अरविन्द तिवारी 

जगन्नाथपुरी (गंगा प्रकाश)- हिन्दुओं के सार्वभौम धर्मगुरु एवं हिन्दू राष्ट्र के प्रणेता पूज्यपाद पुरी शंकराचार्यजी अट्ठारह संख्या की वेदसम्मत महत्ता की चर्चा करते हुये संकेत करते हैं कि अन्न से प्राणी उत्पन्न होते हैं। अन्न वर्षा से उत्पन्न होता है। वृष्टि तदर्थ कारीरी आदि अदृष्ट संज्ञक यज्ञ से होती है। देवता , हवनीय द्रव्य , मन्त्र , विधि , सूत्र , ऋत्विक् , यजमान , अन्नदान , दक्षिणा एवम् मनोयोग के संयोग से निष्पन्न यज्ञ कर्मविशेष से समुद्भूत है। कर्म ऋक् , यजुः , साम संज्ञक शब्द ब्रह्मात्मक वेद से उत्पन्न होता है। शब्द ब्रह्मात्मक वेद अक्षर संज्ञक परब्रह्म से समुद्भूत है। अतएव वेदविहित कर्म समुद्भूत यज्ञ में सदा ही अक्षराधिष्ठित शब्द ब्रह्मात्मक वेद सन्निहित है। बिना अग्नि और हवि का आरोप किये यज्ञ का व्यवहार कहीं भी नहीं हो सकता। इस आरोप के द्वारा यज्ञ का स्वरूप अत्यन्त व्यापक हो गया है। यजमान , पत्नी तथा अध्वर्यु , होता , ब्रह्मा , उद्गाता , ब्राह्मणाच्छंसी , प्रस्तोता , मैत्रावरुण , प्रति प्रस्तोता , प्रतिहर्ता , पोता , अच्छावाक् , नेष्टा , आग्नीध्र , सुब्रह्मण्य , ग्रावस्तुत , उन्नेता सम्पूर्ण यज्ञों के प्रवक्ता उक्त षोडश श्रेष्ठ ऋत्विक् ,  यज्ञपात्र , दर्भ , स्रुव् , हवि , वेदि , यूप , रशना , इष्टि , दक्षिणा , अवभृथादि के योग से मुख्य यज्ञ का सम्पादन होता है। सोलह ऋत्विक् तथा एक यजमान और उसकी पत्नी के योग से अट्ठारह संख्या की सिद्धि होती है। एक संलग्न सत्रह शून्य के योग से परार्द्ध की सिद्धि होती है। अष्टादश पुराण , अष्टादश अक्षौहिणी सेना , अष्टादश दिन पर्यन्त श्रीराम – रावण का द्वन्द्वयुद्ध , अष्टादश दिन पर्यन्त महाभारत युद्ध , श्रीमद्भगवद्गीता के अष्टादश अध्याय , श्रीमद्भगवद्गीता 2.55 से 72 पर्यन्त अट्ठारह श्लोकों में स्थित प्रज्ञ के लक्षण आदि की दृष्टि से अट्ठारह संख्या का अद्भुत महत्त्व है। कोष्ठाग्नि , दर्शनाग्नि और ज्ञानाग्नि – संज्ञक त्रिविध अग्नि संस्थान होने के कारण देह का नाम शरीर है। भक्ष्य – भोज्य (अशित) , लेह्य – चोष्य संज्ञक चतुर्विध तथा पेय (पीत) सहित पञ्चविध भोज्य पदार्थ का पाचन कोष्ठाग्नि से होता है। रूपदर्शन नेत्र संज्ञक दर्शनाग्नि से होता है। शुभ अशुभ कर्म का दहन ज्ञानाग्नि से होता है। अभिप्राय यह है कि अन्न रूप और कर्म – संज्ञक हवनीय द्रव्य हैं । कोष्ठ , नेत्र और ज्ञान – अग्नि हैं। उदर में कोष्ठाग्नि है। नेत्र में दर्शनाग्नि है। हृदय में ज्ञानाग्नि है। नेत्र से भोज्य का दर्शन होता है और मुख से चवर्ण तथा रसास्वादन होता है I नेत्र में सूर्य और मुख में अग्नि की प्रतिष्ठा है। सूर्य और अग्न में तादात्म्य है। इस प्रकार मुख और नेत्र का तादात्म्य है ; अतः मुख और नेत्र में आहवनीय अग्नि है। उदर में गार्हपत्याग्नि है। हृदय में दक्षिणाग्नि है। श्रीमद्भगवद्गीता में उल्लेखित वचनों के अनुशीलन से जगत् अग्नि और सोमात्मक सिद्ध है। पाचक तथा उद्दीपक अग्नि भोक्ता तथा अन्नप्रद अन्नात्मक सोम भोग्य (उपकरण) है। अतएव जीवन और जगत् की यज्ञमयता सिद्ध है तथा अन्न , जल तथा चन्द्र की एकरूपता सिद्ध है।  मैत्रायण्य् उपनिषत् के अनुशीलन से प्राणवायु, अग्नि और सूर्य की एकरूपता है तथा सोम की अन्नरूपता तथा सूर्यभावापन्न अग्नि की अन्नादरूपता सिद्ध है। तद्वत् पृथिवी और जल की अन्नरूपता तथा अग्नि और वायु की अन्नादरूपता सिद्ध है।

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