फरियाद करने वाले कई जनप्रतिनिधि अब नहीं रहे
छुरा (गंगा प्रकाश)। सरकारें बदलीं, मुख्यमंत्री बदले, योजनाओं के नाम बदले और विकास के दावे भी बदलते रहे, लेकिन छुरा-रसेला-गरियाबंद मार्ग की किस्मत नहीं बदली। पांच से छह दशक पहले जिस सड़क के चौड़ीकरण और मरम्मत की मांग शुरू हुई थी, वह आज भी गड्ढों और कीचड़ के बीच अपनी बदहाली की कहानी बयां कर रही है।
क्षेत्र के बुजुर्ग बताते हैं कि सड़क सुधार की मांग लेकर तत्कालीन जनप्रतिनिधि भोपाल से लेकर दिल्ली तक नेताओं के दरवाजे खटखटाते रहे। उस दौर में श्यामाचरण शुक्ल, विद्याचरण शुक्ल, सुंदरलाल पटवा, कैलाश जोशी, अर्जुन सिंह और दिग्विजय सिंह जैसे नेताओं तक यह मांग पहुंची। हर बार आश्वासन मिला, लेकिन सड़क की तस्वीर नहीं बदली।
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छत्तीसगढ़ राज्य बनने के बाद लोगों को उम्मीद जगी कि अब हालात सुधरेंगे। इसके बाद अजित जोगी, डॉ. रमन सिंह, भूपेश बघेल और वर्तमान मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय के कार्यकाल में भी सड़क निर्माण और चौड़ीकरण की मांग लगातार उठती रही। “आपके सरकार आपके द्वार”, “जनदर्शन”, “ग्राम सुराज अभियान” और “सुशासन तिहार” जैसे कार्यक्रमों में भी ग्रामीणों ने अपनी पीड़ा रखी, लेकिन नतीजा शून्य रहा।

बारिश में सड़क नहीं, तालाब नजर आता है
वर्तमान में सड़क की हालत इतनी खराब है कि कई स्थानों पर डामर पूरी तरह उखड़ चुका है। बड़े-बड़े गड्ढों में बारिश का पानी भर जाने से सड़क तालाब जैसी दिखाई देती है। वाहन चालकों को यह समझना मुश्किल हो जाता है कि सड़क कहां है और गड्ढा कहां।
दोपहिया वाहन चालकों के लिए यह मार्ग सबसे अधिक खतरनाक साबित हो रहा है। आए दिन फिसलकर गिरने और चोटिल होने की घटनाएं सामने आती रहती हैं। स्थानीय लोगों का दावा है कि हर वर्ष सड़क की खराब स्थिति के कारण दुर्घटनाओं में कई लोगों की जान भी जाती है।
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छात्राओं को सबसे ज्यादा परेशानी
ग्रामीण क्षेत्रों से कॉलेज और स्कूल जाने वाली छात्राओं को भी इस सड़क की बदहाली का खामियाजा भुगतना पड़ रहा है। बारिश के दिनों में कीचड़ और गंदे पानी से कपड़े खराब हो जाते हैं। कई बार छात्राएं और युवक-युवतियां साइकिल या दोपहिया वाहन से गिरकर चोटिल हो चुके हैं।

विकास के वादे, लेकिन जमीन पर कुछ नहीं
स्थानीय नागरिकों का कहना है कि चुनाव आते ही सड़क निर्माण का मुद्दा प्रमुखता से उठाया जाता है। राजनीतिक दल विकास और सड़क सुधार के बड़े-बड़े वादे करते हैं, लेकिन चुनाव खत्म होते ही यह मुद्दा भी गायब हो जाता है। परिणाम यह है कि सड़क सुधार की मांग करते-करते एक पीढ़ी गुजर गई और अब दूसरी पीढ़ी भी उसी उम्मीद में इंतजार कर रही है।
ग्रामीणों ने उठाई ये मांगें
- छुरा-रसेला-गरियाबंद मार्ग की तत्काल मरम्मत की जाए।
- सड़क के सभी गड्ढों को भरकर सुरक्षित आवागमन सुनिश्चित किया जाए।
- मार्ग का चौड़ीकरण कर स्थायी निर्माण कराया जाए।
- निर्माण कार्य की गुणवत्ता की स्वतंत्र निगरानी की जाए।
- दुर्घटनाओं को रोकने के लिए त्वरित कार्रवाई की जाए।




