अरविन्द तिवारी की कलम से

जगन्नाथपुरी (गंगा प्रकाश) – हिन्दुओं के सार्वभौम धर्मगुरु एवं हिन्दू राष्ट्र के प्रणेता पूज्यपाद पुरी शंकराचार्यजी श्रीमण्डन मिश्र एवं भारती देवी के जन्म एवं परिणय बंधन की चर्चा करते हुये उद्धृत करते हैं कि एक बार ब्रह्मलोक में श्रीब्रह्माजी से सर्वज्ञ कल्प महर्षि वृन्द वेदाध्ययन कर रहे थे। महर्षि दुर्वासा स्वर उच्चारण में एक भूल कर बैठे। सर्व विद्याधिष्ठात्री शब्दब्रह्म स्वरूपा देवी सरस्वती सहसा हँस पड़ीं। बस क्या था , स्वभाव से क्रोधी दुर्वासा आग बबूले हो गये। वे लाल लाल नेत्रों से भारती को निहारने लग गये। उन्होंने उसे शाप देते हुये कहा – हे अविनीते , अवनी तलपर मनुष्य होकर जन्म लो। भय विह्वल भारती ने महर्षि के चरण पकड़ कर उन्हें मनाना प्रारम्भ किया। महर्षियों ने भी अनुनय विनय करना प्रारम्भ किया। तब शाप विमोचक दुर्वासा ने कहा कि मेरे शाप के कारण तुम्हें मर्त्यलोक में मानवी होना ही पड़ेगा , किन्तु भगवान् शिव जब मनुष्य रूप से अवतीर्ण होंगे , तब उनके दुर्लभ प्रयोजन को सिद्ध कर उनके दर्शन के प्रभाव से तुम शीघ्र ही ब्रह्मलोक आ जाओगी। कालान्तर में सरस्वती भूमण्डल स्थित भारत में ब्रह्मशाप के वशीभूत होकर अपनी सर्वज्ञता को विलुप्त किये बिना ब्राह्मण कुल में शोणनद के तटवर्ती ग्राम में अवतीर्ण हुई। किशोरावस्था में ही उसकी सर्वज्ञता की प्रसिद्धि सर्वत्र हो गयी। उधर सदाचार , सरस्वती और श्रीसम्पन्न ब्राह्मण कुल में ब्रह्माजी मण्डन नाम से अवतीर्ण हुये। मण्डन ने सौन्दर्य , शील , सुकुमारता, स्नेह , सर्वज्ञतादि सम्पन्न सरस्वती का यशोगान सुना ; तद्वत् सरस्वती ने सौन्दर्य , शील , सुकुमारता , स्नेह और अद्भुत वैदुष्य तथा वाग्मिता सम्पन्न श्रीमण्डन की कीर्ति का श्रवण किया। वे निसर्ग सिद्ध प्रेमपाश में बँधकर परस्पर सम्मिलन की आतुरतापूर्ण प्रतीक्षा करने लगे। वे स्वप्न में भावना की प्रगल्भता से सुलभ दर्शन तथा सम्भाषणदि के कारण परस्पर संलग्न रहते , किन्तु जगने पर वियुक्त हो जाते। दोनों सम्मिलन की उत्कट लालसा के कारण चिन्तातुर, कृश, अमनस्क , आलसी, व्यवहार से परम उपराम और असम्भावित भय से आक्रान्त परिलक्षित होते। यद्यपि उन्हें अन्न, जल, परिधान, स्वामी, सखा, सेवक, श्री,कीर्ति, सुयश, अनहंकार, आरोग्य, अपराजय, धर्मशीलता, अलोभ, अबैर, अक्रोधाधि के कारण मनस्ताप असम्भव था, अल्पायु के कारण कामज्वर की कल्पना उनके परिजनों को नहीं थी, तथापि फलबल कल्प्य किसी मनोव्यथा की कल्पना अवश्य थी। इष्ट की हानि और अभिलषित की असिद्धि से देहधारियों को दु:ख उत्पन्न हुआ करते हैं ; परन्तु देखने पर भी मुझे ये दोनों कारण दृष्टिगोचर नहीं होते। बिना कारण के कार्य की समुत्पत्ति सम्भव नहीं, यह तथ्य भी अकाट्य है ; अतः इसका कोई मेरी दृष्टि से अगम्य कारण अवश्य होना चाहिए । वह भोली – भाली किशोरी थी उसकी नासिका तथा दन्त पंक्ति मनोहर थी। उसके कपोल तथा मुख बहुत सुन्दर थे। उसके समान कानों में कुण्डल झिलमिला रहे थे। उस किशोरी श्यामा का कटिप्रदेश भव्य था I वह पीले रङ्ग की साड़ी और सोने की करधनी पहने हुये थी तथा चलते  समय चरणों से नूपुरों की झंकार करती जाती थी। अधिक क्या वह साक्षात् कोई देवी – जान पड़ती थी।


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