अरविन्द तिवारी की  कलम से 

जगन्नाथपुरी (गंगा प्रकाश)।– ऋग्वेदीय पूर्वाम्नाय श्रीगोवर्द्धनमठ पुरीपीठाधीश्वर एवं हिन्दू राष्ट्र के प्रणेता अनन्तश्री विभूषित श्रीमज्जगद्गुरू शंकराचार्य पूज्यपाद स्वामी श्री निश्चलानन्द सरस्वती जी महाराज भगवन्नाम जप एवं भगवत्स्मरण की महत्ता की चर्चा करते हुये संकेत करते हैं कि भगवान् का स्मरण पूर्वक स्नान करने पर देहेन्द्रिय प्राणान्तःकरण में भगवान् की सेवा – समर्चा की पात्रता के अनुरूप दिव्यता का आधान होता है ; जिसके फलस्वरूप मल निर्मोचन के साथ ही संसार मल के निवारण का मार्ग भी प्रशस्त होता है। भगवन्नाम प्रवाह सहित भगवत्स्मरण पूर्वक सुखशयन से निद्रा समाधि कल्प बन जाती है। इसी प्रकार तथा पत्नी में लक्ष्मी बुद्धि से नारायण बुद्धि से और शुद्ध सुखद वंश परम्परा की अभिव्यक्ति भावना से कुल शील के अनुरूप विवाह से लौकिक –  पारलौकिक उत्कर्ष होता है तथा परमार्थका पथ प्रशस्त होता है। पृथु  महाभाग ने जाति प्रमुख को वत्स, जाति को दोग्धा तथा सञ्चय – संस्थान को पात्र सुनिश्चित कर पृथ्वी रूपा गौ के दोहन से विविध प्रकार के अन्न प्राप्त करने का मार्ग प्रशस्त किया। तदनुसार उन्हें समस्त धान्य मनुष्यों को ; वेद ऋषियों को, अमृत एवम् मनोक वीर्य – इन्द्रियबल रूप ओज – शारीरक बलरूप सहस देवों को ; सुरासव दैत्य – दानव – असुरोंको ;  गन्ध – सङ्गीत माधुर्य – सौन्दर्य गन्धर्व तथा अप्सराओं को ; कव्य पितरों को ; हव्य देवों को ; अष्टिसिद्धि सिद्धों को ; सिद्धि एवम् विविध विद्या विद्याधरों को ; अन्तर्धान तथा कायव्यूहादि किम्पुरुषादि और मायावियों को ; रुधिरासव यक्ष – राक्षस – भूत – प्रेतों को ; विष सर्पादि विषधरों को ; तृणादि पशुओं को ; कच्चा मांस व्याघ्रादिकों को ; कीट – पतङ्ग – फलादि पक्षियों को ; रस वृक्षों को; मणि – माणिक्यादि विविध धातु स्थावर – जङ्गम – प्राणिनिकेत पर्वतों को सुलभ कराया। उक्त तथ्य श्रीमद्भागवत में सन्निहित चतुर्थ स्कन्ध के अन्तर्गत अट्ठारहवें अध्याय के अनुशीलन से सिद्ध है। पञ्चीकृत पृथ्वी के तारतम्यज संघात वृक्षादि हैं। पञ्चीकृत पृथ्वी में आकाश , वायु , तेज और जल भी सन्निहित हैं। भूमि शब्द , स्पर्श , रूप , रस और गन्ध सम्पदा से सम्पन्न है। स्थावर – जङ्गम सर्वप्राणियों के शरीर पाञ्चभौतिक हैं। अतः पृथ्वी के आधिदैविक स्वरूप गौ में उक्त सर्व अन्नों का सन्निवेश स्वभाव सिद्ध है। स्त्री के शरीर से भी पुत्र , पति , मशक , जलूका तथा वराहादि दुग्ध , शब्द , स्पर्श , रूप , रस , गन्ध , रक्त , मांस , मल आदि स्वोचित अन्न प्राप्त कर लेते है। खनिज द्रव्य , पर्वत , वन , जलाशय – नद – निर्झर – सागर आदि के अनर्गल दोहन से भूकम्प , भूस्खलन , आँधी , अतिवृष्टि , अवृष्टि , व्यष्टि – समष्टि सन्निपातादि उपद्रव सुनिश्चित है। सनातन धर्म में वित्त का लौकिक तथा पारलौकिक उत्कर्ष की भावना से धर्म , यश , अर्थ , काम और स्वजनों के लिये पाँच प्रकार से उपयोग तथा विनियोग विहित है।


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