2007 में दिव्यांग कोटे से रोजगार सहायक की नियुक्ति, प्रमाण पत्र में दर्ज ओपीडी क्रमांक का अस्पताल रिकॉर्ड में नहीं मिला पता; RTI से निकली जानकारी ने खड़े किए कई सवाल
गरियाबंद/देवभोग (गंगा प्रकाश)। सरकारी नौकरी पाने के लिए अगर किसी व्यक्ति की योग्यता, अनुभव और दस्तावेज ही उसकी पहचान हैं, तो फिर सवाल उठता है कि क्या कागज पर किसी को दिव्यांग दिखाकर सरकारी नौकरी हासिल की जा सकती है? देवभोग विकासखंड की ग्राम पंचायत मुड़ागांव से सामने आया एक पुराना नियुक्ति मामला इसी सवाल को जन्म दे रहा है।
वर्ष 2007 में ग्राम रोजगार सहायक के पद पर हुई नियुक्ति से जुड़े दस्तावेजों में उधोराम नागेश पिता हेमलाल नागेश का नाम अन्य पिछड़ा वर्ग की अनारक्षित दिव्यांग श्रेणी में दर्ज होने की जानकारी सामने आई है। आरोप है कि उन्होंने एक पैर से दिव्यांग होने का प्रमाण पत्र प्रस्तुत कर दिव्यांग कोटे का लाभ लिया, जबकि बाद में इसी प्रमाण पत्र की प्रमाणिकता पर सवाल खड़े हो गए।
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मामले में सबसे दिलचस्प मोड़ तब आया, जब कथित दिव्यांग प्रमाण पत्र पर दर्ज ओपीडी क्रमांक 26396 का मिलान जिला चिकित्सालय रायपुर के रिकॉर्ड से कराया गया। सूचना के अधिकार के तहत प्राप्त जानकारी में संबंधित दिव्यांगता रजिस्टर एवं जावक रजिस्टर में उक्त क्रमांक का रिकॉर्ड नहीं मिलने का दावा किया गया है।
यहीं से शुरू होती है उस प्रमाण पत्र की कहानी, जिसकी एक तरफ सरकारी नौकरी की फाइल में मौजूदगी बताई जा रही है और दूसरी तरफ संबंधित अस्पताल के रिकॉर्ड में उसका पता तलाशा जा रहा है।

नियुक्ति की फाइल में ‘दिव्यांग’, अस्पताल के रिकॉर्ड में कहां?
उपलब्ध जानकारी के अनुसार उधोराम नागेश की नियुक्ति 15 मार्च 2007 को राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना के अंतर्गत ग्राम रोजगार सहायक के पद पर हुई थी। नियुक्ति से संबंधित आदेश क्रमांक 2007/163/रायपुर में उन्हें दिव्यांग श्रेणी का लाभ मिलने की बात सामने आई है।
कथित दिव्यांग प्रमाण पत्र में उन्हें एक पैर से दिव्यांग दर्शाया गया है। प्रमाण पत्र से संबंधित जानकारी में 16 सितंबर 2005 की तारीख और ओपीडी क्रमांक 26396 दर्ज होने की बात कही गई है। सवाल यह है कि यदि यह प्रमाण पत्र जिला चिकित्सालय रायपुर से जारी हुआ था तो उस समय के अस्पताल रिकॉर्ड में इसका उल्लेख होना चाहिए था या नहीं? और यदि रिकॉर्ड में उल्लेख नहीं है तो प्रमाण पत्र किस आधार पर जारी हुआ?
यही वह बिंदु है जिस पर अब निष्पक्ष जांच की जरूरत महसूस की जा रही है।

RTI ने खोला दस्तावेजों का दूसरा पन्ना
मामला तब और गंभीर नजर आने लगा जब सूचना के अधिकार के तहत संबंधित रिकॉर्ड की जानकारी मांगी गई। RTI से प्राप्त जानकारी के अनुसार, जिला चिकित्सालय रायपुर के दिव्यांगता रजिस्टर/जावक रजिस्टर में 16 सितंबर 2005 को ओपीडी क्रमांक 26396 का रिकॉर्ड नहीं मिलने की बात सामने आई है।
हालांकि, इस जानकारी के आधार पर प्रमाण पत्र को अंतिम रूप से फर्जी घोषित करना जांच के बिना उचित नहीं होगा। लेकिन एक ही दस्तावेज के संबंध में प्रमाण पत्र और सरकारी रिकॉर्ड के बीच कथित विसंगति जरूर गंभीर जांच का आधार बनती है।
अब जांच एजेंसी के सामने यह पता लगाने की चुनौती होगी कि—
- प्रमाण पत्र वास्तव में किस कार्यालय/चिकित्सा बोर्ड से जारी हुआ?
- उसमें दर्ज ओपीडी क्रमांक किस मरीज के नाम पर था?
- 16 सितंबर 2005 को संबंधित व्यक्ति का कोई चिकित्सकीय परीक्षण हुआ था या नहीं?
- दिव्यांगता प्रमाण पत्र जारी करने वाली मेडिकल बोर्ड की कार्यवाही कहां है?
- प्रमाण पत्र में दर्ज हस्ताक्षर और मुहर वास्तविक हैं या नहीं?
- वर्ष 2007 में नियुक्ति के समय प्रमाण पत्र का सत्यापन किस अधिकारी ने किया?
- नियुक्ति समिति ने दिव्यांग कोटे का लाभ देने से पहले दस्तावेजों की जांच किस स्तर पर की?
इन सवालों के जवाब सामने आने के बाद ही पूरे मामले की वास्तविक तस्वीर साफ हो सकती है।

