मुक्तांजलि वाहन के लिए 2-3 घंटे इंतजार करते रहे परिजन, निजी वाहन भी नहीं मिला तो बल्ली के सहारे शव लेकर पैदल निकले
मैनपुर (गंगा प्रकाश)। मैनपुर क्षेत्र से सामने आई एक दर्दनाक तस्वीर ने दूरस्थ आदिवासी अंचल में स्वास्थ्य एवं शव परिवहन व्यवस्था की जमीनी हकीकत पर सवाल खड़े कर दिए हैं। पांच दिनों से लापता कमार जनजाति के बुजुर्ग सुमेर सिंह का शव बरडुला के जंगल में पेड़ से लटका हुआ मिला। लंबे समय से बुजुर्ग की तलाश में जुटे परिजनों ने शव की पहचान की, जिसके बाद घटना की सूचना पुलिस को दी गई। सूचना मिलते ही पुलिस मौके पर पहुंची और आवश्यक कार्रवाई करते हुए शव का पंचनामा तैयार कराया। इसके बाद शव को पोस्टमार्टम के लिए भेजा गया।
घटना के बाद पुलिस की कार्रवाई और पोस्टमार्टम की प्रक्रिया तो पूरी हो गई, लेकिन इसके बाद मृतक के परिजनों के सामने एक ऐसी परेशानी खड़ी हो गई, जिसकी तस्वीरें अब लोगों को झकझोर रही हैं। परिवार को शव लेकर अपने गांव और अंतिम संस्कार स्थल तक पहुंचना था, लेकिन इसके लिए उन्हें तत्काल कोई वाहन उपलब्ध नहीं हो सका।
पोस्टमार्टम के बाद वाहन का इंतजार, गुजरते रहे घंटे
बताया जा रहा है कि पोस्टमार्टम की प्रक्रिया पूरी होने के बाद परिजन शव को घर ले जाने के लिए मुक्तांजलि वाहन का इंतजार करते रहे। परिजनों के अनुसार, करीब 2 से 3 घंटे तक अस्पताल परिसर में वाहन की प्रतीक्षा की गई। इस दौरान परिवार की ओर से निजी वाहन की व्यवस्था करने का भी प्रयास किया गया, लेकिन तत्काल कोई वाहन उपलब्ध नहीं हो सका।
एक तरफ परिवार अपने बुजुर्ग सदस्य की मौत के सदमे में था, वहीं दूसरी तरफ शव को घर ले जाने की चिंता बढ़ती जा रही थी। काफी समय तक इंतजार करने के बाद भी जब वाहन की व्यवस्था नहीं हो पाई तो परिजनों के सामने मजबूरी के अलावा कोई रास्ता नहीं बचा।
जब वाहन नहीं मिला तो बल्ली बनी शव ले जाने का सहारा
आखिरकार परिजनों ने लकड़ी की एक बल्ली का सहारा लिया। शव को बल्ली से बांधा गया और परिजन उसे लेकर पैदल ही अंतिम संस्कार के लिए निकल पड़े। सामने आई तस्वीर में परिजनों को शव को इस तरह ले जाते देखा जा सकता है।
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दूरस्थ ग्रामीण और आदिवासी क्षेत्र में किसी मृत व्यक्ति के परिवार को अंतिम संस्कार से पहले इस तरह की परेशानी का सामना करना पड़े, यह अपने आप में गंभीर सवाल खड़े करता है। जिस समय परिवार को प्रशासनिक और मानवीय सहयोग की आवश्यकता थी, उस समय वाहन के लिए घंटों इंतजार करना पड़ा और अंततः शव को बल्ली के सहारे ले जाना पड़ा।
बीएमओ ने कहा—मुक्तांजलि वाहन कुड़ेदादर गया था
इस मामले में मैनपुर बीएमओ डॉ. गजेंद्र ध्रुव से जानकारी लेने पर उन्होंने बताया कि जिले का मुक्तांजलि वाहन उस समय कुड़ेदादर गया हुआ था। इसी वजह से तत्काल मैनपुर में वाहन उपलब्ध नहीं हो सका।
बीएमओ के इस स्पष्टीकरण के बाद अब सबसे बड़ा सवाल यह उठ रहा है कि यदि क्षेत्र का शव वाहन किसी दूसरे स्थान पर गया हुआ हो, तो उस दौरान मैनपुर क्षेत्र में किसी आकस्मिक स्थिति से निपटने के लिए वैकल्पिक वाहन की व्यवस्था क्यों नहीं थी?
दूरस्थ क्षेत्र में एक वाहन पर निर्भरता कितनी सुरक्षित?
