अरविन्द तिवारी 

जगन्नाथपुरी (गंगा प्रकाश)। हिन्दुओं के सार्वभौम धर्मगुरु एवं हिन्दू राष्ट्र के प्रणेता पूज्यपाद पुरी शंकराचार्य जी सद्गुरु कृपा की महत्ता की चर्चा करते हुये संकेत करते हैं कि मनुष्य जीवन में स्व अधिकार अनुरूप सकल वेदशास्त्र सिद्धान्त अनुशीलन – सुलभ अत्यन्त सुकृत के फलस्वरूप सत्पुरुषों का सङ्ग प्राप्त होता है। उसके फलस्वरूप विधि – निषेध विवेक और सदाचार अनुपालन सम्भव होता है। उसके फलस्वरूप अन्तःकरण में सद्गुरु कृपा कटाक्ष की उत्कण्ठा का उदय होता है। सद्गुरु कृपा कटाक्ष की समुपलब्धि के फलस्वरूप सर्व सिद्धियों की सिद्धि तथा सर्वबन्धों की विनिवृत्ति सुलभ होती है, सर्व विघ्नों का उच्छेद होता है एवं सर्व श्रेयों की स्वतः स्फूर्ति होती है। जैसे जन्मान्ध को रूप ज्ञान असम्भव है ; वैसे ही गुरूपदेश के बिना कोटि कल्प में भी तत्त्व ज्ञान असम्भव है। सद्गुरु कृपाकटाक्ष सुलभ साधक को सुगमता पूर्वक समुपलब्ध तत्त्व ज्ञान का प्रकार यह है कि भगवत्कथा श्रवणादि में श्रद्धा होती है, तदनन्तर हृदय स्थित दुर्वासना सहित सर्व कामना का विनाश होता है। उसके फलस्वरूप हृत्पद्म कर्णिका पर परमात्मा का आविर्भाव होता है। उसके फलस्वरूप दृढ़तरा भक्ति, विरक्ति सहित तत्त्वबोध का आविर्भाव होता है। तत्त्वबोध के दृढ़ अभ्यास के फलस्वरूप परिपक्व विज्ञान तथा तदनन्तर मुमुक्षु जीवन्मुक्त होता है। परमानन्द स्वरूप, परात्पर, अविनाशी एवम् निर्गुण परमात्मा एक ही है, किन्तु भेदबुद्धि से वह वह भिन्न – भिन्न अनेक रूप धारण करने वाला प्रतीत होता है। मायाच्छन्न मतिमान् ही माया के कारण परमात्मा में भेद देखते हैं। अतः मुमुक्षु योगबल से माया का त्याग करे। भेदबुद्धि प्रदायिनी माया न सद्रूप है, ना असद्रूप, ना सत् – असत् – उभयरूप ही। अतएव उसे अनिर्वचनीय समझना चाहिये। अज्ञान शब्द से माया का ही बोध होता है। अतः जो माया को जीत लेते हैं. उनके अज्ञान का विच्छेद हो जाता है। जो इस विनाशशील सर्व शरीरों में अव्यक्त भाव से स्थित परमात्मा का अनुदर्शन करता है, वह अनात्म वस्तुओं का अतिक्रमण कर ब्रह्मभाव को प्राप्त होने में समर्थ होता है। सर्व धर्मो की अपेक्षा मोक्ष का एकमात्र साधन ज्ञान ही वरिष्ठ है, ज्ञान से उत्कृष्ट धर्म अन्य नहीं है। यह वेदार्थ निर्णय है। जो प्रज्ञान घन प्रत्यगात्मा सच्चिदानन्द स्वरूप अद्वितीय ब्रह्म है, वह सर्व भूतों की प्रतिष्ठा और विद्या का विषय है, ना कि कर्म का। वह अद्वितीय ब्रह्म मैं हूँ ऐसा निश्चय कर मननशील मुनि कृतकृत्य होता है। सदा स्वच्छ, सर्वदोष विवर्जित जीवन्मुक्त का कुछ भी कर्त्तव्य शेष नहीं रहता। देहेन्द्रिय प्राणान्तःकरण के द्वारा सम्पादित कर्मों से वह लिप्त नहीं होता। जो कर्तृत्व अहंकार और भोक्तृत्व अहंकार से रहित है, जिसकी बुद्धि कर्म तथा भोग से अलिप्त रहती है, जो करता हुआ अथवा न करता हुआ असङ्ग रहता है, वह वेदान्त शास्त्र तथा तत्त्वज्ञ मनीषियों द्वारा जीवन्मुक्त कहा जाता है। कर्म प्रवृत्ति रूप है। ज्ञान निवृत्ति संज्ञक हमक सन्न्यास रूप है। अतः ज्ञान को आत्मसात् कर मानव जीवन सम्प्राप्त बुद्धिमान् सन्यास ग्रहण करते हैं।

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