2007 में नौकरी, 2014 में इस्तीफा… फिर राजनीति के मैदान में एंट्री
मामला सिर्फ कथित दिव्यांग प्रमाण पत्र तक सीमित नहीं है। उपलब्ध जानकारी के अनुसार उधोराम नागेश ने वर्ष 2007 से ग्राम रोजगार सहायक के रूप में कार्य किया और वर्ष 2014 में पद से इस्तीफा दे दिया। इसके बाद उन्होंने त्रिस्तरीय पंचायत चुनाव में जनपद सदस्य पद के लिए चुनाव मैदान में उतरने की कोशिश की। चुनाव परिणाम उनके पक्ष में नहीं रहा।
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इसके बाद उनके ठेकेदारी गतिविधियों से जुड़ने की बात भी सामने आती है। यही वजह है कि अब पुराने नियुक्ति रिकॉर्ड को लेकर उठे सवालों ने एक बार फिर पूरे मामले को चर्चा में ला दिया है।
नौकरी छोड़ने से पुराने दस्तावेजों की जांच खत्म हो जाती है क्या?
मामले का एक बड़ा सवाल यह भी है कि यदि किसी व्यक्ति ने वर्षों पहले सरकारी पद से इस्तीफा दे दिया हो, तो क्या उसकी नियुक्ति के आधार में इस्तेमाल दस्तावेजों की जांच नहीं हो सकती?
यदि नियुक्ति में किसी आरक्षित श्रेणी का लाभ लिया गया था और बाद में उस दस्तावेज की प्रमाणिकता पर सवाल उठते हैं, तो संबंधित विभाग द्वारा नियुक्ति के समय जमा किए गए मूल अभिलेखों की जांच की जा सकती है। यही वजह है कि इस मामले में केवल वर्तमान स्थिति देखने के बजाय 2005 से 2007 तक के दस्तावेजों की पूरी कड़ी की जांच महत्वपूर्ण होगी।

सिर्फ प्रमाण पत्र नहीं, सत्यापन प्रक्रिया भी सवालों के घेरे में
यदि जांच में कथित प्रमाण पत्र में कोई गड़बड़ी सामने आती है तो सवाल केवल प्रमाण पत्र प्रस्तुत करने वाले व्यक्ति तक सीमित नहीं रहेगा। यह भी जांच का विषय होगा कि सरकारी नौकरी में नियुक्ति से पहले प्रमाण पत्र का सत्यापन किसने किया था। दिव्यांग कोटे के तहत नियुक्ति में दस्तावेजों की जांच के लिए निर्धारित प्रक्रिया का पालन हुआ था या नहीं, इसका पता नियुक्ति फाइल से चल सकता है। यदि सत्यापन हुआ था तो संबंधित कार्यालय के रिकॉर्ड में उसकी रिपोर्ट होनी चाहिए। यदि सत्यापन नहीं हुआ था तो यह प्रशासनिक प्रक्रिया पर सवाल खड़ा कर सकता है।
‘वह नंबर’ अब बन गया पूरे मामले की सबसे बड़ी पहेली
कथित प्रमाण पत्र पर दर्ज ओपीडी क्रमांक 26396 इस पूरे मामले का सबसे महत्वपूर्ण बिंदु बनकर सामने आया है।
एक तरफ यही नंबर प्रमाण पत्र पर दर्ज होने की बात कही जा रही है, दूसरी तरफ RTI से प्राप्त जानकारी में संबंधित अस्पताल रिकॉर्ड में इसके नहीं मिलने का दावा है।
अब सवाल यही है—
- क्या यह सिर्फ रिकॉर्ड की कमी है या फिर प्रमाण पत्र की कहानी में कोई बड़ा झोल छिपा है?
- इसका जवाब न आरोपों से मिलेगा, न दावों से। जवाब मिलेगा तो सिर्फ मूल चिकित्सा रिकॉर्ड, मेडिकल बोर्ड की फाइल और नियुक्ति दस्तावेजों के आधिकारिक सत्यापन से।
जांच हुई तो खुल सकती है पूरी नियुक्ति प्रक्रिया की परत
मामले की निष्पक्ष जांच होने पर वर्ष 2005 में प्रमाण पत्र जारी होने से लेकर वर्ष 2007 में रोजगार सहायक के पद पर नियुक्ति तक की पूरी प्रक्रिया सामने आ सकती है।
जांच में यदि प्रमाण पत्र वैध साबित होता है तो उठाए गए सवालों का जवाब मिल जाएगा। वहीं यदि दस्तावेजों में गंभीर विसंगति या फर्जीवाड़ा प्रमाणित होता है तो संबंधित जिम्मेदार लोगों की भूमिका भी जांच के दायरे में आ सकती है। फिलहाल उपलब्ध जानकारी आरोपों और RTI से प्राप्त रिकॉर्ड पर आधारित है, इसलिए अंतिम निष्कर्ष सक्षम जांच एजेंसी की रिपोर्ट के बाद ही निकाला जा सकता है।
अब निगाह प्रशासन पर—क्या खुलेगी 19 साल पुराने प्रमाण पत्र की फाइल?
वर्ष 2005 में बने बताए जा रहे प्रमाण पत्र से शुरू हुआ सवाल वर्ष 2007 की सरकारी नियुक्ति तक पहुंचता है और अब वर्ष 2026 में फिर सामने आया है।
कागज पर दर्ज दिव्यांगता और सरकारी रिकॉर्ड में गायब बताए जा रहे ओपीडी नंबर के बीच की यह दूरी आखिर कितनी बड़ी है?
इसका फैसला अब दस्तावेज करेंगे—और यदि प्रशासन ने जांच के आदेश दिए तो संभव है कि एक पुराने नियुक्ति प्रकरण से जुड़े कई ऐसे पन्ने सामने आएं, जो अब तक सरकारी फाइलों में दबे रहे।




