सरकारी फीस के बाद दस्तावेज लेखकों की मनमानी वसूली, अधिकारी-बाबू के नाम पर रकम मांगने के आरोप
छुरा रजिस्ट्री कार्यालय की कार्यप्रणाली पर सवाल, अपंजीकृत दस्तावेज लेखकों के सक्रिय होने की भी शिकायत
छुरा (गंगा प्रकाश)। जमीन खरीदना है तो पहले जमीन की कीमत, फिर स्टाम्प ड्यूटी और पंजीयन शुल्क… इसके बाद शुरू होता है रजिस्ट्री कार्यालय का खर्च। आरोप है कि सरकारी शुल्क चुकाने के बाद भी खरीदारों को दस्तावेज लेखन और ‘काम कराने’ के नाम पर अतिरिक्त रकम देनी पड़ रही है। छुरा रजिस्ट्री कार्यालय की कार्यप्रणाली को लेकर सामने आ रही शिकायतों ने अब पूरी व्यवस्था की पारदर्शिता पर सवाल खड़े कर दिए हैं।
स्थानीय स्तर पर लगातार यह शिकायत चर्चा में है कि दस्तावेज लेखकों द्वारा अपनी सुविधा के अनुसार फीस तय की जा रही है। कुछ मामलों में अधिकारी-बाबू को देना है कहकर अतिरिक्त राशि मांगे जाने का भी आरोप है। वहीं कुछ पंजीकृत दस्तावेज लेखकों ने कार्यालय में अपंजीकृत लोगों के सक्रिय होने की शिकायत की है।
सरकारी शुल्क की जानकारी के बाद भी खरीदार क्यों असमंजस में?
रजिस्ट्री कराने पहुंचने वाले अधिकांश लोगों को यह जानकारी रहती है कि स्टाम्प शुल्क और पंजीयन शुल्क के रूप में उन्हें निर्धारित सरकारी राशि देनी होगी। लेकिन दस्तावेज तैयार कराने के लिए कितनी राशि देनी है, इसकी स्पष्ट जानकारी कई लोगों को नहीं होती। यही स्थिति कथित मनमानी वसूली की वजह बन रही है। शिकायतकर्ताओं का कहना है कि एक ही तरह के दस्तावेज के लिए अलग-अलग लोगों से अलग-अलग राशि लिए जाने की बातें सामने आती रही हैं। ग्रामीण इलाकों से आने वाले लोग दस्तावेजी प्रक्रिया से अनजान होते हैं। वे दस्तावेज लेखक द्वारा बताई गई राशि को ही सही मानकर भुगतान कर देते हैं।

‘फीस’ कितनी, इसकी जानकारी कहां?
सबसे बड़ा सवाल दस्तावेज लेखन की फीस को लेकर है। खरीदारों का कहना है कि रजिस्ट्री कार्यालय में ऐसा स्पष्ट और प्रमुख शुल्क बोर्ड होना चाहिए, जिससे आम नागरिक को पहले ही पता चल सके कि किस काम के लिए कितनी राशि देनी है। यदि शुल्क की स्पष्ट जानकारी कार्यालय में उपलब्ध हो तो नागरिक यह समझ सकता है कि उससे ली जा रही राशि वैध है या नहीं। शिकायतकर्ताओं की मांग है कि दस्तावेज लेखकों द्वारा ली जाने वाली फीस की अधिकृत जानकारी भी सार्वजनिक की जाए।
पंजीकृत कम, अपंजीकृत ज्यादा?
छुरा रजिस्ट्री कार्यालय में दस्तावेज लेखकों की भूमिका को लेकर भी सवाल उठ रहे हैं। कुछ पंजीकृत दस्तावेज लेखकों का आरोप है कि ऐसे कई लोग भी कार्यालय के आसपास सक्रिय हैं, जिनका दस्तावेज लेखक के रूप में पंजीयन नहीं है। आरोप है कि ये लोग भी जमीन की रजिस्ट्री से संबंधित दस्तावेज तैयार कराने और लोगों से रकम लेने का काम कर रहे हैं। यदि ऐसा है तो यह विभागीय जांच का विषय है कि बिना पंजीयन के कोई व्यक्ति किस आधार पर यह काम कर रहा है।
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‘बाबू को देना है’… सबसे गंभीर आरोप
शिकायतों में सबसे गंभीर बात अधिकारी और बाबू के नाम पर कथित रूप से अतिरिक्त राशि मांगे जाने की है। कुछ लोगों के अनुसार दस्तावेज लेखक द्वारा यह कहा जाता है कि अतिरिक्त राशि कार्यालय में ‘काम कराने’ या संबंधित अधिकारी-कर्मचारी को देने के लिए जरूरी है। कुछ मामलों में यह भी कहा जाने की शिकायत है कि राशि देने पर काम जल्दी हो जाएगा। इन आरोपों की पुष्टि नहीं हुई है। लेकिन यदि किसी सरकारी अधिकारी या कर्मचारी का नाम लेकर नागरिकों से राशि वसूली जा रही है तो यह गंभीर मामला है। यह भी जांच का विषय है कि कथित रकम वास्तव में किसी अधिकारी-कर्मचारी तक पहुंचती है या केवल नाम का इस्तेमाल कर वसूली की जा रही है।

