पर्यावास अधिकार मिलने से पारंपरिक जीवनशैली, लघु वनोपज, आजीविका और सांस्कृतिक विरासत को मिलेगा संरक्षण; कलेक्टर रणबीर शर्मा की अध्यक्षता में जिला स्तरीय वन अधिकार समिति की बैठक में बनी कार्ययोजना
गरियाबंद (गंगा प्रकाश)। छत्तीसगढ़ के गरियाबंद जिले में विशेष पिछड़ी जनजाति कमार समुदाय के पारंपरिक जीवन, संस्कृति और आजीविका को कानूनी संरक्षण दिलाने की दिशा में प्रशासन ने महत्वपूर्ण कदम उठाया है। पीढ़ियों से जंगलों और प्राकृतिक संसाधनों पर निर्भर रहकर जीवनयापन करने वाले कमार समुदाय को अब वन अधिकार अधिनियम के तहत पर्यावास अधिकार दिलाने की प्रक्रिया तेज की जा रही है। यदि यह प्रक्रिया निर्धारित प्रावधानों के अनुरूप पूरी होती है, तो समुदाय के पारंपरिक निवास क्षेत्र, आजीविका के साधनों, सांस्कृतिक स्थलों और परंपरागत ज्ञान को कानूनी मान्यता मिलने का रास्ता साफ होगा।
इस संबंध में शुक्रवार को कलेक्टर एवं जिला स्तरीय वन अधिकार समिति के अध्यक्ष रणबीर शर्मा की अध्यक्षता में जिला स्तरीय समिति की बैठक आयोजित की गई। बैठक में कमार समुदाय को पर्यावास अधिकार प्रदान करने की प्रक्रिया, आवश्यक दस्तावेजों, समुदाय की सहभागिता तथा आगामी कार्ययोजना पर विस्तार से चर्चा हुई। अधिकारियों को आपसी समन्वय बनाकर पात्र समुदाय तक अधिकारों का लाभ पहुंचाने और निर्धारित समय-सीमा में प्रक्रिया पूरी करने के निर्देश दिए गए।
👉 जरूर पढ़ें : 35 साल की यादें, दिसंबर में फिर सजेगी दोस्ती की महफिल ! छुरा में जुटेंगे पुराने यार, 1 नवंबर की बैठक पर टिकी नजरें
कलेक्टर शर्मा ने कहा कि पर्यावास अधिकारों की मान्यता की प्रक्रिया में कमार समुदाय की सक्रिय भागीदारी सुनिश्चित करना आवश्यक है। इसके लिए ग्राम स्तर पर संवाद, प्रशिक्षण और जागरूकता कार्यक्रम आयोजित किए जाएंगे, ताकि समुदाय के लोगों को अपने अधिकारों, संबंधित कानूनी प्रावधानों और आवश्यक दस्तावेजों की जानकारी मिल सके।

सिर्फ जमीन नहीं, पूरी जीवनशैली को मिलेगा संरक्षण
पर्यावास अधिकार का महत्व किसी एक व्यक्ति या गांव तक सीमित नहीं है। यह समुदाय के पारंपरिक भौगोलिक क्षेत्र, प्राकृतिक संसाधनों पर निर्भरता, आजीविका व्यवस्था और सामाजिक-सांस्कृतिक पहचान से जुड़ा हुआ है। इसके तहत पात्र समुदाय के पारंपरिक निवास स्थलों, लघु वनोपज संग्रहण, पारंपरिक संसाधनों के उपयोग, सांस्कृतिक एवं धार्मिक स्थलों और पीढ़ियों से चले आ रहे पारंपरिक ज्ञान को मान्यता देने का प्रावधान है।
गरियाबंद जिले में कमार जनजाति के लिए यह पहल इसलिए महत्वपूर्ण मानी जा रही है, क्योंकि इससे उनकी पारंपरिक जीवनशैली के संरक्षण के साथ प्राकृतिक संसाधनों के प्रबंधन में समुदाय की भूमिका को भी संस्थागत आधार मिल सकता है। हालांकि, अधिकारों का वास्तविक दायरा संबंधित दावों, साक्ष्यों और कानून के तहत निर्धारित प्रक्रिया के अनुसार तय होगा।
