रसेला में ग्राम समिति व ग्रामीणों ने किया संयुक्त निरीक्षण, चारागाह, धरसा और वनभूमि पर कब्जे हटाने की मांग
छुरा (गंगा प्रकाश)। शासन एक ओर पर्यावरण संरक्षण, हरित आवरण बढ़ाने और जलवायु संतुलन बनाए रखने के लिए प्रतिवर्ष करोड़ों रुपये खर्च कर व्यापक स्तर पर वृक्षारोपण अभियान चला रहा है। विश्व पर्यावरण दिवस सहित विभिन्न अवसरों पर लोगों को अधिक से अधिक पौधे लगाने तथा जंगलों की सुरक्षा का संदेश दिया जाता है। वहीं दूसरी ओर धरातल पर स्थिति इसके विपरीत दिखाई दे रही है। ग्राम रसेला क्षेत्र में वन विभाग की कथित उदासीनता के चलते वन, वनभूमि, चारागाह और धरसा जैसी सार्वजनिक भूमि पर लगातार अतिक्रमण होने तथा बड़े पैमाने पर वृक्षों की कटाई किए जाने के आरोप सामने आए हैं।

रविवार को ग्राम समिति, जनप्रतिनिधियों, ग्रामीणों एवं चारवाहों ने संयुक्त रूप से क्षेत्र का निरीक्षण किया। निरीक्षण के दौरान कई ऐसे स्थानों का अवलोकन किया गया, जहां पूर्व में वन विभाग द्वारा सागौन, बांस सहित विभिन्न प्रजातियों के पौधों का रोपण किया गया था। ग्रामीणों का आरोप है कि वर्तमान में उन क्षेत्रों पर अवैध कब्जा कर खेती की जा रही है। कई स्थानों पर वृक्षों के केवल ठूंठ ही दिखाई दिए, जबकि हरे-भरे पौधों और जंगलों का नामोनिशान तक नहीं बचा है।
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ग्रामीणों का कहना है कि शासन द्वारा वनाधिकार पट्टा देने की घोषणा के बाद कुछ लोगों ने इसका गलत अर्थ निकालते हुए वनभूमि, चारागाह और धरसा भूमि पर कब्जा करना शुरू कर दिया है। आरोप है कि कब्जा करने से पहले बड़ी संख्या में पेड़ों की कटाई कर भूमि को खेती योग्य बनाया गया है। यदि समय रहते प्रशासन ने हस्तक्षेप नहीं किया तो आने वाले वर्षों में क्षेत्र के जंगल पूरी तरह समाप्त होने की आशंका से इनकार नहीं किया जा सकता।

निरीक्षण में शामिल ग्रामीणों ने बताया कि अतिक्रमण की स्थिति इतनी स्पष्ट है कि उसके लिए किसी अतिरिक्त प्रमाण की आवश्यकता नहीं है। मौके पर पहुंचने वाला कोई भी व्यक्ति आसानी से देख सकता है कि जहां कभी वन विभाग द्वारा पौधारोपण किया गया था, वहां अब खेत तैयार हो चुके हैं। इससे यह भी सवाल उठ रहा है कि जिन क्षेत्रों में लाखों रुपये खर्च कर पौधारोपण कराया गया था, उनकी सुरक्षा और निगरानी की जिम्मेदारी आखिर किसकी है।
ग्रामीणों ने वन विभाग के अधिकारियों एवं कर्मचारियों की कार्यप्रणाली पर भी सवाल उठाए हैं। उनका कहना है कि यदि नियमित रूप से क्षेत्र का निरीक्षण किया जाता और समय-समय पर निगरानी होती, तो वनभूमि पर इस प्रकार का अतिक्रमण संभव नहीं होता। उनका आरोप है कि क्षेत्र में विभागीय अमले की सक्रियता लगभग नहीं के बराबर है, जिससे अवैध कब्जाधारियों और लकड़ी काटने वालों के हौसले लगातार बढ़ रहे हैं।

ग्रामीणों का यह भी कहना है कि वनों का लगातार घटता दायरा केवल पर्यावरण के लिए ही नहीं बल्कि ग्रामीण जीवन, जैव विविधता और वन्यजीवों के लिए भी गंभीर खतरा बनता जा रहा है। जंगलों के समाप्त होने से वर्षा चक्र प्रभावित होने, भूजल स्तर गिरने, तापमान में वृद्धि होने तथा वन्य जीवों के प्राकृतिक आवास खत्म होने जैसी समस्याएं भविष्य में और अधिक गंभीर रूप ले सकती हैं। इसके अलावा चारागाह और धरसा भूमि पर अतिक्रमण बढ़ने से पशुपालकों के सामने भी चारे का संकट उत्पन्न होने की आशंका है।
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ग्रामीणों ने प्रशासन से मांग की है कि पूरे क्षेत्र का संयुक्त राजस्व एवं वन विभाग की टीम द्वारा सीमांकन कराया जाए। जहां-जहां वनभूमि, चारागाह और धरसा भूमि पर अतिक्रमण हुआ है, वहां तत्काल कार्रवाई कर अवैध कब्जे हटाए जाएं। साथ ही जिन स्थानों पर वृक्षों की अवैध कटाई हुई है, वहां दोषियों के विरुद्ध वन संरक्षण अधिनियम एवं अन्य प्रासंगिक प्रावधानों के तहत सख्त कार्रवाई की जाए। ग्रामीणों ने यह भी मांग की कि पूर्व में किए गए वृक्षारोपण की जांच कर यह पता लगाया जाए कि लगाए गए पौधों का संरक्षण क्यों नहीं हो सका और इसके लिए जिम्मेदार अधिकारियों की जवाबदेही भी तय की जाए।

निरीक्षण के दौरान उपसरपंच परमेश्वर यादव, ग्राम समिति अध्यक्ष बिग्रेद्र ठाकुर, धनीराम यादव, नंदूदास मानिकपुरी, नंदकिशोर यादव, वेदव्यास निषाद, रामायण ठाकुर, राघवेंद्र यादव, लोकराम ध्रुव, धनेश्वर ठाकुर, बिसाहूराम ठाकुर, योगराम नागेश, धनेश्वर दास, लक्ष्मण यादव, जीवराखन यादव, देवलाल साहनी, कमलदास, परमेश्वर पटेल, केशर नागेश, बध्दुराम ठाकुर, संतराम यादव, मोती मरकाम, लोकराम, खेमचंद तांडी, लखन ठाकुर सहित बड़ी संख्या में ग्रामीण उपस्थित रहे। सभी ने एक स्वर में वन एवं सार्वजनिक भूमि को अतिक्रमण मुक्त कर भविष्य की पीढ़ियों के लिए सुरक्षित रखने की आवश्यकता पर बल दिया।




