मैनपुर/गरियाबंद (गंगा प्रकाश)। सरकारी फाइलों में एक आवास स्वीकृत है, लेकिन जमीनी हकीकत यह है कि उस घर की नींव तक नहीं पड़ सकी। वजह सिर्फ इतनी है कि जिस व्यक्ति के नाम पर मकान स्वीकृत हुआ था, उसकी मौत हो गई और उसके बाद उसकी पत्नी पिछले दो वर्षों से अपने ही अधिकार के लिए सरकारी दफ्तरों के चक्कर लगाने को मजबूर है।
यह मार्मिक मामला बिंद्रानवागढ़ विधानसभा क्षेत्र के ग्राम हरदीभाठा का है, जहां स्वर्गीय हेमंत पटेल के परिवार का पक्के घर का सपना सरकारी प्रक्रियाओं में उलझकर रह गया है। पति के निधन के बाद परिवार की जिम्मेदारी संभाल रहीं ज्योति पटेल को उम्मीद थी कि शासन द्वारा स्वीकृत आवास की राशि मिल जाएगी और बच्चों के सिर पर सुरक्षित छत बन सकेगी, लेकिन दो साल बीत जाने के बाद भी राशि उनके खाते तक नहीं पहुंची।

गांव के लोगों का कहना है कि ज्योति पटेल ने पंचायत से लेकर विभागीय कार्यालयों तक कई बार गुहार लगाई। आवेदन दिए, अधिकारियों से मुलाकात की, दस्तावेज जमा किए, लेकिन हर बार उन्हें केवल आश्वासन ही मिला। समय गुजरता गया और फाइलें आगे बढ़ने की बात कही जाती रही, जबकि परिवार का जीवन उसी पुराने कच्चे मकान में सिमटा रहा।
बरसात की चिंता, टूटते सपनों का घर
गांव में रहने वाले लोगों के मुताबिक परिवार जिस मकान में रह रहा है, उसकी हालत अच्छी नहीं है। बारिश के मौसम में घर की छत टपकती है और हर साल मानसून परिवार के लिए नई चिंता लेकर आता है। शासन की योजना में नाम होने के बावजूद जब लाभ नहीं मिला तो परिवार की उम्मीदें भी धीरे-धीरे कमजोर पड़ने लगीं।
79 साल बाद भी अंधेरे में 48 गांव-टोले, अब खून से लिखेंगे PM को चिट्ठी
स्थानीय लोगों का कहना है कि गरीब परिवारों के लिए आवास योजना केवल एक सरकारी योजना नहीं बल्कि सम्मानजनक जीवन का आधार होती है। ऐसे में यदि पात्र हितग्राही वर्षों तक लाभ से वंचित रहे तो व्यवस्था पर सवाल उठना स्वाभाविक है।

जब विधायक पहुंचे चौखट पर
लंबे समय तक समस्या का समाधान नहीं होने पर ज्योति पटेल ने क्षेत्रीय विधायक जनकराम ध्रुव से मुलाकात कर अपनी परेशानी बताई। मामले की गंभीरता को देखते हुए विधायक स्वयं हरदीभाठा पहुंचे और परिवार से मिलकर पूरी स्थिति की जानकारी ली।
गांव में पहुंचकर उन्होंने आवास से जुड़े दस्तावेजों और लंबित प्रक्रिया की जानकारी ली। साथ ही संबंधित अधिकारियों से चर्चा कर मामले के शीघ्र निराकरण के निर्देश दिए। विधायक ने स्पष्ट कहा कि शासन की योजनाओं का लाभ समय पर पात्र लोगों तक पहुंचना चाहिए और किसी भी प्रकार की प्रशासनिक देरी गरीब परिवारों के अधिकारों पर असर डालती है।
एक परिवार का सवाल नहीं, व्यवस्था की परीक्षा
हरदीभाठा का यह मामला केवल एक विधवा महिला की परेशानी भर नहीं है, बल्कि यह उन तमाम परिवारों की कहानी है जो सरकारी योजनाओं में पात्र होने के बावजूद लाभ पाने के लिए वर्षों तक संघर्ष करते रहते हैं।
विश्व पर्यावरण दिवस पर गरियाबंद पुलिस का हरित संकल्प, पुलिस लाइन में रोपे गए फलदार और छायादार पौधे
ग्रामीणों का कहना है कि जब किसी योजना की स्वीकृति मिल चुकी हो, तब लाभ वितरण में इतनी लंबी देरी होना चिंता का विषय है। उन्होंने प्रशासन से मांग की है कि न केवल इस मामले का तत्काल समाधान किया जाए बल्कि ऐसे अन्य लंबित मामलों की भी समीक्षा की जाए ताकि कोई और परिवार अपने अधिकार के लिए वर्षों तक भटकने को मजबूर न हो।
हस्तक्षेप के बाद बढ़ी उम्मीद
विधायक के हस्तक्षेप के बाद ज्योति पटेल और उनके परिवार में एक बार फिर उम्मीद जगी है। उन्हें विश्वास है कि अब उनका मामला प्राथमिकता से सुलझेगा और वर्षों से अधूरा पड़ा पक्के घर का सपना साकार हो सकेगा।
हरदीभाठा की यह कहानी बताती है कि योजनाओं की सफलता केवल स्वीकृति पत्रों से नहीं, बल्कि उस दिन से तय होती है जब लाभ वास्तव में जरूरतमंद के हाथों तक पहुंचता है।




