धरमराज देव जात्रा में निभाई गई सदियों पुरानी परंपराएं, सिराहा लोगों के देव नृत्य और मानदान के साथ गांव की सुख-समृद्धि के लिए मांगा आशीर्वाद
यदिंद्रन नायर
बीजापुर (गंगा प्रकाश)। छत्तीसगढ़ की पारंपरिक जनजातीय संस्कृति, लोक आस्था और धार्मिक मान्यताओं का अनूठा संगम 6 अक्टूबर 2026, मंगलवार को बीजापुर स्थित चिकटराज देव गुड़ी में देखने को मिला। यहां प्रतिवर्ष की परंपरा के अनुसार श्रद्धा और पारंपरिक रीति-रिवाजों के साथ धरमराज देव जात्रा का आयोजन किया गया। इस धार्मिक आयोजन में आसपास के अनेक गांवों के पेरमा, गायता, वड्डे एवं ग्राम प्रमुख शामिल हुए और देव परंपराओं का विधिवत निर्वहन किया गया।
माता मावली की पूजा से शुरू हुआ जात्रा का क्रम
धरमराज देव जात्रा की शुरुआत माता मावली की विधिवत पूजा-अर्चना के साथ हुई। इसके पश्चात बाबा चिकटराज देव की पूजा-पाठ कर सेवा-अर्जी की गई। धार्मिक अनुष्ठानों के बीच सिराहा लोगों ने पारंपरिक देव नृत्य प्रस्तुत किया, जिसने आयोजन की सांस्कृतिक गरिमा को और बढ़ाया।
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स्थानीय परंपराओं के अनुरूप पूजा-अर्चना के प्रत्येक चरण का विशेष महत्व रहा। श्रद्धालुओं ने देवताओं के प्रति अपनी आस्था व्यक्त करते हुए पारंपरिक विधि-विधान का पालन किया।

धरमराज देव और बड़े कुंवर को अर्पित किया गया मानदान
जात्रा के अगले चरण में धरमराज देव की पूजा-अर्चना कर मानदान अर्पित किया गया। इसके बाद बड़े कुंवर को भी मानदान दिया गया। धार्मिक परंपरा के अनुसार बाबा चिकटराज देव को मानदान अर्पित कर गांव की सुख-समृद्धि, खुशहाली और शांति के लिए आशीर्वाद मांगा गया।
आयोजन में निभाई गई इन परंपराओं ने स्थानीय धार्मिक आस्था और सामुदायिक सहभागिता की झलक प्रस्तुत की। जात्रा केवल पूजा-अर्चना तक सीमित नहीं रही, बल्कि इसमें क्षेत्र की पारंपरिक मान्यताओं और सामाजिक-सांस्कृतिक जुड़ाव की भी अभिव्यक्ति देखने को मिली।
माता कारी कंकालीन की पूजा के साथ हुआ समापन
धरमराज देव जात्रा के अंतिम चरण में माता कारी कंकालीन की विधिवत पूजा-पाठ की गई। इस दौरान गांव की खुशहाली, सुख-समृद्धि और शांति की कामना करते हुए माता से आशीर्वाद लिया गया। इस तरह विभिन्न धार्मिक अनुष्ठानों और पारंपरिक रीति-रिवाजों के साथ जात्रा का समापन हुआ।

आसपास के गांवों के प्रतिनिधियों की रही उपस्थिति
इस धार्मिक एवं पारंपरिक आयोजन में गोरना, भोषागुड़ा, तुमनार, पेदाकोड़ेपाल, मुसालूर, तुरनार, धनोरा, मलगोड़ा और रेंगानार सहित आसपास के विभिन्न गांवों के पेरमा, गायता, वड्डे एवं ग्राम प्रमुख उपस्थित रहे।
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चिकटराज देव गुड़ी में आयोजित धरमराज देव जात्रा ने क्षेत्र की पारंपरिक देव संस्कृति, धार्मिक आस्था और सामुदायिक सहभागिता को एक मंच पर प्रस्तुत किया। इस तरह के आयोजन स्थानीय परंपराओं को पीढ़ी-दर-पीढ़ी आगे बढ़ाने तथा सांस्कृतिक विरासत से जुड़ाव बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।





