढ़ लाख! ट्रांसफार्मर हटाने की अर्जी पर बिजली विभाग की तानाशाही, गरीबों को थमा रहे मोटे-मोटे बिल”

 

फिंगेश्वर/गरियाबंद (गंगा प्रकाश)। “बिना पूछे जमीन पर ट्रांसफार्मर लगा दिया और जब हटाने की बात की तो डेढ़ लाख का बिल थमा दिया!” — ये महज एक पीड़ित की कहानी नहीं, बल्कि गरियाबंद जिले के दर्जनों गांवों की सच्चाई है, जहां बिजली विभाग अपनी मनमानी पर उतारू है। राज्य सरकार की योजनाओं और वास्तविक क्रियान्वयन में ज़मीन-आसमान का फर्क साफ दिखाई दे रहा है।

ट्रांसफार्मर घर के सामने बना खतरा, हटाने पर मांगे जा रहे हजारों

गांवों और कस्बों के पुराने मोहल्लों में जहां लोग वर्षों से रह रहे हैं, वहां कई जगह ट्रांसफार्मर और बिजली के खंभे ठीक घर के सामने या दरवाजे के पास लगे हुए हैं। गर्मियों में बिजली का लोड बढ़ने से अक्सर ट्रांसफार्मर में आग लगने का खतरा बना रहता है, जिससे परिवारों की जान को खतरा मंडराने लगता है।

ऐसे में जब लोग इन ट्रांसफार्मरों को हटवाने के लिए बिजली विभाग में आवेदन देते हैं, तो उन्हें मुफ्त में हटाने की बजाय 1.25 लाख से 1.5 लाख रुपये तक का भारी-भरकम बिल थमा दिया जाता है। आम गरीब, किसान और मजदूर परिवारों के लिए यह राशि देना लगभग नामुमकिन है।

मुख्यमंत्री विद्युतीकरण योजना का नहीं हो रहा पालन

राज्य सरकार की ‘मुख्यमंत्री शहरी एवं ग्रामीण विद्युतीकरण योजना’ के तहत यह स्पष्ट प्रावधान है कि यदि ट्रांसफार्मर या खंभा किसी निजी भूमि पर या जनसुरक्षा के दृष्टिकोण से खतरनाक स्थिति में लगा है, तो उसे मुफ्त में शिफ्ट किया जाएगा। इसके लिए ज़िला स्तर पर कलेक्टर की अध्यक्षता में एक समिति गठित की गई है जिसमें टाउन प्लानिंग, पीडब्ल्यूडी, निगम और बिजली कंपनी के अधिकारी शामिल होते हैं।

लेकिन जमीनी हकीकत यह है कि बीते दो वर्षों में बिजली कंपनी को ऐसे 50 से अधिक आवेदन प्राप्त हुए हैं, परंतु इनमें से केवल 15 मामलों को ही समिति को भेजा गया, और इनमें से अधिकांश सिफारिशें विधायकों, मंत्रियों या पूर्व पार्षदों द्वारा की गई थीं। आम जनता की अर्जी को या तो दरकिनार कर दिया गया या फिर सर्वे के नाम पर उन्हें भारी भरकम बिल थमा दिया गया।

बिना अनुमति जमीन पर खंभे-ट्रांसफार्मर, अब मांग रहे पैसे

कई ग्रामीणों का आरोप है कि बिजली विभाग ने उनकी निजी जमीन पर बिना अनुमति के ट्रांसफार्मर और खंभे लगा दिए। अब जब वे इसे हटवाना चाहते हैं, तो विभाग कह रहा है कि सारा खर्च उन्हें ही उठाना पड़ेगा। यह सीधे-सीधे संविधान के अनुच्छेद 300A का उल्लंघन है, जो संपत्ति के अधिकार को संरक्षण देता है।

‘जैसे-जैसे गर्मी बढ़ रही है, वैसे-वैसे डर भी’ — पीड़ित की जुबानी

फिंगेश्वर के एक ग्रामीण राजेन्द्र यादव बताते हैं, “हमारे घर के ठीक सामने ट्रांसफार्मर है। पिछले साल उसमें चिंगारी उठी थी। घर में छोटे बच्चे हैं, बूढ़े मां-बाप हैं। हमने अर्जी दी, सर्वे हुआ, लेकिन फिर 1.48 लाख रुपये का बिल दे दिया गया। हम गरीब आदमी कहां से लाएंगे इतना पैसा?”

ऐसे ही एक अन्य पीड़ित महिला शांता बाई बताती हैं, “खंभा मेरे दरवाजे से सटा है। बारिश में करंट उतरता है। बच्चे स्कूल जाते हैं, रोज डर लगा रहता है। दो बार आवेदन दिए, लेकिन कोई सुनवाई नहीं।”

आम जनता से पैसा, खास लोगों के लिए फ्री?

सबसे बड़ा सवाल यह है कि यदि किसी नेता, पार्षद या विधायक की सिफारिश से ट्रांसफार्मर शिफ्ट किया जा सकता है तो आम जनता को इस सुविधा से क्यों वंचित किया जा रहा है? क्या यह सरकार की योजनाओं का राजनीतिकरण नहीं है? क्या सरकारी योजनाएं सिर्फ रसूखदारों के लिए हैं?

क्या कहती है नीति और क्या हो सकता है समाधान?

बिजली कंपनी की नीति कहती है कि ट्रांसफार्मर हटाने का खर्च उस स्थिति में उपभोक्ता से लिया जा सकता है जब यह उनकी मांग पर, बिना सुरक्षा कारण के किया जा रहा हो। लेकिन यदि सार्वजनिक सुरक्षा, भूमि स्वामी की शिकायत, या मुख्यमंत्री योजना के तहत अर्जी दी गई है, तो उसे बिना शुल्क के कार्यान्वित किया जाना चाहिए।

राज्य सरकार और जिला प्रशासन को चाहिए कि—

  • समिति की बैठक नियमित हो।
  • सभी अर्जी समयसीमा में समीक्षा के लिए भेजी जाए।
  • ट्रांसफार्मर हटाने की प्रक्रिया पारदर्शी और निशुल्क हो, जहां पात्रता हो।

न्याय की उम्मीद और संघर्ष जारी

जब तक ट्रांसफार्मर हटाने के इस अन्यायपूर्ण सिस्टम में सुधार नहीं होता, तब तक गरियाबंद जैसे ग्रामीण इलाकों के लोग अपने दरवाजे पर खड़े खतरे को देखने के लिए मजबूर हैं। शासन-प्रशासन को इस ओर संज्ञान लेना चाहिए और न्यायसंगत व्यवस्था सुनिश्चित करनी चाहिए, ताकि सरकारी योजना का लाभ वंचितों तक सही मायने में पहुँच सके।

 


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