“मृत देह से छीन लिया गया नाम और पहचान: सुप्रीम कोर्ट की चौखट पर इंसाफ की गुहार, दिल्ली पुलिस की संवेदनहीनता सवालों के घेरे में”…

 

नई दिल्ली (गंगा प्रकाश)। भारत की न्यायपालिका के समक्ष एक ऐसा मामला आया है, जिसने न केवल मानवाधिकारों की जड़ें हिला दीं हैं, बल्कि पुलिस व्यवस्था की संवेदनहीनता और तकनीकी लापरवाही की भयावह तस्वीर भी उजागर की है। सुप्रीम कोर्ट ने इस गंभीर मामले में दिल्ली पुलिस को नोटिस जारी कर स्पष्टीकरण मांगा है कि जब एक व्यक्ति की पहचान सुनिश्चित करने के लिए आवश्यक दस्तावेज पहले से उपलब्ध थे, तो उसे ‘अज्ञात शव’ घोषित कर उसका अंतिम संस्कार क्यों कर दिया गया?

मामला है — चाको करिम्बिल बनाम भारत संघ (W.P.(C) No. 255/2025)

याचिकाकर्ता एक पूर्व सैनिक हैं, जिन्होंने अपने भतीजे की तलाश में दिल्ली की सड़कों से लेकर पुलिस थानों तक दर-दर की ठोकरें खाईं, लेकिन तीन दिन बाद उसी युवक का शव पुलिस ने ‘अज्ञात’ कहकर जला दिया बिना किसी बायोमेट्रिक पुष्टि, बिना परिवार को सूचित किए, और बिना धार्मिक रीति-रिवाजों के।

घटना की समयरेखा – क्रूर उपेक्षा की कहानी :

  • 14 अक्टूबर 2024: वसंत कुंज थाना, दिल्ली में युवक की गुमशुदगी की रिपोर्ट दर्ज, साथ में आधार कार्ड और रंगीन तस्वीर सौंपी गई।
  • 17 अक्टूबर 2024: IGI एयरपोर्ट थाना क्षेत्र में एक शव बरामद। अस्पताल ने ‘ब्रॉट डेड’ घोषित किया। पुलिस ने मृतक की पहचान की औपचारिक प्रक्रिया को नज़रअंदाज़ करते हुए शव को ‘अज्ञात’ घोषित कर सीधे इलेक्ट्रिक शवदाहगृह भेज दिया।

याचिका के गंभीर आरोप :

  • पुलिस ने बायोमेट्रिक पहचान का उपयोग नहीं किया, जबकि आधार कार्ड उपलब्ध था।
  • दिल्ली पुलिस के स्टैंडिंग ऑर्डर 252/2019 और ZIPNet प्रणाली, जो लापता व्यक्तियों और अज्ञात शवों की पहचान के लिए बनाई गई हैं, को पूरी तरह दरकिनार कर दिया गया।
  • केरल ZIPNet से नहीं जुड़ा, इसलिए सूचना उस राज्य तक पहुँची ही नहीं – यानी तकनीक नहीं, सिस्टम की इच्छाशक्ति विफल रही।

संविधान की आत्मा पर चोट : 

याचिका में स्पष्ट रूप से उल्लेख है कि यह घटना केवल एक तकनीकी भूल नहीं, बल्कि भारत के संविधान द्वारा प्रदत्त मौलिक अधिकारों का घोर उल्लंघन है:

  • अनुच्छेद 21 – जीवन और सम्मानजनक मृत्यु का अधिकार
  • अनुच्छेद 14 – कानून के समक्ष समानता
  • अनुच्छेद 19(1)(a) – सत्य की अभिव्यक्ति का अधिकार
  • अनुच्छेद 25 – धार्मिक स्वतंत्रता और संस्कारों का पालन

 

“जब परिवार जीवित था, दस्तावेज मौजूद थे, तो शव को ‘अज्ञात’ ठहराने का यह अपराध कैसे न्यायोचित हो सकता है?” — याचिकाकर्ता का सवाल

सुप्रीम कोर्ट का सख्त रुख :

न्यायमूर्ति सूर्यकांत और एन. कोटिस्वर सिंह की पीठ ने इस मुद्दे को अत्यंत गंभीर मानते हुए दिल्ली पुलिस को कारण बताओ नोटिस जारी किया है। कोर्ट ने यह स्पष्ट किया है कि आधुनिक तकनीक के इस युग में बायोमेट्रिक पहचान को नजरअंदाज़ करना किसी राज्य की नाकामी नहीं, बल्कि मानवाधिकारों के प्रति उसकी असंवेदनशीलता का प्रतीक है।

याचिका में की गई प्रमुख मांगें :

  • जांच आयोग का गठन कर दोषी पुलिस अधिकारियों की जवाबदेही तय की जाए।
  • पीड़ित परिवार को क्षतिपूर्ति दी जाए, जिन्होंने अपने पुत्र के अंतिम दर्शन तक का अधिकार खो दिया।
  • अज्ञात शवों की पहचान के लिए राष्ट्रीय स्तर पर ZIPNet को अनिवार्य किया जाए।

यह मामला सिर्फ एक मृतक की पहचान का नहीं, पूरे सिस्टम की ज़िंदा संवेदना का इम्तिहान है। आज एक बेटे की राख से सवाल उठ रहा है क्या पहचान केवल जीवित रहने तक सीमित है? क्या मरने के बाद भी नागरिक अधिकारों की कोई कीमत नहीं बचती?


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