RTI विवाद पर गंगा प्रकाश से विशेष बातचीत, बयान के बाद और गहरे हुए सवाल
यदिन्द्रन नायर
बीजापुर (गंगा प्रकाश)। शासकीय पॉलीटेक्निक महाविद्यालय बीजापुर में नियुक्ति संबंधी दस्तावेजों को सूचना के अधिकार अधिनियम के तहत उपलब्ध नहीं कराए जाने और प्रथम अपील खारिज होने के बाद गंगा प्रकाश के संवाददाता ने मामले की सच्चाई जानने के लिए महाविद्यालय के प्राचार्य एवं जनसूचना अधिकारी डॉ. चंदकिशोर रहंगदले से संपर्क किया। बातचीत के दौरान प्राचार्य ने जो जवाब दिया, उसने पूरे मामले पर नई बहस छेड़ दी है।

संवाददाता ने प्राचार्य से सीधा सवाल किया कि लक्ष्मण कुमार चंद्रा आपके अधीनस्थ कर्मचारी हैं। नियुक्ति से जुड़े दस्तावेज आरटीआई में उपलब्ध क्यों नहीं कराए गए?
इस पर प्राचार्य डॉ. चंदकिशोर रहंगदले ने कहा— संस्था की प्रतिष्ठा और मेरे कार्यालय से संबंधित अधिकारी-कर्मचारियों का बचाव करना मेरा प्रथम दायित्व होता है।
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प्राचार्य का यह बयान सामने आने के बाद अब कई नए सवाल खड़े हो गए हैं। प्रशासनिक और कानूनी जानकारों का कहना है कि किसी भी शासकीय अधिकारी का पहला दायित्व कानून, नियम और पारदर्शिता का पालन सुनिश्चित करना होता है। यदि किसी आरटीआई आवेदन में मांगी गई सूचना कानून के अनुसार उपलब्ध कराई जा सकती है, तो उसका निर्णय अधिनियम के प्रावधानों के आधार पर होना चाहिए।
इसी बीच यह तथ्य भी सामने आया कि महाविद्यालय ने पहले अपने पत्र में भर्ती नियम, विज्ञापन और चयन सूची सहित 28 पृष्ठों की जानकारी उपलब्ध होने की बात कही थी तथा इसके लिए ₹56 शुल्क भी निर्धारित किया था। लेकिन नियुक्ति से जुड़े अन्य दस्तावेजों पर तीसरे पक्ष की गोपनीयता का आधार लेते हुए सूचना देने से इनकार कर दिया गया।

अब सवाल यह भी उठ रहा है कि यदि नियुक्ति प्रक्रिया पूरी तरह नियमों के अनुरूप हुई थी, तो उससे संबंधित अभिलेखों को सार्वजनिक करने में संकोच क्यों दिखाई दिया? क्या केवल संबंधित कर्मचारी की असहमति के आधार पर नियुक्ति से जुड़े सभी दस्तावेज रोके जा सकते हैं, या फिर व्यापक जनहित के पहलू पर भी विचार किया जाना चाहिए था?
आरटीआई विशेषज्ञों का कहना है कि यह मुद्दा अब केवल एक कर्मचारी की नियुक्ति तक सीमित नहीं है। यह मामला इस बात की भी परीक्षा है कि सरकारी संस्थानों में पारदर्शिता और गोपनीयता के बीच संतुलन कैसे बनाया जाए।
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दूसरी ओर, प्राचार्य के संस्था की प्रतिष्ठा और कर्मचारियों के बचाव वाले बयान को लेकर भी प्रशासनिक हलकों में चर्चा शुरू हो गई है। कुछ विशेषज्ञों का मानना है कि संस्था की प्रतिष्ठा का सबसे प्रभावी आधार पारदर्शिता और नियमों का पालन है, जबकि अन्य का कहना है कि अधिकारी का यह दायित्व भी होता है कि वह कर्मचारियों के वैधानिक अधिकारों और गोपनीयता की रक्षा करे। ऐसे में अंतिम निर्णय संबंधित कानून और प्रत्येक मामले के तथ्यों पर निर्भर करता है।
अब यह पूरा मामला राज्य सूचना आयोग तक पहुंचता है या नहीं, इस पर सभी की निगाहें टिकी हैं। यदि द्वितीय अपील दायर होती है, तो आयोग को यह तय करना होगा कि नियुक्ति संबंधी दस्तावेजों के मामले में जनहित और गोपनीयता के बीच संतुलन किस प्रकार स्थापित किया जाए।




