गरियाबंद (गंगा प्रकाश)। “कर्ज लो और घी पियो” – चार्वाक के इस कथन को छत्तीसगढ़ की विष्णु देव सरकार ने अपनी वित्त नीति बना लिया है। विगत दो सालों में 28000करोड़ से भी अधिक का कर्ज लेकर सरकार ने अपने कमजोर वित्तीय प्रबंधन को उजागर कर दिया है। अब राज्य पर कुल कर्ज 1,429,641.000 मिलियन रुपये   के पार पहुंच गया है। सरकार की खर्चीली नीतियों का बोझ जनता कब तक उठाएगी?

पूर्व जनभागीदारी अध्यक्ष हरमेश चावड़ा ने सांय सरकार के आम बजट पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा की सरकार ने अभी तक 28हजार करोड़ से अधिक का कर्ज दो  सालों में ले लिया है। आने वाले पांच साल में छत्तीसगढ़ सिर से पैर तक कर्ज में डूबा होगा। अनुभवहीन सरकार और ज्ञानी वित्तमंत्री जी से भी व्यवस्था नहीं संभल रही है। भूपेश सरकार ने भी कर्ज माफ किया, किसानों को पैसा दिया फिर भी इतना अधिक कर्ज लेने की जरूरत नहीं पड़ी थी। बीजेपी सरकार छत्तीसगढ़की आने वाली पीढ़ियों को कर्ज के बोझ में दबा रही है।

आप खुद  विधानसभा में सत्ताधारी पार्टी के सदस्यों के चेहरे देखिए, वो कह रहे हो कि इससे ज्यादा निराशाजनक, मनोबल गिराने वाला और धोखे वाला बजट नहीं हो सकता था।  मैं बस इतना कहना चाहता हूं, इस बजट में कहीं भी ढूंढ लीजिए, किसानों के लिए कुछ नहीं है, युवाओं के लिए रोजगार के लिए कुछ नहीं है, प्रदेश की अर्थव्यवस्था के लिए कुछ नहीं है। कुल मिलाकर, अगर आप देखें तो यह बजट एक खोखले खिलौने जैसा है जिससे कोई आवाज भी नहीं आती।

चावड़ा ने कहा, क्या सरकार ने युवाओं, मिडिल क्लास, खिलाड़ियों, किसानों या महिलाओं की  तरक्की के लिए कुछ किया है? इस बजट में कुछ नहीं है। यह एक ‘फेकू’ बजट है। ये बजट PMO से तैयार किया गया है, इसीलिए साय सरकार को इसकी तारीफ करना मजबूरी हैl

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किसानों के लिए पर्याप्त प्रावधान नहीं

कृषि प्रधान राज्य होने के बावजूद यदि सिंचाई, समर्थन मूल्य, बीमा और ऋण राहत पर पर्याप्त बजट आवंटन न हो, तो किसानों में असंतोष बढ़ सकता है।

 युवाओं के लिए रोजगार पर स्पष्ट योजना नहीं

यदि रोजगार सृजन के लिए ठोस, समयबद्ध और व्यावहारिक योजना का अभाव हो, तो यह युवाओं की उम्मीदों पर खरा नहीं उतरता। सिर्फ घोषणाएं, लेकिन कार्यान्वयन की स्पष्ट रणनीति न होना कमजोरी मानी जाएगी।युवाओं के पास नौकरी नहीं है, रोजगार पैदा करने की कोई स्पष्ट नई नीति नहीं हैl

महंगाई और आम जनता को राहत कम इस बजट से

बजट में यदि महंगाई कम करने के ठोस उपाय नहीं दिखते, तो यह आम आदमी, विशेषकर मध्यम वर्ग और गरीब परिवारों के लिए निराशाजनक माना जा सकता है। रोज़मर्रा की वस्तुओं पर सीधी राहत का अभाव आलोचना का विषय बनता है।

 मिडिल क्लास तो युगों युगों से वैसे भी परेशान है, घरेलू बचत घट रही है, किसान संकट में हैं, आने वाले वैश्विक झटके, सभी को नजरअंदाज कर दिया गया।उन्होंने दावा किया कि यह एक ऐसा बजट जिसमें चीजों को दुरुस्त करने के बजाय वास्तविक संकटों से आंख मूंद ली गई।

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घोषणात्मक बजट

यदि बजट में नई योजनाओं की घोषणाएं अधिक और पिछले वादों की समीक्षा कम हो, तो इसे “घोषणात्मक बजट” कहा जा सकता है, जो चुनावी दृष्टिकोण से प्रेरित प्रतीत होता है ।

निष्कर्ष तो यहीं निकलता है कि यदि बजट में सामाजिक न्याय, रोजगार, किसान हित और बुनियादी सुविधाओं पर ठोस, पारदर्शी और क्रियान्वित होने योग्य प्रावधान नहीं हैं, तो इसे संतुलित और दूरदर्शी बजट नहीं कहा जा सकता।


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