छुरा (गंगा प्रकाश)। 23 जनवरी 2011… यह तारीख छुरा के इतिहास में सिर्फ एक आपराधिक घटना नहीं, बल्कि सच की हत्या के रूप में दर्ज है। ठीक 15 साल पहले, निर्भीक पत्रकार स्वर्गीय उमेश राजपूत को उनके ही घर के प्रांगण में घुसकर अज्ञात व्यक्ति ने गोली मार दी थी। उस दिन एक इंसान नहीं मरा था, उस दिन समाज को आईना दिखाने वाली एक बेखौफ कलम को हमेशा के लिए चुप करा दिया गया था।

आज 23 जनवरी को स्व. उमेश राजपूत की 15वीं पुण्यतिथि पर तहसील पत्रकार कार्यालय छुरा में आयोजित श्रद्धांजलि सभा साधारण कार्यक्रम नहीं रही। फूलों और मौन के साथ-साथ वहां गुस्सा, पीड़ा और व्यवस्था के खिलाफ उबाल साफ दिखाई दे रहा था। पत्रकारों ने दो मिनट का मौन रखकर उन्हें श्रद्धांजलि दी, लेकिन इसके बाद जो शब्द निकले, वे सीधे सिस्टम पर वार थे।
वक्ताओं ने याद दिलाया कि इस सनसनीखेज हत्या के बाद स्थानीय पुलिस ने जांच की, फिर मामला उच्च स्तर तक पहुंचा, सीबीआई तक जांच चली, लेकिन नतीजा शून्य। फाइलें बदलीं, अफसर बदले, सरकारें बदलीं, पर हत्यारा नहीं बदला—वह आज भी खुलेआम आज़ाद है।
सभा में सबसे बड़ा सवाल यही उठा कि जब पुलिस विभाग रोज़ाना अपराधों के खुलासे कर सफलता के दावे करता है, तब एक पत्रकार की दिनदहाड़े गोली मारकर की गई हत्या 15 वर्षों से क्यों अनसुलझी है?क्या सुराग नहीं मिले?या मिले… लेकिन कहीं रुक गए?

पत्रकारों ने कहा कि स्व. उमेश राजपूत साधारण पत्रकार नहीं थे। वे ग्रामीण अंचल की सच्चाइयों, अवैध गतिविधियों, भ्रष्टाचार और शोषण के खिलाफ लगातार लिखते थे। उनकी रिपोर्टिंग कई लोगों के लिए असुविधाजनक थी। शायद इसी बेबाकी की कीमत उन्हें अपनी जान देकर चुकानी पड़ी।
श्रद्धांजलि सभा में यह बात बार-बार दोहराई गई कि यह मामला अब सिर्फ एक हत्या नहीं, बल्कि जांच एजेंसियों की कार्यप्रणाली पर लगा हुआ बड़ा प्रश्नचिह्न है। जब एक पत्रकार सुरक्षित नहीं है, तो आम नागरिक की सुरक्षा की गारंटी कौन देगा?
वरिष्ठ पत्रकारों ने कहा कि 15 साल तक हत्यारे का न पकड़ा जाना बताता है कि या तो जांच बेहद कमजोर रही, या फिर किसी स्तर पर सच्चाई तक पहुंचने से रोका गया। उन्होंने मांग की कि मामले की नए सिरे से उच्च स्तरीय समीक्षा, सार्वजनिक प्रगति रिपोर्ट और समयबद्ध जांच हो।
कार्यक्रम में नरेंद्र तिवारी, अ.समद खान, संतोष जैन, यशवंत यादव, तेजस्वी यादव, प्रकाश कुमार यादव, दिलीप बघेल, परमेश्वर राजपूत, कुलेश्वर सिन्हा, यामिनी चंद्राकर, मेष नंदन पांडेय, इमरान मेमन, अनीश सोलंकी, उज्ज्वल जैन, किशन सिन्हा, परमेश्वर यादव, तेजराम ध्रुव, परस सिन्हा, भूपेंद्र सिन्हा, विकास कुमार ध्रुव, अविनाश पांडे,येगेश्वर जांगड़े, पुनीत राम ठाकुर सहित बड़ी संख्या में पत्रकार उपस्थित रहे।
कार्यक्रम के अंत में सभी पत्रकारों ने एक स्वर में कहा कि स्व. उमेश राजपूत हत्याकांड को भुलाया नहीं जाएगा। यह मामला हर साल, हर मंच से उठेगा, जब तक हत्यारे बेनकाब नहीं होते।
श्रद्धांजलि के दीपकों के बीच किसी ने धीमे स्वर में कहा— आज 15 साल हो गए… लेकिन कातिल आज भी 2011 में ही आज़ाद घूम रहा है।

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