रायपुर-देवभोग NH-130 के समीप साल के पेड़ों की पत्तियों से मिले नमूने, छत्तीसगढ़ के वैज्ञानिक रिकॉर्ड में पहली बार शामिल हुईं तीन प्रजातियां; अंतरराष्ट्रीय शोध पत्रिका में प्रकाशित हुआ अध्ययन
गरियाबंद/देवभोग (गंगा प्रकाश)। गरियाबंद के जंगलों में प्रकृति के बीच छिपी जैव विविधता का एक नया अध्याय सामने आया है। साल के पेड़ों की पत्तियों पर मौजूद मकड़ियों के नमूनों ने वैज्ञानिकों को ऐसी अहम जानकारी दी है, जिसने छत्तीसगढ़ में मकड़ियों की प्रजातिगत विविधता और उनके वितरण संबंधी अध्ययन में नया तथ्य जोड़ दिया है। जिले के वन क्षेत्र में मकड़ियों की तीन प्रजातियां दर्ज की गई हैं, जिनका इससे पहले छत्तीसगढ़ के उपलब्ध वैज्ञानिक साहित्य और वितरण संबंधी रिकॉर्ड में उल्लेख नहीं मिला था।
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संयुक्त शोध अध्ययन में Chorizopes bengalensis, Hamadruas sikkimensis और Thanatus elongatus नामक तीन प्रजातियों की पहचान की गई। शोधकर्ताओं ने 20 अप्रैल 2026 को रायपुर-देवभोग राष्ट्रीय राजमार्ग NH-130 के समीप स्थित गरियाबंद के वन क्षेत्र में साल के पेड़ों की पत्तियों से इन मकड़ियों के वयस्क मादा नमूने एकत्र किए। प्रारंभिक संग्रह के बाद इनकी पहचान के लिए वैज्ञानिक परीक्षण और सूक्ष्म अध्ययन किया गया।

शारीरिक बनावट और रंगों से खुला पहचान का राज
अध्ययन के दौरान मकड़ियों की प्राकृतिक अवस्था में तस्वीरें ली गईं और नमूनों को 70 प्रतिशत एथेनॉल में संरक्षित किया गया। इसके बाद स्टीरियो जूम माइक्रोस्कोप की सहायता से शरीर की बनावट, रंग, आंखों की व्यवस्था तथा मादा जननांगों की संरचनात्मक विशेषताओं का बारीकी से परीक्षण किया गया। प्रकाशित वैज्ञानिक विवरणों से तुलना के बाद तीनों प्रजातियों की पहचान की गई।
शोध में Chorizopes bengalensis के उदर पर भूरे रंग के साथ किनारों पर काले धब्बे और उभरी संरचनाएं देखी गईं। Hamadruas sikkimensis के सिर-वक्ष, उदर एवं पैरों पर विशिष्ट रंगीन पैटर्न और निशान मिले। वहीं Thanatus elongatus का उदर लंबा और सफेद रंग का पाया गया, जिस पर बीच में गहरी रंगीन रेखा तथा दोनों ओर शाखाओं जैसी आकृतियां मौजूद थीं।

रायपुर की प्रयोगशाला में सुरक्षित रहेंगे नमूने
भविष्य में अध्ययन और तुलनात्मक अनुसंधान के लिए तीनों नमूनों को DBZ596, DBZ598 और DBZ597 संग्रह संख्या दी गई है। इन्हें शासकीय डी.बी. गर्ल्स पीजी कॉलेज, रायपुर की प्राणीशास्त्र प्रयोगशाला में सुरक्षित रखा गया है। इससे आगे के शोधकर्ताओं को इन प्रजातियों की विशेषताओं और वितरण के अध्ययन में मदद मिल सकती है।
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यह शोध वर्ष 2026 में Asian Journal of Research in Zoology के खंड 9, अंक 4 में पृष्ठ संख्या 256 से 263 तक प्रकाशित हुआ है। अध्ययन में अविनाश आर. नीचत, एस.के. कुंभकार, हितेश कुमार वारते, यू. चंद्राकर एवं जशवंत नायक ने संयुक्त रूप से योगदान दिया है।
गरियाबंद के जंगलों से सामने आया यह वैज्ञानिक रिकॉर्ड इस बात की ओर भी ध्यान दिलाता है कि वन क्षेत्रों की जैव विविधता केवल बड़े वन्यजीवों तक सीमित नहीं है। छोटे जीवों का व्यवस्थित अध्ययन भी प्रकृति की वास्तविक समृद्धि को समझने के लिए जरूरी है। हालांकि इन प्रजातियों का छत्तीसगढ़ के उपलब्ध रिकॉर्ड में पहली बार दर्ज होना प्रदेश में इनका पहली बार अस्तित्व में आना नहीं, बल्कि वैज्ञानिक दस्तावेजीकरण में नया रिकॉर्ड जुड़ना है।