काम जल्दी चाहिए तो अलग रेट?
रजिस्ट्री कार्यालय में ‘जल्दी काम’ कराने के नाम पर भी अतिरिक्त राशि लिए जाने की चर्चा है। शिकायतकर्ताओं का कहना है कि सामान्य प्रक्रिया से काम कराने के बजाय यदि कोई व्यक्ति जल्दी दस्तावेज तैयार कराने या रजिस्ट्री की प्रक्रिया जल्द पूरी कराने की बात करता है तो उससे अतिरिक्त रकम मांगे जाने की शिकायत सामने आती है। यदि किसी सरकारी प्रक्रिया को निर्धारित नियमों के बजाय अतिरिक्त भुगतान से प्रभावित किया जा रहा है तो यह व्यवस्था की पारदर्शिता पर गंभीर सवाल है।
किसान और ग्रामीण ज्यादा परेशान
छुरा क्षेत्र में जमीन संबंधी कार्यों के लिए बड़ी संख्या में ग्रामीण और किसान रजिस्ट्री कार्यालय पहुंचते हैं। इनमें से कई लोगों को स्टाम्प, पंजीयन, दस्तावेज लेखन और अन्य कानूनी प्रक्रियाओं की जानकारी नहीं होती। ऐसे में वे पूरी तरह दस्तावेज लेखकों पर निर्भर रहते हैं। यही वजह है कि लोगों का कहना है कि कार्यालय में शुल्क की पूरी जानकारी सार्वजनिक होना जरूरी है। इससे आम आदमी किसी के भरोसे नहीं रहेगा और उसे पता होगा कि उसे किस मद में कितनी राशि का भुगतान करना है।
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हर भुगतान की रसीद क्यों नहीं?
शिकायतों के बीच एक और सवाल भुगतान की रसीद को लेकर उठ रहा है। नागरिकों का कहना है कि दस्तावेज लेखन अथवा किसी भी वैध सेवा के बदले ली जाने वाली राशि की रसीद मिलनी चाहिए। रसीद होने पर भुगतान का रिकॉर्ड रहेगा और बाद में विवाद होने की स्थिति में वास्तविकता सामने लाई जा सकती है।
कार्यालय में लगे शुल्क बोर्ड की हो जांच
मामले में संबंधित विभाग को यह भी देखना चाहिए कि कार्यालय में निर्धारित सरकारी शुल्क और अन्य वैध देयकों की जानकारी किस तरह प्रदर्शित की गई है। यदि शुल्क बोर्ड है तो क्या वह आम नागरिक को आसानी से दिखाई देता है? क्या उसमें सभी जरूरी जानकारी अपडेट है? क्या दस्तावेज लेखकों के नाम और पंजीयन की स्थिति सार्वजनिक है?
इन सवालों का जवाब भी जांच के दौरान सामने आना चाहिए।
शिकायत की व्यवस्था कितनी मजबूत?
यदि किसी नागरिक से निर्धारित शुल्क से अधिक राशि मांगी जाती है तो वह शिकायत कहां करे? यह जानकारी भी कार्यालय में स्पष्ट रूप से उपलब्ध होनी चाहिए। शिकायत पेटी, संबंधित अधिकारी का नाम और संपर्क नंबर तथा उच्च अधिकारियों तक शिकायत पहुंचाने की व्यवस्था सार्वजनिक होने से लोगों का भरोसा बढ़ेगा।
औचक जांच से खुल सकता है राज
शिकायतों की वास्तविकता जानने के लिए विभागीय अधिकारियों का औचक निरीक्षण महत्वपूर्ण साबित हो सकता है। निरीक्षण के दौरान दस्तावेज लेखकों की सूची और पंजीयन, उनके द्वारा ली जा रही फीस, नागरिकों से भुगतान का तरीका तथा कार्यालय परिसर में सक्रिय अन्य लोगों की भूमिका की जांच की जा सकती है। हाल में रजिस्ट्री कराने वाले खरीदारों से गोपनीय रूप से जानकारी लेने पर भी कई तथ्य सामने आ सकते हैं।
आरोप सही तो कार्रवाई, गलत तो स्थिति साफ करे विभाग
छुरा रजिस्ट्री कार्यालय को लेकर लगाए जा रहे आरोपों की सच्चाई जांच के बाद ही सामने आएगी। यदि जांच में अनियमितता, अनधिकृत वसूली या अपंजीकृत लोगों के सक्रिय होने की पुष्टि होती है तो जिम्मेदार लोगों पर नियमानुसार कार्रवाई होनी चाहिए। वहीं यदि आरोप तथ्यहीन पाए जाते हैं तो विभाग को भी सार्वजनिक रूप से स्थिति स्पष्ट करनी चाहिए, ताकि किसी निर्दोष व्यक्ति या अधिकारी की छवि प्रभावित न हो।

बड़ा सवाल : आखिर खरीदार दे तो दे किसे?
जमीन की कीमत चुकाई। सरकारी शुल्क दिया। इसके बाद दस्तावेज लेखन का खर्च। फिर कथित रूप से ‘काम कराने’ के नाम पर अतिरिक्त रकम।
तो सवाल सीधा है—
- रजिस्ट्री की वास्तविक लागत आखिर कितनी है?
- क्या हर खरीदार को शुल्क की पूरी जानकारी मिलती है?
- क्या दस्तावेज लेखकों की फीस पर निगरानी है?
- क्या कार्यालय में सक्रिय सभी दस्तावेज लेखक पंजीकृत हैं?
- और सबसे बड़ा सवाल—यदि अधिकारी या बाबू के नाम पर रकम मांगी जा रही है तो इसकी जांच कब होगी?
छुरा के नागरिक अब इन सवालों के जवाब चाहते हैं। जरूरत है कि संबंधित विभाग मामले को केवल शिकायत मानकर नजरअंदाज करने के बजाय निष्पक्ष जांच करे और यदि व्यवस्था में खामी है तो उसे दूर करे।




