नई दिल्ली (गंगा प्रकाश)– नवरात्रि एक हिन्दू महापर्व है जो वर्ष में चार बार पौष , चैत्र , आषाढ़ और आश्विन माह में आता है। लेकिन साल में दो बार चैत्र और आश्विन माह में ही खास तौर से नवरात्रि की पूजा की जाती है । शरद ऋतु के आश्विन माह में आने के कारण इन्हें शारदीय नवरात्रि का नाम दिया गया है। शक्ति की आराधना उपासना का शारदीय नवरात्रि हिन्दूओं की विशेष आस्था का पर्व है , जो देश के विभिन्न हिस्सों में अलग-अलग तरीकों से मनाया जाता है। इस दौरान लोग देवी के अलग अलग नौ रूपों की पूजा , आराधना कर उनसे सुख , समृद्धि की आशीर्वाद मांँगते हैं। शक्ति उपासना के पर्व शारदीय नवरात्रि में माता दुर्गा नौ दिनों के लिये पृथ्वी पर आती हैं और अपने भक्तों की साधना से प्रसन्न होकर उन्हें आशीर्वाद प्रदान करती हैं। इस संबंध में विस्तृत जानकारी देते हुये अरविन्द तिवारी ने बताया कि नवरात्रि के पहले तीन दिन देवी दुर्गा के ऊर्जा और शक्ति की उपासना का महत्व होता है। फिर नवरात्रि के चौथे, पांचवें और छठे दिन पर सुख और समृद्धि प्रदान करने वाले देवी लक्ष्मी, सातवें दिन कला और ज्ञान की देवी सरस्वती की उपासना होती है। अष्टमी और नवमी तिथि पर कन्या पूजन कर माता की विदाई की जाती है। नवरात्रि के दौरान देवी भक्त भारत वर्ष में फैले मां के शक्तिपीठों के दर्शन करने जाते हैं।हिन्दू कैलेंडर के अनुसार यह नवरात्रि शरद ऋतु में अश्विन शुक्ल पक्ष से शुरू होकर पूरे नौ दिनों तक चलती हैं। इस बार शारदीय नवरात्रि आज 26 सितंबर सोमवार से प्रारंभ हो रही है , जो 04 अक्टूबर बुधवार तक चलेगी और 05 अक्टूबर को विजयादशमी (दशहरा) के दिन मां दुर्गा की प्रतिमा का विसर्जन किया जायेगा। वैसे तो मातारानी सिंह की सवारी करती हैं , लेकिन नवरात्रि में धरती पर आती हैं तो उनकी सवारी बदल जाती है। मां जगदम्बे की सवारी नवरात्रि के प्रारंभ होने वाले दिन पर निर्भर करती है। नवरात्रि की शुरुआत जिस दिन होती है , उस दिन के आधार पर उसकी सवारी तय होती है। इसी प्रकार से वह जिस दिन विदा होती है , उस दिन के आधार पर ही उसकी प्रस्थान की सवारी भी तय होती है। ज्योतिषशास्त्र के अनुसार इस बार की शारदीय नवरात्रि को बेहद शुभ माना जा रहा है , क्योंकि इस बार मातारानी हाथी पर सवार होकर आ रही हैं। नवरात्रि में जब मां दुर्गा हाथी पर सवार होकर आती हैं तो ये बेहद ही शुभ माना जाता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार इस पर्व की शुरुआत तब हुई जब मां दुर्गा के द्वारा राक्षस महिषासुर का वध कर दिया गया। दोनों के बीच नौ दिनों तक लड़ाई चली और दसवें दिन मां दुर्गा ने राक्षस का वध कर दिया था। उसी वक्त से नवरात्रि का पर्व मनाने की परंपरा चली आ रही है। नवरात्रि से जुड़े कई रीति-रिवाजों के साथ कलश स्थापना का विशेष महत्व है। नवरात्रि की शुरुआत घट स्थापना के साथ ही होती है जिसे कलश स्थापना भी कहा जाता है जो शक्ति की देवी का आह्वान है। नवरात्रि में मां दुर्गा की पूजा में तीन चीजों का विशेष महत्व है इसलिये इन तीन चीजों के बारे में विशेष ध्यान रखना चाहिये क्योंकि नवरात्रि में इन तीन चीजों के बिना मांँ दुर्गा की पूजा अधूरी मानी जाती है। मांँ की पूजा में लाल रंग का विशेष महत्व है. नवरात्रि की पूजा में इस रंग सर्वाधिक प्रयोग होता है. क्योंकि मां दुर्गा को लाल रंग अधिक पसंद है। इसलिये घटस्थापना और माता स्थापित करने के लिये लाल रंग के वस्त्र से आसन सजाया जाता है , इसके साथ ही लाल चुनरी और कुमकुम का टीका लगाया जाता है। नवरात्रि का पूजन आरंभ करने से पूर्व मां दुर्गा को लाल रंग की चुनरी चढ़ाई जाती है। ध्यान देने वाली बात ये है कि मां दुर्गा को कभी भी रिक्त चुनरी नहीं चढ़ानी चाहिये , चुनरी के साथ सिंदूर यानि श्रंगार की सामग्री, मेवा, फल, मिष्ठान, नारियल आदि भी चढ़ाने चाहिये। नवरात्रि में अखंड ज्योति का विशेष महत्व है। अखंड ज्योति से घर में सकरात्मक ऊर्जा आती है और नकारात्मक ऊर्जा का नाश होती है। अखंड ज्योति को जलाने से पूर्व स्वच्छता का पूर्ण ध्यान रखा जाना चाहिये , ज्योति जलाने के लिये पीतल या मिट्टी के बने दीपक का प्रयोग करना चाहिये गाय के घी से इस अखंड ज्योति को जलाया जाता है।

