अरविन्द तिवारी

जगन्नाथपुरी (गंगा प्रकाश)- हिन्दुओं के सार्वभौम धर्मगुरु एवं हिन्दू राष्ट्र के प्रणेता पूज्यपाद पुरी शंकराचार्यजी भगवत्पाद शिवावतार आदि शंकराचार्य महाभाग के जन्मकाल ईसा से 507 वर्ष पूर्व की प्रमाणिकता के संबंध में चर्चा करते हुये संकेत करते हैं कि भविष्योत्तर के अनुसार कलि के दो सहस्रवर्ष व्यतीत होने पर श्रीसर्वेश्वर शिव का चार शिष्यों के सहित अवतार मान्य है। भगवत्पाद आदि शंकराचार्य  महाभाग का जन्म वैशाख शुक्ल पञ्चमी रविवार, चन्द्रमा पुनर्वसु नक्षत्र – मिथुन राशि में, सूर्य मेष राशि में, मङ्गल मकर राशि में, गुरु कर्क राशि में, शनि तुला राशि में, शुक्र मीन राशि में, बुध मेष राशि में, अभिजित् मुहूर्त में मध्याह्न काल में युधिष्ठिर सम्वत् 2631 में केरल के कालटी नामक स्थान में हुआ। भगवत्पाद के द्वारा द्वारका – शारदापीठ पर प्रतिष्ठित श्रीसुरेश्वराचार्य  के साक्षात् पट्टशिष्य श्रीचित्सुखाचार्य ने अपने शंकरविजय नामक ग्रन्थ में भगवत्पाद का आविर्भाव युधिष्ठिर सम्वत् 2631 में उद्घोषित किया है। प्राचीन शंकर विजय के अनुसार श्रीभगवत्पाद का जन्मकाल युधिष्ठिर सम्वत्  2631 तदनुसार कलि सम्वत् अनल (3), शेवधि (9), बाण (5), नेत्र (2) क्रमश: इकाई, दहाई, सैकड़ा और हजार के स्थान पर 3 , 9 ,5 , 2 अर्थात् 2593 मान्य है। ध्यान रहे,  महाभारत के अनुसार महाभारत युद्ध के पश्चात् धर्मराज युधिष्ठिर के राज्याभिषेक के छत्तीसवें वर्ष में मौसल युद्ध में यदुकुल का संहार तथा श्रीकृष्ण का लीला सम्वरण एवम् तत्पश्चात् द्रौपदी सहित पाण्डवों  का स्वर्गारोहण सिद्ध है। इस तरह युधिष्ठिर सम्वत् 36 या 37 में कलिसम्वत् 01 मानना उचित है। उक्त  रीति से युधिष्ठिर सम्वत् 2631 में और कलि सम्बत् 2631 में 36 ऋण करने पर शेष 2595 या 2631 में 37 ऋण करने पर शेष 2594 में श्रीशंकराचार्य का प्रादुर्भाव सिद्ध है। अत:  अनलशेवधिबाणनेत्रे  2593 को गत कलि समझना आवश्यक है। जिनविजय तथा महाराज सर्वजित् के ताम्रशासनम् के अनुशीलन से श्रीभगवत्पाद का जन्मकाल 2500 वर्ष पूर्व सिद्ध है। सनातन परम्परा प्राप्त युधिष्ठिर शक की अपेक्षा जैनों को अभिमत युधिष्ठिर शक 505 वर्ष अर्वाचीन है। जिनविजय के अनुसार रक्ताक्षिवत्सर युधिष्ठिर शक 2157 में भगवत्पाद श्रीशंकराचार्य का निर्वाण सिद्ध होता है ;  जो कि सनातन परम्परा के अनुसार युधिष्ठिर शक 2157 से 505 वर्ष अधिक  2662 सिद्ध होता है। अतएव उससे 31 वर्ष पूर्व 2662 से 31 ऋण करने पर 2631 युधिष्ठिर शक में आचार्य शंकर का जन्म सिद्ध होता है।  पुण्यश्लोक मञ्जरी के अनुसार कलिसम्वत् 2625 अर्थात् 2625 में 37 का योग करने पर 2662 युधिष्ठिर शक में भगवत्पाद श्रीशंकराचार्य का निर्वाण सिद्ध होता है। अत: उक्त वचनों में सर्वथा सामंजस्य है। बृहच्छंकर विजय के अनुसार श्रीभगवत्पाद शंकराचार्य के गुरुदेव योगीन्द्र श्रीगोविन्दपादाचार्य का देहावसान युधिष्ठिर शक 2646 प्लवंग सम्वत्सर कार्तिक पूर्णिमा गुरुवार सिद्ध है। अतः श्रीशंकराचार्य का जन्म तथा सन्यास युधिष्ठिर शक 2646 के पूर्व सुनिश्चित है। अद्वैतामोद के रचयिता श्रीवासुदेव अभयंकर के अनुसार भी श्रीभगवत्पाद का जन्मकाल युधिष्ठिर सम्वत् 2631 वैशाख शुक्ल पंचमी तथा तिरोधनकाल युधिष्ठिर सम्वत् 2663 कार्तिक शुक्ल पूर्णिमा मान्य है।


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