अरविन्द तिवारी  

गुरूग्राम (गंगा प्रकाश)- महानिर्वाणी अखाड़े के महामंडलेश्वर एवं दैवीय सम्पद मंडल के प्रमुख परमहंस ब्रह्मलीन स्वामी शारदानंद सरस्वती (80 वर्षीय) ब्रह्मलीन हो गये। उनके ब्रह्मलीन होने की खबर से देश के अलावा विदेशों में रह रहे उनके शिष्यों में शोक की लहर छा गई। सूत्रों से मिली जानकारी के अनुसार तबियत बिगड़ने के बाद उन्हें गुरुग्राम के मेदांता अस्पताल में दाखिल कराया गया था जहां उपचार के दौरान रविवार देर रात उन्होंने अंतिम सांस ली। उन्हें लम्बे वक़्त से हाई डायबिटीज की शिकायत भी थी। यही स्वास्थ्यगत समस्याओ के बाद कुछ दिन पूर्व उन्हें अस्पताल दाखिल कराया गया था। गौरतलब है कि शारदानंद सरस्वती बाल्यकाल में स्वामी भजनानंद के पास आये थे , तब वे अपना नाम और पता भी नहीं बता सके। भजनानंद ने उन्हें आश्रम में रखकर उन्हें शिक्षा दीक्षा दिलाई। बड़ा होने के बाद स्वामी भजनानंद ने उन्हें वेदों के अध्ययन के लिये काशी भेज दिया। काशी से वापस आने पर भजनानंद ने बालक के विरक्त स्वभाव को देखकर वर्ष 1976 में ऋषिकेश में गंगा तट पर सन्यास की दीक्षा दे दी। वेदांत की शिक्षा के बाद वे सन्यास ग्रहण करते ही शारदानंद सरस्वती हो गये। भक्ति की ओतप्रोत शारदानंद सरस्वती ने दैवीय सम्पद मंडल को सूर्य के प्रकाश की भांति पूरे भारतवर्ष में फैलाना शुरू कर दिया। उन्होंने गुरु के आशीर्वाद से कई आश्रम बनवाये। वर्ष 1988 में स्वामी भजनानंद सरस्वती के ब्रह्मलीन होने पर शारदानंद सरस्वती को महामंडलेश्वर की पदवी से विभूषित कर दिया गया। महामंडलेश्वर बनने के बाद उन्होंने दैवीय सम्पद मंडल का विस्तार पूरे भारत में किया और हर प्रदेश में आश्रमों की स्थापना की। उनके ब्रह्मलीन होने की खबर के बाद छत्तीसगढ़ समेत देश भर में फैले उनके अनुयायियों में शोक की लहर दौड़ गई। छग प्रदेश में स्वामी शारदानंद बेहद लोकप्रिय थे , यहां राजनीति , व्यापार और विभिन्न क्षेत्रो से जुड़े दिग्गज उनके अनुयाई थे। उनके मार्गदर्शन में प्रत्येक वर्ष प्रदेश के विभिन्न स्थानों पर महायज्ञों का आयोजन किया जाता रहा है। कोरबा के केंदई स्थित आश्रम में उनके मार्गदर्शन और दिशा निर्देश पर हर वर्ष सामूहिक विवाह का आयोजन किया जाता है जिसमे गरीबजन , आदिवासीजन व वनांचल के जोड़ो का विवाह सम्पन्न कराया जाता है। यहां बीते 35 सालों से आदिवासी गरीब परिवार के बच्चों की शादी निःशुल्क कराई जाती है। साथ ही उन्हें जीवन यापन के लिये घरेलू सामान भी दिये जाते हैं। इन जोड़ों को स्वामी शारदानंद महराज अपने शिष्यों को सौंप देते थे। शिष्य माता-पिता की तरह ही उनकी देखभाल करते हैं। साथ ही मतांतरित हो चुके आदिवासी परिवारों की घर वापसी के लिये भी मुहिंंम चलाई जाती है। स्वामीजी के ब्रम्हलीन के समाचार सुन शोक में डूबकर देश भर के बड़े पैमाने पर उनके शिष्य उनको श्रद्धांजलि देने मैनपुरी स्थित एकसरानंद आश्रम पहुंचे हुये थे। उल्लेखनीय है कि शारदानंद महाराज माह भर पहले ही बिलासपुर प्रवास पर आये थे। वे एक निजी अस्पताल के उद्घाटन कार्यक्रम में शामिल हुये थे। वहीं 25 सितंबर को अंबिकापुर में आयोजित सहशस्त्रचंडी महायज्ञ , संत सम्मेलन व भागवत कथा महायज्ञ में प्रवचन देने पहुंचे थे। उनके प्रवचनों की खासियत यह थी कि वे पुराण , उपनिषद या अन्य धर्म ग्रन्थों में वर्णित विषयों को उदाहरण के साथ आसानी से समझाते थे। यही वजह थी कि सामान्य इंसान को भी उनका प्रवचन बांधे रखता था। इससे प्रवचन का व्यापक स्तर पर प्रभाव भी पड़ता था


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