मैनपुर भौगोलिक रूप से दूरस्थ और आदिवासी बहुल क्षेत्र है। यहां कई गांव मुख्यालय से काफी दूरी पर स्थित हैं। ऐसी परिस्थितियों में स्वास्थ्य सेवाओं के साथ-साथ एंबुलेंस और शव परिवहन जैसी आपातकालीन सुविधाओं की उपलब्धता भी महत्वपूर्ण हो जाती है।
यदि किसी क्षेत्र में उपलब्ध शव वाहन किसी दूसरे स्थान पर चला जाता है और उसी दौरान किसी परिवार को शव ले जाने की आवश्यकता पड़ती है, तो ऐसी स्थिति के लिए विभाग के पास वैकल्पिक व्यवस्था होना जरूरी है। लेकिन सुमेर सिंह के मामले में सामने आई तस्वीर यह सवाल खड़ा कर रही है कि ऐसी आपात स्थिति में व्यवस्था कितनी तैयार है।
मौत के बाद भी परिवार की परेशानी खत्म नहीं हुई
सुमेर सिंह के पांच दिनों तक लापता रहने के बाद उनका शव जंगल में मिलने से परिवार पहले ही गहरे सदमे में था। पुलिस कार्रवाई और पोस्टमार्टम के बाद परिजनों को उम्मीद थी कि अब शव को आसानी से घर ले जाकर अंतिम संस्कार की प्रक्रिया पूरी की जा सकेगी। लेकिन वाहन नहीं मिलने के कारण उन्हें घंटों अस्पताल में इंतजार करना पड़ा।
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जब निजी वाहन भी उपलब्ध नहीं हुआ तो आखिरकार परिवार को अपने स्तर पर शव ले जाने का इंतजाम करना पड़ा। बल्ली के सहारे शव लेकर पैदल जाते परिजनों की तस्वीर इस पूरी व्यवस्था की सबसे मार्मिक तस्वीर बनकर सामने आई है।
क्या ऐसी स्थिति के लिए कोई वैकल्पिक व्यवस्था है?
इस घटना ने स्वास्थ्य विभाग और प्रशासन के सामने कई सवाल खड़े कर दिए हैं। क्या दूरस्थ क्षेत्र में एक से अधिक शव परिवहन वाहनों की आवश्यकता का आकलन किया गया है? यदि मुख्य वाहन किसी अन्य स्थान पर चला जाए तो उसकी जगह वैकल्पिक वाहन की व्यवस्था कौन करेगा? क्या आपात स्थिति में निजी वाहन की तत्काल उपलब्धता सुनिश्चित करने के लिए कोई व्यवस्था या सूची मौजूद है? और सबसे महत्वपूर्ण—क्या भविष्य में किसी अन्य परिवार को शव को इसी तरह बल्ली के सहारे ले जाने की नौबत नहीं आएगी?
स्थानीय लोगों ने व्यवस्था सुधारने की उठाई मांग
स्थानीय लोगों का कहना है कि मैनपुर जैसे दूरस्थ क्षेत्र में स्वास्थ्य सुविधाओं को केवल अस्पताल तक सीमित नहीं रखा जा सकता। गंभीर मरीजों के लिए एंबुलेंस और मृतकों के शव को सम्मानजनक तरीके से घर अथवा अंतिम संस्कार स्थल तक पहुंचाने के लिए पर्याप्त परिवहन व्यवस्था होना आवश्यक है।
लोगों ने मांग की है कि प्रशासन इस घटना को गंभीरता से लेते हुए मैनपुर क्षेत्र में शव परिवहन की व्यवस्था की समीक्षा करे और ऐसी स्थिति में तत्काल वैकल्पिक वाहन उपलब्ध कराने की व्यवस्था सुनिश्चित करे।
अब सवाल व्यवस्था से है
सुमेर सिंह की मौत की परिस्थितियों की जांच और पुलिस की कार्रवाई अपनी जगह है, लेकिन उनकी मौत के बाद शव को घर ले जाने में परिजनों को हुई परेशानी ने एक अलग मुद्दा सामने ला दिया है।
आखिर वह कौन-सी व्यवस्था है, जिसमें दूरस्थ क्षेत्र का एक परिवार अपने बुजुर्ग सदस्य के शव को सम्मानपूर्वक घर तक ले जाने के लिए घंटों वाहन का इंतजार करता है और वाहन नहीं मिलने पर बल्ली के सहारे पैदल चलने को मजबूर हो जाता है?
मैनपुर की यह तस्वीर अब केवल एक परिवार की मजबूरी नहीं रह गई है, बल्कि दूरस्थ क्षेत्रों में शव परिवहन और आपातकालीन स्वास्थ्य व्यवस्था की उपलब्धता पर जवाब मांगती तस्वीर बन गई है। अब देखना होगा कि इस घटना के बाद प्रशासन और स्वास्थ्य विभाग वैकल्पिक व्यवस्था को लेकर क्या कदम उठाता है।
