छुरा में वैध मुरम खदान नहीं तो पिपराही से शासकीय सड़क तक कैसे पहुंची मुरम? टेंडर, कार्यादेश और बिल पर सवाल; पत्रकार पर 20 हजार मांगने का आरोप लगाने को लेकर भी विवाद
छुरा (गंगा प्रकाश)। गरियाबंद जिले के छुरा राजस्व क्षेत्र में मुरम खनन और शासकीय सड़क कार्य में उसके उपयोग को लेकर सवाल खड़े हो गए हैं। छुरा से कोसमबूढ़ा जाने वाले पीडब्ल्यूडी मार्ग के किनारे सोल्डर में मुरम बिछाने का कार्य किया जा रहा है। स्थानीय सूत्रों के अनुसार उक्त कार्य में पिपराही क्षेत्र से मुरम लाकर सड़क किनारे बिछाई जा रही है।
ऐसे में सवाल यह उठ रहा है कि जब गरियाबंद जिले में वैध मुरम खदान संचालित नहीं होने की जानकारी सामने आ रही है, तो शासकीय कार्य में इस्तेमाल हो रही मुरम आखिर कहां से लाई जा रही है? मुरम की वैधता, स्रोत, परिवहन और संबंधित दस्तावेजों की जांच की आवश्यकता सामने आ गई है।
शासकीय कार्य में मुरम, लेकिन बिल किस आधार पर?
शासकीय निर्माण कार्यों में उपयोग होने वाली निर्माण सामग्री के लिए नियमानुसार दस्तावेज और भुगतान संबंधी अभिलेख होना आवश्यक है। ऐसे में यदि मुरम किसी वैध स्रोत से नहीं लाई गई है तो उसका बिल किस आधार पर लगाया जाएगा और सप्लायर को भुगतान कैसे किया जाएगा, यह बड़ा सवाल है।
👉 जरूर पढ़ें: 5 दिन से लापता कमार बुजुर्ग का जंगल में मिला शव… लेकिन अंतिम सफर में भी नहीं मिली व्यवस्था!
स्थानीय सूत्रों से यह भी जानकारी सामने आई है कि सड़क किनारे मुरम बिछाने के उक्त कार्य के लिए कथित तौर पर कोई टेंडर नहीं हुआ है। यदि टेंडर नहीं हुआ तो कार्य किस आदेश और किस स्वीकृति के आधार पर कराया जा रहा है? मुरम की मात्रा का आकलन किसने किया? कार्य की निगरानी कौन कर रहा है और भुगतान किसके नाम पर होना है? इन सवालों का जवाब संबंधित विभागीय दस्तावेजों से ही स्पष्ट हो सकेगा।
मुरम की कवरेज करने पहुंचे पत्रकार से विवाद
इसी मामले की जानकारी जुटाने स्थानीय मीडियाकर्मी जब मौके पर पहुंचे तो वहां मौजूद राज सिन्हा द्वारा कथित रूप से कवरेज करने से रोकने-टोकने का प्रयास किए जाने का आरोप है।
मीडियाकर्मी के अनुसार वह केवल मुरम खनन एवं सड़क पर चल रहे कार्य की फोटो-वीडियो लेने तथा मौके पर मौजूद लोगों से जानकारी प्राप्त करने पहुंचा था। इसके बाद संबंधित विभाग से पुष्टि लेकर समाचार प्रकाशित किया जाना था।
मीडियाकर्मी का कहना है कि उसने मौके पर स्पष्ट रूप से बताया कि वह किसी कार्य को रुकवाने या शुरू करवाने के लिए नहीं आया है और न ही किसी से पैसे मांग रहा है। उसका कार्य मौके की वास्तविक स्थिति को रिकॉर्ड करना और संबंधित विभाग का पक्ष लेकर समाचार प्रकाशित करना है।
कितना पैसा चाहिए, बताओ कहकर फंसाने का आरोप
मीडियाकर्मी का आरोप है कि बातचीत के दौरान राज सिन्हा द्वारा बार-बार पैसों की बात की गई और कथित रूप से कितना पैसा चाहिए, बताओ जैसे शब्दों का इस्तेमाल किया गया।
