“धड़कनों से जुड़ी धरोहर अब इतिहास बनती जा रही है!” बैलगाड़ी — कभी गाँवों की जान, आज यादों की शान!

 

रायपुर/छत्तीसगढ़(गंगा प्रकाश)। कभी गांव की सड़कों पर शान से सरपट दौड़ती थी… धूल उड़ाती थी… और हर किसी की नज़र उस पर जाकर ठहर जाती थी — जी हाँ, बात हो रही है उस देसी गाड़ी की, जो सिर्फ लकड़ी और लोहे की नहीं, बल्कि रिश्तों, संस्कृति और मेहनत की गठरी थी। नाम है — बैलगाड़ी!

जहाँ कभी यह ग्रामीण भारत की धड़कन थी, वहीं आज इसके पहिए थम चुके हैं। वो आवाज़ — “हट बैल, चल बैल!” — अब इतिहास की गूंज बन गई है। आधुनिकता के तेज़ तूफ़ान में यह गाड़ी अब जीवन की पगडंडियों से फिसलकर संग्रहालयों और किस्सों तक सीमित रह गई है।

बैलगाड़ी: पर्यावरण प्रेमी, किसान की साथी, संस्कृति की सवारी

एक समय था जब इस गाड़ी का कोई विकल्प नहीं था। ना डीज़ल की ज़रूरत, ना पेट्रोल का खर्चा। न प्रदूषण फैलाती थी और न ही सड़कों को खोदती थी। किसान इससे अनाज लाते थे, परिवारों को मेलों में ले जाते थे, और विवाह-शादी के बारातें भी इसी पर सवार होती थीं। यह गाड़ी सिर्फ सफर का साधन नहीं, बल्कि अपनों को करीब लाने वाला सेतु थी।

आज स्थिति इतनी बदली कि…

जहाँ एक दौर में गांव के हर घर के सामने एक बैलगाड़ी खड़ी रहती थी, वहीं आज यह विरासत या कबाड़ में बदलती जा रही है। ट्रैक्टर, पिकअप, बाइक और कारों ने जैसे इस देसी गाड़ी को धक्का दे दिया हो। जिले के अधिकांश गांवों में आज बैलगाड़ी केवल कुछ पुराने परिवारों के आंगन में पड़ी धरोहर बनकर रह गई है — जिसे बच्चे भी अब पहचान नहीं पाते।

क्यों छूट रही यह परंपरा?

  • आधुनिकता की दौड़: ट्रैक्टर और माल वाहकों ने तेजी से स्थान लिया।
  • सड़कों का विकास: अब पक्की सड़कों पर बैलगाड़ी की धीमी गति असहज लगती है।
  • शौकत की परिभाषा बदली: आज की युवा पीढ़ी बैलगाड़ी को ‘पुराना फैशन’ मानती है।
  • रखरखाव में रुचि की कमी: बैलों की देखरेख, गाड़ी की मरम्मत अब बोझ समझा जाता है।

सांस्कृतिक चोट भी कम नहीं!

बैलगाड़ी सिर्फ एक सवारी नहीं थी, वह ग्रामीण समाज की रगों में बसी थी। तीज-त्योहार, बारात, खेत-खलिहान… हर मौके पर इसकी उपस्थिति समाज को जोड़ती थी। आज जब यह गाड़ी नहीं रही, तो वह सामूहिकता भी टूटती जा रही है। रिश्तों में दूरी आई है, मेल-मिलाप कम हुए हैं।

क्या है समाधान?

कुछ जागरूक नागरिक और सामाजिक संस्थाएं बैलगाड़ी को “ग्रामीण विरासत” घोषित करने की मांग कर रहे हैं।

  • स्कूलों में प्रदर्शनियों में इसका उपयोग
  • पर्यटन स्थलों पर बैलगाड़ी राइड का संचालन
  • “बैलगाड़ी महोत्सव” जैसे आयोजन
  • किसानों को इसके महत्व पर जागरूक करना

कभी रफ्तार थी, अब रुक गई कहानी…

लेकिन इस परंपरा को विलुप्त होने देना क्या सही है? क्या हम सिर्फ स्मार्ट वाहनों के पीछे अपने इतिहास, अपनी जड़ों को यूँ ही छोड़ देंगे?

समाप्ति नहीं — यह एक अपील है!

बैलगाड़ी को बचाना केवल एक गाड़ी को बचाना नहीं, बल्कि हमारे इतिहास, संस्कृति और प्रकृति से जुड़ी एक जीवनशैली को बचाना है। आज जब हम तकनीक की ऊंचाइयों को छू रहे हैं, तब ज़रूरी है कि अपने पैरों के नीचे की ज़मीन को न भूलें।

क्योंकि जब बैलगाड़ी की लकड़ी चटखती थी, तब उसमें हमारे गाँव की आत्मा बजती थी।


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