अरविन्द तिवारी की कलम से 

जगन्नाथपुरी (गंगा प्रकाश)- हिन्दुओं के सार्वभौम धर्मगुरु एवं हिन्दू राष्ट्र के प्रणेता , विश्व मानवता के रक्षक पूज्यपाद पुरी शंकराचार्यजी आचार्य शंकर के जीवन वृत्त की चर्चा करते हुये संकेत करते हैं कि श्रीभगवत्पाद शिवावतार आदि शंकराचार्य महाभाग के पूर्वज केरल के कालटी  नामक ग्राम के निवासी थे। इनके पितामह द्विजश्रेष्ठ श्री विद्याधिराज थे। इनके पिता पण्डित प्रवर श्रीशिवगुरु थे। भविष्य पुराण प्रतिसर्ग पर्व के अनुसार श्रीशिवगुरु का भैरवदत्त नाम सिद्ध होता है। श्री भगवत्पाद की माता का नाम सती आर्याम्बा था। श्रीशिवगुरु और आर्याम्बा ने वृद्धावस्था में पुत्ररत्न को प्राप्त करने की भावना से वृषाचलेश्वर में शिवशक्ति की आराधना की। भगवान् शिव ने उन्हें सर्वज्ञ यशस्वी अल्पायु पुत्ररूप से स्वयं अवतीर्ण होने का वर दिया। तदनुसार शुक्ल पञ्चमी रविवार युधिष्ठिर सम्वत् 2631 नन्दन नामक सम्वत्सर में जिस पुत्ररत्न का जन्म हुआ , बारहवें दिन शिवानुग्रह सुलभ उस शिशु का नाम शंकर रखा गया। तदनन्तर श्रीब्रह्माजी ने तुलाराशि पर सूर्य के स्थित होने पर सत्ताईस नक्षत्रों के अधिपति चन्द्र मण्डल में स्वयं रुद्र को प्रतिष्ठित कर अपने लोक को प्रस्थान किया। इसे सुनकर वीरभद्र ने अत्यन्त प्रसन्न होकर अपने शरीर से अपने अंश को कर्षित कर भैरवदत्त नामक ब्राह्मण के घर भेज दिया। वहीं उनकी पत्नी के गर्भ से उनके पुत्ररूप से अवतीर्ण होकर उस घोर कलि में शंकर नाम से प्रसिद्ध हुआ। उस गुणी , वेत्ता तथा ब्रह्मचारी बालक ने शांकर भाष्य की संरचना कर उस शैवागम को उद्भासित किया , जो त्रिपुण्ड रुद्राक्षमाला , नमः शिवाय इस पञ्चाक्षर मन्त्र के रूप में शैवों के लिये अत्यन्त माङ्गलिक है। अंकानां वामतो गतिः के अनुसार शंकर शब्द में र , य के बाद का अक्षर है, अतः शुक्लादि चैत्र से वर्ष के आरम्भ की दृष्टि से चैत्र के बाद वैशाख का सूचक है ; क कवर्ग का प्रथम अक्षर होने के कारण प्रथम शुक्ल पक्ष का द्योतक है एवम् शं में सन्निहित श, य से पंचम वर्ण होने के कारण पञ्चमी तिथि का परिचायक है। इस प्रक्रम के अनुसार वैशाख शुक्ल पञ्चमी की सिद्धि होती है। चैत्र शुक्ल नवमी युधिष्ठिर सम्वत् 2636 में बालक का उपनयन संस्कार पाँच वर्ष की आयु में सम्पन्न हुआ। उसी वर्ष उनके पिता का देहान्त हो गया। कार्तिक शुक्ल एकादशी युधिष्ठिर सम्वत् 2639 में आठ वर्ष की आयु में शंकर ने सन्यास पथ पर प्रयाण किया। सर्वभूतहृदय श्रीशुकदेवजी के शिष्य श्रीगौड़पादाचार्य के प्रशिष्य श्रीशंकर ने श्री गोविन्दपादाचार्य से सन्यास दीक्षा विधिवत् प्राप्त कर फाल्गुन शुक्ल द्वितीया युधिष्ठिर सम्वत् 2640 में कुल नौ वर्ष की आयु में उनसे विधिवत् उपदेश प्राप्त किया। श्रीभगवत्पाद शंकराचार्य ने बदरिकाश्रम में युधिष्ठिर सम्वत् 2640 से ज्येष्ठ कृष्ण 30 (अमावास्या) युधिष्ठिर सम्वत् 2646 तक मात्र नौ से सोलह वर्ष की आयु तक श्रीविष्णुसहस्रनाम , श्रीमद्भगवद्गीता , ईश – केनादि उपनिषदों , ब्रह्मसूत्रों आदि पर अद्भुत भाष्यों की संरचना की। उन्होंने प्रपञ्चसार नामक तन्त्र ग्रन्थ की एवम् विवेक चूड़ामणि आदि प्रकरण ग्रन्थों एवम् सौन्दर्य लहरी आदि स्तोत्र ग्रन्थों की भी यथावसर संरचना की। उन्होंने बद्रिकाश्रम में श्रीमन्नारायण की प्रतिष्ठा की तथा बद्रिकाश्रम क्षेत्र में ज्योतिर्मठ का निर्माण कराया।


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