मीडियाकर्मी के अनुसार वह लगातार स्पष्ट करता रहा कि उसने किसी प्रकार के पैसे की मांग नहीं की है। इसके बावजूद बातचीत को कथित रूप से इस दिशा में ले जाने का प्रयास किया गया कि पत्रकार ने मुरम खनन कार्य रोकने के एवज में 20 हजार रुपये की मांग की है।
मीडियाकर्मी ने इस आरोप को पूरी तरह नकारते हुए कहा कि वह पत्रकारिता के कार्य से मौके पर गया था और उसका उद्देश्य केवल समाचार संकलन करना था।
साथियों से वीडियो बनवाकर पत्रकार को फंसाने की कथित कोशिश
मीडियाकर्मी का आरोप है कि राज सिन्हा द्वारा अपने साथियों से पूरी बातचीत का वीडियो बनवाया जा रहा था। पत्रकार का दावा है कि वीडियो रिकॉर्डिंग के माध्यम से उसकी पत्रकारिता की छवि खराब करने और बाद में उसे वसूली के आरोप में फंसाने की कथित कोशिश की जा रही थी।
मीडियाकर्मी के मुताबिक वह बार-बार अपने कार्य के बारे में स्पष्ट करता रहा कि वह फोटो और वीडियो लेकर संबंधित विभाग से पुष्टि के बाद समाचार प्रकाशित करेगा। इसके बावजूद कथित रूप से पैसों की मांग का आरोप दोहराया जाता रहा।
मीडियाकर्मी के अनुसार अंत में राज सिन्हा द्वारा यह भी कहा गया कि उनके कर्मचारी गवाह हैं कि पत्रकार ने उनके सामने पैसों की मांग की है। पत्रकार का आरोप है कि इस प्रकार उसके खिलाफ पहले से ही एक कहानी तैयार करने का प्रयास किया जा रहा था।
राज सिन्हा के मोबाइल में कथित वीडियो, जांच से खुल सकता है पूरा मामला
मामले का सबसे महत्वपूर्ण पहलू कथित वीडियो रिकॉर्डिंग है। मीडियाकर्मी का कहना है कि पूरी बातचीत का वीडियो राज सिन्हा के मोबाइल में मौजूद है।
ऐसे में यदि निष्पक्ष जांच की जाती है तो वीडियो की मूल रिकॉर्डिंग शुरुआत से अंत तक सुरक्षित कर जांची जानी चाहिए। इससे यह स्पष्ट हो सकता है कि पैसों की बात किसने शुरू की, बातचीत किस संदर्भ में हुई और क्या वीडियो में किसी प्रकार की कटिंग या एडिटिंग की गई है।
मीडियाकर्मी का कहना है कि यदि उसने वास्तव में 20 हजार रुपये की मांग की है तो पूरी मूल वीडियो रिकॉर्डिंग सामने लाई जाए। वहीं यदि उस पर झूठा आरोप लगाने के उद्देश्य से बातचीत को किसी विशेष दिशा में ले जाने का प्रयास किया गया है तो वह भी मूल रिकॉर्डिंग से स्पष्ट हो सकता है।
मुरम, रेत, ईंट और लकड़ी को लेकर भी क्षेत्र में उठते रहे हैं सवाल
छुरा एवं आसपास के क्षेत्र में मुरम खनन के साथ-साथ रेत, ईंट और लकड़ी से जुड़ी गतिविधियों को लेकर भी समय-समय पर सवाल उठते रहे हैं। स्थानीय स्तर पर आरोप लगाए जाते रहे हैं कि कुछ लोग स्वयं को प्रभावशाली राजनीतिक लोगों अथवा जनप्रतिनिधियों का करीबी बताकर बेखौफ होकर काम करने का दावा करते हैं।
👉 जरूर पढ़ें: रसोइया गायब… बच्चों ने संभाली रसोई, कुकर में हुआ जोरदार धमाका!
