अरविन्द तिवारी की कलम से 

जगन्नाथपुरी (गंगा प्रकाश) – ऋग्वेदीय पूर्वाम्नाय श्रीगोवर्द्धनमठ पुरीपीठाधीश्वर एवं अनन्तश्री विभूषित श्रीमज्जगद्गुरू शंकराचार्य पूज्यपाद स्वामी निश्चलानन्द सरस्वती जी महाराज ईश्वर की सगुण निराकर स्वरूप की चर्चा करते हुये संकेत करते हैं कि यह सनातन नियम है कि कोई भी शक्तिमान् निज शक्ति तथा उसके विविध कार्यों के योग से सद्वितीय नहीं होता। यथा स्वनिष्ठ घटादि को उत्पन्न करने वाली स्निग्धता नाम की शक्ति तथा घटादि रूप विविध कार्यों के योग से मृत्तत्त्व सद्वितीय नहीं होता , सर्वथा अद्वितीय ही बना रहता है। तद्वत् वेदान्त वेद्य परब्रह्म स्वनिष्ठ त्रिगुणात्मिका मायाशक्ति और उसके आकाशादि विविध कार्यों के योग से सद्वितीय नहीं होता , सर्वथा अद्वितीय ही बना रहता है। ध्यान रहे – जिनका ईश्वर सर्वभवन सामर्थ्य शून्य तथा जगत् का केवल निमित्त कारण है ; वह ज्ञानवान् , इच्छावान् तथा क्रियावान होने से सगुण है तथा साकार कार्यवर्ग के उपादान का प्रयोक्ता होने निराकार है। वह सगुण – निराकार ही है , ना कि निर्गुण और साकार। वह स्वभावत: एक ही है , ना कि स्वभावत: एक होता हुआ अवच्छेदक संस्थान भेद से अनेकI वह स्वरूपतः सगुण और निराकार ही है , ना कि निर्गुण – निराकार होता हुआ , उपाधि योग से सगुण तथा साकार। हे ईश्वर,आप एकमात्र वेद प्रमाण से ही निरूपित – लक्षित या प्रकाशित होते हैं , ना कि प्रत्यक्ष अनुमानादि किसी अन्य प्रमाण से। आप स्वरूपतः अव्यक्त हैं , अत: किसी हेतु से आपकी अभिव्यत्ति असम्भव है। आप आद्य अर्थात् सर्वकारण है , अत: आपकी अभिव्यक्ति सम्भव नहीं। आप व्यापक है , अत: किसी देशविशेष में आपकी अभिव्यक्ति सम्भव नहीं। आप ज्योति: स्वरूप – स्व प्रकाश है , अतः दीपादि अधिभूत , नेत्रादि अध्यात्म, सूर्यादि अधि दैवरूप ज्योतियों से आपका प्रकाश सम्भव नहीं। अभिप्राय यह है कि स्वप्रकाश और सर्वावभासक होने से आपकी दृष्टिगोचरता संभव नहीं। आप निर्गुण है , अत: किसी गुण से भी आपका अभिव्यञ्जन सम्भव नहीं। आप निर्विकार हैं , अत: कार्यरूप से भी आपका अवतरण सम्भव यह नहीं। आप सत्तामात्र हैं , अत: सन् घट: , सन् पट : आदि स्थलों में सत् ही घट, पट का अभिव्यञ्जक है , ना कि घटादि सत् के अभिव्यञ्जक हैं , ऐसी स्थिति में आपका अभिव्यञ्जक कोई नहीं , कारण यह है कि आपके अतिरिक्त का वास्तव अस्तित्व ही नहीं। आप निर्विशेष अर्थात् निरवयव हैं। घटत्वादि सामान्य से घटादि विशेष की अभिव्यक्ति के तुल्य भी आपकी अभिव्यक्ति सम्भव नहीं। आप निरीह अर्थात् आकाशादि के तुल्य निष्क्रिय हैं , अतएव कपाटादि के उद्घाटन के तुल्य क्रिया कलापक्ष से भी आपका अभिव्यञ्जन सम्भव नहीं। हे अनुग्रह विग्रह प्रभो ! आप आत्म माया से ही इस अद्भुत बाल विष्णुरूप से भक्तों को दृष्टिगोचर होते रहे हैं।


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