प्रतिदिन लगने वाले भोग

माँ दुर्गा के नवों रूपों की पूजा करते समय प्रतिदिन अलग-अलग रंग के कपड़ा पहनने और माता को अलग-अलग भोग लगाने की परंपरा है। पहले दिन माता शैलपुत्री की पूजा का विधान है , इस दिन पीले रंग का कपड़ा पहनना शुभ माना जाता है और इस दिन माँ भगवती को घी का भोग लगाया जाता है ताकि हम निरोग रहें। दूसरे दिन ब्रह्मचारिणी की पूजा होती है , इस दिन हरे रंग का कपड़ा पहनना शुभ माना जाता है और इस दिन लम्बी उम्र की कामना के लिये शक्कर का भोग लगाया जाता है। तीसरे दिन चंद्रघंटा की पूजा का विधान है इस दिन हल्के भूरे रंग का कपड़ा पहनना शुभ माना जाता है और समस्त दुखों के नाश के लिये माँ भगवती को दूध का भोग लगाया जाता है। चौथे दिन कुष्माण्डा की पूजा का विधान है इस दिन संतरा रंग का कपड़ा पहनना शुभ माना जाता है और इस दिन देवी को मालपुआ का भोग लगाया जाता है पांचवें दिन स्कंदमाता की पूजा का विधान है इस दिन सफेद रंग का कपड़ा पहनना शुभ माना जाता है एवं केला का भोग लगाया जाता है। छठवे दिन कात्यायनी की पूजा का विधान है इस दिन लाल रंग का कपड़ा पहनना शुभ माना जाता है और इस दिन शहद का भोग लगाया जाता है। सातवें दिन कालरात्रि की पूजा का विधान है इस दिन नीले रंग का कपड़ा पहनना शुभ है और इस दिन देवी को गुड़ या नींबू काटकर अर्पित किया जाता है। आठवें दिन महागौरी की पूजा का विधान है इस दिन गुलाबी कपड़ा पहनना शुभ माना जाता है और नारियल का भोग लगाया जाता है। नवरात्रि के अंतिम दिन माँ भगलती की पूजा सिद्धिदात्री के रूप में की जाती है इस दिन बैगनी रंग का कपड़ा पहनना शुभ होता है और देवी को अनार का भोग लगाना अत्यंत लाभदायक माना जाता है।

देवी के आने-जाने का वाहन तय

ज्योतिषशास्त्र और देवीभग्गवत पुराण के अनुसार मां दुर्गा का आगमन आने वाले भविष्य की घटनाओं के बारे में हमें संकेत देता है। देवीभाग्वत पुराण में इस बात का जिक्र है की देवी के आगमन का अलग-अलग वाहन है।

— शशिसूर्ये गजारूढ़ा शनिभौमे तुरंगमे।

गुरौ शुक्रे चदोलायां बुधे नौका प्रकी‌र्त्तिता ।।

अर्थात सोमवार या रविवार को घट स्थापना होने पर मां दुर्गा हाथी पर सवार होकर आती हैं। शनिवार या मंगलवार को नवरात्रि की शुरुआत होने पर देवी का वाहन घोड़ा माना जाता है, गुरुवार या शुक्रवार को नवरात्र शुरू होने पर देवी डोली में बैठकर आती हैं। बुधवार से नवरात्र शुरू होने पर मां दुर्गा नाव पर सवार होकर आती हैं। देवी के वाहन का शुभ-अशुभ असर माता दुर्गा जिस वाहन से पृथ्वी पर आती हैं, उसके अनुसार सालभर होने वाली घटनाओं का भी आंकलन किया जाता है।

— गजे च जलदा देवी क्षत्र भंग स्तुरंगमे।

नोकायां सर्वसिद्धि स्या ढोलायां मरणंधुवम्।।

अर्थात देवी जब हाथी पर सवार होकर आती है तो पानी ज्यादा बरसता है। घोड़े पर आती हैं तो पड़ोसी देशों से युद्ध की आशंका बढ़ जाती है। देवी नौका पर आती हैं तो सभी की मनोकामनायें पूरी होती हैं और डोली पर आती हैं तो महामारी का भय बना रहता हैं।

कौन से वाहन पर सवार होकर जाती हैं देवी

माता दुर्गा आती भी वाहन से हैं और जाती भी वाहन से हैं। यानि जिस दिन नवरात्र का अंतिम दिन होता है , उसी के अनुसार देवी का वाहन भी तय होता है। देवी भागवत के अनुसार-

— शशि सूर्य दिने यदि सा विजया महिषागमने रुज शोककरा।

शनि भौमदिने यदि सा विजया चरणायुध यानि करी विकला।।

बुधशुक्र दिने यदि सा विजया गजवाहन गा शुभ वृष्टिकरा।

सुरराजगुरौ यदि सा विजया नरवाहन गा शुभ सौख्य करा॥

रविवार या सोमवार को देवी भैंसे की सवारी से जाती हैं तो देश में रोग और शोक बढ़ता है। शनिवार या मंगलवार को देवी मुर्गे पर सवार होकर जाती हैं, जिससे दुख और कष्ट की वृद्धि होती है। बुधवार या शुक्रवार को देवी हाथी पर जाती हैं। इससे बारिश ज्यादा होती है। गुरुवार को मांँ दुर्गा मनुष्य की सवारी से जाती हैं। इससे सुख और शांति की वृद्धि होती है।


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