हालांकि किसी व्यक्ति का किसी जनप्रतिनिधि से वास्तविक संबंध है या नहीं, इसकी पुष्टि आधिकारिक दस्तावेज अथवा जांच के बिना नहीं की जा सकती।
विधायक के नाम का इस्तेमाल हो रहा है तो जांच जरूरी
राजिम विधानसभा क्षेत्र में विधायक रोहित साहू द्वारा विकास कार्यों को लेकर सक्रियता दिखाई जा रही है और क्षेत्र में विभिन्न विकास कार्यों को गति देने के प्रयास किए जा रहे हैं। ऐसे में यदि कोई व्यक्ति उनके नाम अथवा निकटता का दावा कर किसी अवैध गतिविधि को संरक्षण मिलने का माहौल बनाने का प्रयास करता है तो यह गंभीर जांच का विषय होना चाहिए।
किसी भी जनप्रतिनिधि की विकास योजनाओं और सार्वजनिक छवि पर अवैध गतिविधियों के आरोपों का असर नहीं पड़ना चाहिए। इसलिए प्रशासन को मुरम, रेत, ईंट और लकड़ी से संबंधित शिकायतों की निष्पक्ष जांच कर वास्तविक स्थिति सामने लानी चाहिए।
इस खबर में विधायक रोहित साहू की किसी अवैध गतिविधि में संलिप्तता का आरोप नहीं लगाया जा रहा है। सवाल केवल उन लोगों की भूमिका की जांच से जुड़ा है जो कथित तौर पर राजनीतिक पहुंच अथवा निकटता का दावा करते हैं।
कलेक्टर ने संबंधित अधिकारी को जानकारी देने कहा
मुरम खनन की जानकारी कलेक्टर रणवीर शर्मा को दूरभाष के माध्यम से दी गई। कलेक्टर ने मामले की जानकारी संबंधित राजस्व अधिकारी को देने की बात कही।
वहीं तहसीलदार रमेश मेहता से संपर्क करने पर उन्होंने बताया कि उनके संज्ञान में जानकारी लाई गई है। तहसीलदार के अनुसार गरियाबंद जिले में कहीं भी मुरम खनन संचालित नहीं होने की जानकारी है और मामले में कार्रवाई की जाएगी।
अब जांच में सामने आएगा मुरम का स्रोत और वीडियो का सच
पूरे मामले में अब दो प्रमुख सवाल सामने हैं—पहला, शासकीय सड़क कार्य में इस्तेमाल हो रही मुरम का वैध स्रोत क्या है और उसका भुगतान किस दस्तावेज के आधार पर किया जाएगा? दूसरा, मीडियाकर्मी पर लगाए गए 20 हजार रुपये की मांग के आरोप में राज सिन्हा के मोबाइल में मौजूद कथित मूल वीडियो में वास्तव में क्या रिकॉर्ड हुआ है?
यदि प्रशासन मुरम के स्रोत, कार्यादेश, टेंडर, बिल, परिवहन दस्तावेज और भुगतान संबंधी रिकॉर्ड की जांच के साथ-साथ कथित वीडियो की मूल रिकॉर्डिंग की भी जांच करता है, तो पूरे मामले की वास्तविक तस्वीर सामने आ सकती है।
मुरम की परत सड़क पर जरूर बिछ रही है, लेकिन उसके नीचे छिपे सवाल अब कागजों और जांच के जरिए ही सामने आएंगे—मुरम आई कहां से, आदेश किसका था और पत्रकार पर लगाए गए आरोप के पीछे आखिर पूरी बातचीत में क्या हुआ?
