कई सांसद–विधायक बदल गए, कलेक्टरों की फेहरिस्त लंबी हो गई… लेकिन सड़क आज भी गड्ढों में दफन

 
छुरा (गंगा प्रकाश)। आज़ादी के सात दशक बाद भी गरियाबंद जिले की किस्मत नहीं बदली। राजधानी रायपुर से जुड़ने वाला और उड़ीसा तक पहुंच बनाने वाला राजिम से छुरा मुख्य मार्ग बीते 20 सालों से चौड़ीकरण और निर्माण की मांग पर अधूरा पड़ा है। नेता आते हैं, बड़े-बड़े वादे करते हैं, आश्वासन का गुलदस्ता थमाते हैं और फिर गायब हो जाते हैं। नतीजा – आज भी 43 किलोमीटर लंबा यह मार्ग गड्ढों और हादसों की सड़क बन चुका है।

मौत को न्योता देती सड़क

राजिम से छुरा तक का यह मार्ग केवल स्थानीय जरूरत ही नहीं, बल्कि प्रदेश और पड़ोसी राज्य उड़ीसा को जोड़ने वाला अहम रास्ता है। लेकिन हालत यह है कि जगह-जगह गहरे गड्ढे, उखड़े डामर और टूटी पुलिया मौत को आमंत्रण दे रहे हैं। आए दिन छोटे-बड़े हादसे होते हैं, लेकिन प्रशासन और नेताओं के कान पर जूं तक नहीं रेंगती।
ग्रामीणों का कहना है – “नेता केवल कार्यक्रमों और भाषणों में सड़क की चर्चा करते हैं, लेकिन वास्तविक काम धरातल पर कभी नहीं दिखता। हर बार चुनाव से पहले रोड चौड़ीकरण का वादा किया जाता है, लेकिन चुनाव खत्म होते ही सब वादा कागजों में दब जाता है।”

कांग्रेस–भाजपा दोनों पर सवाल

बीते 20 सालों में प्रदेश में कांग्रेस और भाजपा – दोनों दलों की सरकारें आईं और गईं। पर सड़क की हालत जस की तस रही। ग्रामीणों का आरोप है कि पीडब्ल्यूडी विभाग द्वारा रिपेयर के नाम पर हर साल करोड़ों का खेल होता है। कागजों में सड़क को दुरुस्त दिखा दिया जाता है, लेकिन हकीकत में हालात और खराब हो जाते हैं।

आवेदन, आंदोलन और धरने – सब बेअसर

ग्रामीण पिछले दो दशकों में कई बार आवेदन, धरना–प्रदर्शन और आंदोलन कर चुके हैं। कलेक्टर और जनप्रतिनिधियों तक गुहार लगाई गई, लेकिन कोई सुनवाई नहीं हुई। सड़क न बनने के कारण पुल भी कमजोर और क्षतिग्रस्त हो चुके हैं। लोगों को डर है कि कभी भी बड़ा हादसा हो सकता है।

सियासत गरमाई, काम ठंडा

अब यह मुद्दा राजनीति की सियासी रोटियां सेंकने का जरिया बन गया है। भाजपा और कांग्रेस दोनों के नेता मंचों से सड़क बनाने का भरोसा देते हैं, लेकिन जमीनी काम नहीं होता। यही कारण है कि जनता में गहरी नाराज़गी और अविश्वास है।

जनता की आवाज़ – “सड़क दो, झूठे वादे नहीं”

क्षेत्रवासियों का कहना है कि सड़क का चौड़ीकरण उनके जीवन का सवाल है। स्कूली बच्चों से लेकर मरीजों तक, हर किसी को इस खस्ताहाल मार्ग से गुजरना पड़ता है। बरसात में हालात और भी बदतर हो जाते हैं। लोगों का कहना है कि अगर इस बार भी सड़क नहीं बनी तो वे जनप्रतिनिधियों का बहिष्कार करेंगे।
गरियाबंद जिले की जनता पिछले 20 सालों से जिस सड़क का सपना देख रही है, वह आज भी अधूरा है। सवाल यह है कि आखिर कब तक लोग मौत का सफर तय करेंगे? क्या नेताओं के वादों का अंत कभी होगा? या फिर यह सड़क राजनीति का सिर्फ एक और “चुनावी जुमला” बनकर रह जाएगी?

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