छुरा (गंगा प्रकाश)। चार माह बाद भी आदिवासी जमीन – छत्तीसगढ़ के गरियाबंद जिले के आदिवासी बाहुल्य क्षेत्र छुरा के ग्राम हीराबतर में सामने आए आदिवासी भूमि की अवैध रजिस्ट्री के मामले को प्रकाशित हुए चार माह बीत चुके हैं, लेकिन प्रशासनिक कार्रवाई अब तक शून्य है।
याद दिला दें कि ग्राम हीराबतर निवासी गणेशी पिता विसराम, जो कि अनुसूचित जनजाति (ST) वर्ग के हैं, की भूमि को नियम-कानून की धज्जियां उड़ाते हुए OBC वर्ग के नाम पर रजिस्ट्री कर दिया गया था। यह रजिस्ट्री सीधे-सीधे छत्तीसगढ़ भू-राजस्व संहिता, धारा 170(B), पेसा अधिनियम और संविधान की पांचवी अनुसूची का उल्लंघन थी।

चार माह बाद भी कार्रवाई क्यों नहीं?
- पुराने कलेक्टर को मामले की पूरी जानकारी भेजी गई थी।
- तहसीलदार रमेश मेहता ने खुद मीडिया से कहा था कि “प्रमाणीकरण रोका गया है, आगे कार्रवाई कलेक्टर करेंगे।”
- लेकिन अब नया कलेक्टर पदस्थ हो चुका है, और उसके बाद भी यह मामला फाइलों में दबा पड़ा है।
न कोई जांच कमेटी बनी, न दोषियों पर FIR दर्ज हुई, न ही जमीन वापस आदिवासी को लौटाई गई।
स्थानीय लोगों का गुस्सा फूटा
ग्रामवासियों का कहना है कि प्रशासन सिर्फ टालमटोल की नीति अपना रहा है। “चार महीने हो गए, जमीन आज भी हमारे नाम नहीं लौटी। अधिकारी छुट्टी और तबादले का बहाना बनाते हैं। क्या आदिवासी की जमीन कोई भी लिख-रजिस्ट्री कर लेगा और सरकार चुप रहेगी?”
नए कलेक्टर से उम्मीद टूटी
नए कलेक्टर के पदभार संभालने पर लोगों को उम्मीद थी कि वे इस मामले को प्राथमिकता देंगे। लेकिन अब तक कोई ठोस कदम नहीं उठाया गया।
सवाल उठता है:
- क्या जिला प्रशासन जानबूझकर मामला दबा रहा है?
- क्या राजस्व विभाग और रजिस्ट्री कार्यालय की मिलीभगत इतनी गहरी है कि नया कलेक्टर भी कार्रवाई करने से बच रहा है?
- या फिर आदिवासी की जमीन प्रशासन के लिए कोई मायने नहीं रखती?
कानून साफ कहता है — फिर कार्रवाई क्यों नहीं?
- धारा 170(B), छ.ग. भू-राजस्व संहिता: आदिवासी भूमि बिना कलेक्टर अनुमति गैर-आदिवासी को नहीं बेची जा सकती।
- पेसा कानून 1996: ग्रामसभा की स्वीकृति के बिना कोई भी भूमि लेन-देन अवैध है।
- संविधान, पांचवी अनुसूची: आदिवासी भूमि की रक्षा करना सरकार का कर्तव्य है।
फिर भी चार महीने से प्रशासन की नींद क्यों नहीं टूटी?
जनता की चेतावनी
ग्रामीणों ने चेतावनी दी है कि यदि जल्द ही कार्रवाई नहीं हुई तो वे:
- जिला मुख्यालय पर धरना देंगे।
- हाईकोर्ट में जनहित याचिका (PIL) दायर करेंगे।
- मानवाधिकार आयोग तक शिकायत ले जाएंगे।
चार महीने बाद भी मामला जस का तस रहना यह साबित करता है कि छत्तीसगढ़ में आदिवासी जमीन की सुरक्षा पर प्रशासन गंभीर नहीं है।
अब यह सवाल उठना लाज़मी है कि — क्या आदिवासी की जमीन वापस दिलाने के लिए भी हमें सड़क पर उतरना पड़ेगा?