2018 में खरीदी गई सामग्री पर करोड़ों के खर्च का सवाल; कई जनपदों में हजारों डिब्बे खपा रहे जगह, वितरण का आज तक इंतजार
छुरा (गंगा प्रकाश)। मनरेगा के जॉब कार्डधारी मजदूरों को सुविधा देने के उद्देश्य से वर्ष 2018 में शुरू की गई मुख्यमंत्री मनरेगा मजदूर टिफिन बॉक्स योजना अब सरकारी व्यवस्था की लंबी प्रतीक्षा की कहानी बनती दिखाई दे रही है। आठ वर्ष बीत जाने के बाद भी प्रदेश के कई हिस्सों में मजदूरों के लिए खरीदे गए स्टील के टिफिन बॉक्स गोदामों में बंद बताए जा रहे हैं। जिन हाथों तक पहुंचाने के लिए सरकारी राशि खर्च कर सामग्री खरीदी गई थी, वे हाथ आज भी इसके इंतजार में हैं।
प्रदेश के लगभग 12 लाख मनरेगा जॉब कार्डधारी मजदूरों को टिफिन बॉक्स उपलब्ध कराने की योजना वर्ष 2018 में तत्कालीन मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह ने ग्राम सुराज अभियान के दौरान अंबिकापुर में घोषित की थी। इसके बाद टेंडर प्रक्रिया के माध्यम से टिफिन बॉक्स की खरीदी की गई और प्रदेश के विभिन्न विकासखंडों तक ट्रकों के जरिए सामग्री पहुंचाई गई।
कई जनपद पंचायतों में वितरण की प्रक्रिया शुरू भी हुई, लेकिन विधानसभा चुनाव की आचार संहिता लागू होने के बाद यह प्रक्रिया रुक गई। इसके बाद सत्ता परिवर्तन हुआ, सरकार बदली, पांच वर्ष का एक कार्यकाल गुजर गया और वर्तमान सरकार का भी कार्यकाल आगे बढ़ रहा है, लेकिन अनेक स्थानों पर टिफिन बॉक्स का मामला अब भी फाइलों और गोदामों के बीच अटका हुआ बताया जा रहा है।

गोदाम में डिब्बे, जिम्मेदारी पर सवाल
त्रिस्तरीय पंचायत व्यवस्था से जुड़े जिम्मेदार अधिकारी-कर्मचारियों के अनुसार टिफिन बॉक्स का मुद्दा जिला और प्रदेश स्तर की बैठकों में कई बार उठ चुका है। नाम प्रकाशित नहीं करने की शर्त पर कुछ जिम्मेदार कर्मचारियों ने कथित तौर पर व्यवस्था की स्थिति पर टिप्पणी करते हुए कहा कि हमारी गति सांप-छछूंदर जैसी है, इसलिए हमारा नाम और पद प्रकाशित न करें।
👉 जरूर पढ़ें:नुआखाई की रात छतरमड़ई में महिला की हत्या, ग्रामीणों ने संदिग्ध युवक को पकड़ा
इन कर्मचारियों के मुताबिक, टिफिन बॉक्स को लेकर उच्च स्तर पर भी कई बार चर्चा हो चुकी है, लेकिन प्रदेश स्तर पर जिम्मेदार अधिकारियों की ओर से अब तक स्पष्ट निर्णय सामने नहीं आया है। हालांकि इन दावों की आधिकारिक पुष्टि संबंधित विभाग के अभिलेखों और शासन के अधिकृत जवाब से होना बाकी है।
‘टिफिन बम’ से कम नहीं मामला!
आठ साल से गोदामों में पड़ी शासकीय सामग्री अब संबंधित अधिकारियों के लिए किसी “टिफिन बम” से कम नहीं मानी जा रही है। वजह यह है कि जितना लंबा समय बीत रहा है, उतने ही गंभीर सवाल सामग्री की खरीद, परिवहन, भंडारण, वितरण और वर्तमान स्थिति को लेकर खड़े हो रहे हैं।
यदि टिफिन बॉक्स किराए के गोदामों में रखे गए हैं तो वर्षों से उनके भंडारण पर कितनी राशि खर्च हुई? सामग्री की सुरक्षा और रखरखाव की जिम्मेदारी किसकी रही? लंबे समय तक बंद पड़े टिफिन बॉक्स की वर्तमान गुणवत्ता क्या है? यदि सामग्री खराब हो चुकी है तो उसकी जवाबदेही किसकी होगी? ये सवाल अब शासन से जवाब मांग रहे हैं।

खरीदी से लेकर वितरण तक मांगा जा रहा पूरा हिसाब
मामले में अब वर्ष 2018 से वर्तमान समय तक का पूरा रिकॉर्ड सार्वजनिक किए जाने की मांग उठ रही है। इसमें प्रमुख रूप से—
-
कुल कितने टिफिन बॉक्स खरीदे गए?
-
खरीदी पर कितनी शासकीय राशि खर्च हुई?
-
टेंडर किस प्रक्रिया से दिया गया?
-
परिवहन में कितना भुगतान हुआ?
-
किन-किन जनपद पंचायतों और विकासखंडों में कितने टिफिन बॉक्स भेजे गए?
-
कितने मजदूरों को टिफिन बॉक्स वितरित किए गए?
-
वर्तमान में कितनी संख्या में सामग्री गोदामों में मौजूद है?
-
भंडारण के लिए अब तक कितना किराया अथवा अन्य खर्च हुआ?
-
वितरण रुकने के बाद जिम्मेदारी किस अधिकारी स्तर पर तय की गई?
इन सवालों के जवाब सामने आने के बाद ही इस पूरी योजना की वास्तविक तस्वीर स्पष्ट हो सकेगी।
अब फैसला जरूरी—वितरण होगा या निस्तारण?
सबसे बड़ा सवाल यह है कि आठ वर्ष पुरानी सामग्री का अब क्या किया जाएगा। यदि टिफिन बॉक्स अभी भी उपयोग योग्य हैं तो शासन इन्हें पात्र मनरेगा मजदूरों तक कब पहुंचाएगा? और यदि सामग्री खराब अथवा अनुपयोगी हो चुकी है तो नियमानुसार इसके निस्तारण की प्रक्रिया कब शुरू होगी?
👉 जरूर पढ़ें: हाईकोर्ट की रोक के बीच फिर आया प्रभार का आदेश, दो दिन में पंचायत का पूरा चार्ज सौंपने का निर्देश !
मनरेगा मजदूरों के हित में खरीदी गई सामग्री का वर्षों तक उपयोग में नहीं आ पाना केवल एक योजना के लंबित रहने का मामला नहीं है। यह शासकीय खरीद के बाद सामग्री के उपयोग, भंडारण, निगरानी और संपत्ति प्रबंधन की कार्यप्रणाली पर भी गंभीर सवाल खड़े करता है।

अब सरकार से सीधा सवाल
2018 में मजदूरों के नाम पर खरीदे गए टिफिन बॉक्स आखिर 2026 तक मजदूरों के हाथ क्यों नहीं पहुंच पाए?
किसके आदेश का इंतजार है और कब खत्म होगा आठ साल पुराना यह इंतजार?
फ्रंट पेज की निगाह अब शासन के उस फैसले पर है, जो तय करेगा कि गोदामों में धूल खा रहे टिफिन बॉक्स मजदूरों की थाली तक पहुंचेंगे या फिर सरकारी रिकॉर्ड में एक और लंबित खरीदी बनकर रह जाएंगे।



