अरविन्द तिवारी 

जगन्नाथपुरी (गंगा प्रकाश)– ऋग्वेदीय पूर्वाम्नाय श्रीगोवर्द्धनमठ पुरीपीठाधीश्वर अनन्तश्री विभूषित श्रीमज्जगद्गुरू शंकराचार्य पूज्यपाद स्वामी श्रीनिश्चलानन्द सरस्वती जी महाराज जी स्त्री और पुरूष के एक दूसरे के पूरकता के संबंध में चर्चा करते हुये संकेत करते हैं कि वर्ण साम्य की दृष्टि से शुक्र शुक्ल सोम – सदृश है और शोणित लोहित सूर्य – सदृश है। सोम तथा सत्वसदृश जल शुक्ल है, सूर्य तथा रज:सदृश तेज लोहित है। अत: बहि: सोम अन्त: सूर्याग्नि शुक्र है। बहि: सूर्याग्नि अन्त: सोम शोणित है। सन्निकट सूर्य का नाम अग्नि है और दूरस्थ अग्नि का नाम सूर्य है । अशित – पीत – लेह्य – चोष्य का पाचक होने के कारण वैश्वानररूप कोष्ठाग्नि में भोक्तृत्व है। रसात्मक सोम भोग्य अन्नमय है, अन्न की उत्पत्ति में सोमसदृश सूर्य तथा अग्नि का भी योगदान है। अग्नि में विधिवत् समर्पित आहुति आदित्यभावापन्न होकर वृष्टि, अन्न और प्रजारूप से प्राप्त होती है। अग्नियोग से द्रव्यसूक्ष्मविपाकात्मक हविसार सर्वस्व आहूति रविमण्डल में सन्निहित होती है। रविमण्डल से तादात्मयापन्न सोममण्डल है। सोममण्डल में सन्निहित बह्निमण्डल है, बह्निमण्डल में उद्दीप्त सत्वगुण सर्वेश्वर अच्युत का अभिव्यञ्जक संस्थान है। इस प्रकार ; अग्नि, रवि, सोम, वह्नि सत्वमण्डलक्रम से अच्युत सर्वेश्वर को आहुति सम्प्राप्त होती है। तद्वत् साधकेन्द्र द्वारा सेवित अन्नाहुति औदर्याग्नि से प्राणाग्नि, प्राणाग्नि से मनोरूपाग्नि, मनोमयाग्नि से बुद्धिमयाग्नि, बुद्धिरूप विज्ञानमयाग्नि से चित्तमयाग्नि तथा चित्तमयाग्नि से वासुदेवाग्नि में सन्निहित होती है। चन्द्रमा आह्लादक तथा प्रकाशक है , सूर्य तापक तथा प्रकाशक है। अग्नि, सूर्य, सोमात्मिक स्त्री और पुरूष एक – दूसरे के उद्दीपक, प्रकाशक और आह्लादक हैं। बहिश्चन्द्र अन्त: सूर्याग्नि पुरूष में बाह्य भोग्यत्व तथा अभ्यन्तर भोक्तृत्व है । बहि: सूर्याग्नि और अन्तश्चन्द्र स्त्री में बाह्य और भोक्तृत्व और अभ्यन्तर भोग्यत्व है। अतएव स्त्री और पुरूष एक –  दूसरे के  पूरक हैं । स्त्री प्रकृतिप्रधाना शब्दब्रह्मरूपा है, पुरूष पुरूषप्रधान परब्रह्मरूप है ।  विकास विमर्श – सनातन धर्म में सम्पन्नता के नाम पर दरिद्रता को प्राप्त कराने की अदूरदर्शिता नहीं है। मद्य, द्यूत, अपवित्रता, हिंसा, चोरी, तस्करी, कच्चे माल का निर्यात और ऋण का झञ्झावात, विश्वासघात, कृत्रिम व्यक्तित्व, श्रम के प्रति अरुचि, असंयम, विषयलम्पटता, बहिर्मुखता, वर्णसंकरता तथा कर्मसंकरता की पराकाष्ठा  , शीलापहरण, अराजकता, धर्म और अध्यात्म के मार्ग पर चलने के लिये अपेक्षित धैर्य का विलोप, देहात्मवाद, प्रज्ञाशक्ति और प्राणशक्ति की क्षीणता महायान्त्रिक भौतिक युग का उपहार है। उक्त दूषणों से विमुक्त जीवनपद्धति और शासन – संस्थान के कारण सनातन धर्म समृद्धि  , सुख और शान्ति से सम्पन्न दर्शन है। विकास के नाम पर गोवंश, गङ्गादि तथा सती, विप्रादि दिव्य वस्तुओं और व्यक्तियों को विकृत, दूषित, क्षुब्ध तथा विलुप्त करने का प्रकल्प अवश्य ही विघातक है।


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