विकास योजनाओं का लाभ पहुंचाने में भी मिलेगी मदद
पर्यावास अधिकारों की मान्यता से कमार समुदाय की जरूरतों के अनुरूप विकास कार्यों की योजना बनाने में भी सहायता मिलने की उम्मीद है। शिक्षा, स्वास्थ्य, पेयजल, आवास, सड़क, बिजली और आजीविका संवर्धन जैसी बुनियादी सुविधाओं से संबंधित शासकीय योजनाओं को समुदाय की भौगोलिक परिस्थितियों और पारंपरिक जीवनशैली के अनुरूप बेहतर ढंग से पहुंचाने का अवसर मिलेगा। इसके साथ ही सामाजिक पहचान, रीति-रिवाजों और सांस्कृतिक विरासत के संरक्षण को बढ़ावा दिया जा सकेगा।

गांव-गांव तक पहुंचाई जाएगी अधिकारों की जानकारी
बैठक में आगामी महीनों के लिए कार्ययोजना तैयार करते हुए ग्राम स्तर पर कार्यशालाएं, प्रशिक्षण और जनजागरूकता गतिविधियां आयोजित करने पर जोर दिया गया। कमार समाज के प्रमुखों, समुदाय विशेषज्ञों और प्रतिनिधियों के साथ समन्वय स्थापित कर पारंपरिक पर्यावास क्षेत्र से जुड़ी आवश्यक जानकारियां संकलित की जाएंगी। इसके बाद निर्धारित कानूनी प्रक्रिया के अनुसार आगे की कार्रवाई की जाएगी।
👉 जरूर पढ़ें : गरियाबंद के जंगलों में आखिर ऐसा क्या मिला, जिसने वैज्ञानिकों का खींचा ध्यान? मकड़ियों की 3 प्रजातियों का पहली बार दर्ज हुआ नाम
बैठक में उदंती-सीतानदी टाइगर रिजर्व के वनमंडलाधिकारी वरुण जैन, सहायक आयुक्त आदिवासी विकास लोकेश्वर पटेल, अनुविभागीय अधिकारी वन आर.के. सोरी, जनपद पंचायत गरियाबंद की मुख्य कार्यपालन अधिकारी नम्रता शर्मा, कमार विकास अभिकरण के अध्यक्ष मंगतू कमार, समाज प्रमुख सुकचंद कमार एवं नवराम कमार सहित अन्य प्रतिनिधि उपस्थित रहे। देशराम कमार, समुदाय विशेषज्ञ, खोज एवं जनजागृति एनजीओ मैनपुर के अध्यक्ष बेनिपुरी गोस्वामी तथा संबंधित विभागों के अधिकारी-कर्मचारी भी शामिल हुए। आदिम जाति विकास विभाग, नया रायपुर के परियोजना अधिकारी राज्य वन अधिकार राजेश कुमार ने वर्चुअल माध्यम से प्रक्रिया के संबंध में मार्गदर्शन दिया।
वन अधिकार अधिनियम, 2006 और इसके अंतर्गत बनाए गए नियमों में विशेष रूप से कमजोर जनजातीय समूहों के पारंपरिक पर्यावास एवं सामुदायिक अधिकारों की मान्यता का प्रावधान है। गरियाबंद जिले में कमार समुदाय को इन अधिकारों से जोड़ने की यह पहल अब आगे की कार्यवाही, दस्तावेजों के संकलन और निर्धारित कानूनी प्रक्रिया पर निर्भर करेगी। ऐसे में आने वाले समय में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि प्रशासन की कार्ययोजना किस गति से जमीन पर उतरती है और कमार समुदाय को उसके पारंपरिक अधिकारों की मान्यता कब तक मिल पाती है।





