अरविन्द तिवारी की कलम से 

जगन्नाथपुरी (गंगा प्रकाश) – हिन्दुओं के सार्वभौम धर्मगुरु एवं हिन्दू राष्ट्र के प्रणेता , विश्व मानवता के रक्षक पूज्यपाद पुरी शंकराचार्यजी वेदोक्त ज्ञानकाण्ड , उपासनाकाण्ड और कर्मकाण्ड की चर्चा करते हुये संकेत करते हैं कि प्राणियों की प्रवृत्ति तथा निवृत्ति के नियामक का बोध अपने जीवन की प्रवृत्ति तथा निवृत्ति का निरीक्षण तथा परीक्षण करने पर सम्भव है। अनित्यता , जड़ता और दुःख रूपता के चपेट से विमुक्त सत् , चित् और आनन्द होकर जीव शेष रहना चाहता है। असत्ता की, जड़ता की और दुःख की उपलब्धि का कारण अनित्य और दुःखरूप – शरीर तथा संसार में अहंता – ममता रूप तादात्म्यापत्ति है। सत् , चित् और आनन्द होकर शेष रहने की भावना का मूल स्वयं की सच्चिदानन्द रूपता है। भूख और प्यास के निवारक अन्न तथा जल के अस्तित्व को स्वीकार करने के सदृश मृत्यु , अज्ञता और दुःख के निवारक सत् , चित् तथा आनन्द के अस्तित्व को स्वीकार करना आवश्यक है। उस सर्वस्रष्टा और सर्वनियामक का नाम वेदों में सच्चिदानन्द सर्वेश्वर है। उसकी आत्म रूपता का प्रतिपादक वेदोक्त ज्ञानकाण्ड है। उसकी आत्मीय रूप से उपासना का प्रतिपादक वेदोक्त उपासना काण्ड है। उसकी उपासना और बोध के अनुरूप जीवन का शोधक तथा बल और वेग प्रदायक ; तद्वत् किसी की सत्ता , चित्ता और प्रियता के अपहरण में स्वभाव सिद्ध प्रीति तथा प्रवृत्ति का अहिंसा – सत्य – अस्तेयादि यमों के अनुपालन से शनै: शनै: निरोधक वेदोक्त कर्मकाण्ड है। श्रुतिसिद्ध वर्णाश्रम व्यवस्था अहिंसादि यमों की जीवन में समग्र प्रतिष्ठा की क्रमिक सहिष्णुता उत्पन्न करने वाली तथा शिक्षा , रक्षा , अर्थ और सेवा को सन्तुलित रूप से सबको सुलभ कराने वाली है। अत: वेदोक्त कर्म, उपासना तथा ज्ञान का गुप्त या प्रकट आंशिक अनुकरण या अपहरण अन्यत्र परिलक्षित है। इनके अनुकरण या अपहरण में अविवेक पूर्ण शोधन तथा परिवर्द्धन अवश्य ही विघातक है। वैदिक महर्षियों के द्वारा चिर परीक्षित और प्रयुक्त उपायों का परित्याग कर मनःकल्पित उपायों के आलम्बन से लौकिक उत्कर्ष भी असम्भव है, पारलौकिक उत्कर्ष और मोक्ष तो सर्वथा असम्भव है ही। श्रुति सम्मत स्मृति , श्रुतिस्मृति सम्मत सदाचार और श्रुतिस्मृति सदाचार सम्मत आत्म प्रियता का समादर करने पर लौकिक – पारलौकिक उत्कर्ष होता है और परमात्म प्राप्ति का मार्ग प्रशस्त होता है। ध्यान रहे ; धर्म और ब्रह्म का यथार्थ बोध श्रुति तथा श्रुति सम्मत स्मृति – पुराण और इतिहास के विधिवत् अनुशीलन से ही सम्भव है। वेदों का अपूर्व प्रतिपाद्य धर्म और ब्रह्म है। पूर्व मीमांसा में धर्म का और उत्तर मीमांसा में ब्रह्म का प्रतिपादन प्राप्त है। मन्वादि स्मृतियों में तथा श्रीमद्भागवतादि पुराणों में वेदैक समधिगम्य धर्म और ब्रह्म का बृहद्विवेचन सुलभ है। धर्म के अविरुद्ध और अनुकूल अर्थोपार्जन और विषयोपभोग से सुलभ दिव्य जीवन में ब्रह्म जिज्ञासा और ब्रह्म विचार की क्षमता का उदय सुनिश्चित है। ब्रह्मज्ञान और ब्रह्मनिष्ठा से समन्वित मानव जीवन की सार्थकता सुनिश्चित है। इस तथ्य को हृदयङ्गम करने की आवश्यकता है कि जहाँ – कहीं युक्तियों के बल पर धर्म तथा ब्रह्म का यथार्थ विवेचन प्राप्त हैं , वहाँ श्रुति सम्मत सिद्धान्त को तदनुकूल आगमिक युक्तियों का आलम्बन लेकर उद्भासित किया गया है।


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