चंद्रशेखर साहू

सुकमा (गंगा प्रकाश)। कैलेंडर के पन्ने साल-दर-साल बदलते जा रहे हैं। सूबे में सरकारें बदल रहीं, चेहरे बदल रहे हैं और दावों की लंबी-चौड़ी फेहरिस्त भी पेश की जा रही है। लेकिन इन सबके बीच बस्तर और सुकमा जिले की लाइफलाइन कहे जाने वाली जीरम घाटी (राष्ट्रीय राजमार्ग-30) आज अपनी आखिरी सांसें गिन रही है। तीन राज्यों—छत्तीसगढ़, ओडिशा और आंध्र प्रदेश—को आपस में जोड़ने वाला यह अति-महत्वपूर्ण मार्ग आज विकास के दावों को मुंह चिढ़ा रहा है। बदहाली का आलम यह है कि इस रास्ते से गुजरना अब किसी बुरे सपने से कम नहीं है।

मरम्मत के नाम पर सिर्फ छलावा, उड़ रहा धूल का बवंडर

स्थानीय ग्रामीणों और राहगीरों का आरोप है कि प्रशासन और विभाग सड़क सुधार के नाम पर सिर्फ खानापूर्ति कर रहे हैं। डामरीकरण या ठोस निर्माण की जगह गड्ढों में सिर्फ पत्थर का चूरा (क्रशर डस्ट) और गिट्टी डाल दी जाती है। नतीजा यह होता है कि जब भी कोई भारी वाहन यहाँ से गुजरता है, तो पीछे चल रहे दोपहिया वाहन चालकों के लिए ‘धूल का बवंडर’ खड़ा हो जाता है। आँखों में चुभते पत्थर के कण और सांसों में घुलती धूल राहगीरों को बीमार और दुर्घटना का शिकार बना रही है।

एक पीड़ित दोपहिया वाहन चालक – गाड़ी चलती है तो ऐसा बवंडर उठता है कि सामने कुछ दिखाई नहीं देता। यह सड़क नहीं, बल्कि दुर्घटनाओं को आमंत्रण देने वाला मौत का कुआं बन चुकी है।

चमगादड़ों की हो रही मौत, पेड़ों से गिरते ही कुत्तों का बन रहे शिकार

शहीदों के खून से सींची सड़क पर ‘सियासी अनदेखी’

यह वही जीरम घाटी है, जिसके निर्माण और सुरक्षा के लिए देश के न जाने कितने जवानों ने अपनी शहादत दी है। इस मार्ग पर सफर करते-करते न जाने कितने परिवारों के चिराग बुझ गए और कितनों के घर उजड़ गए। विडंबना देखिए कि जिस रास्ते को बनाने में खून बहा, आज वह प्रशासनिक उपेक्षा का शिकार है। हालात इतने बदतर हो चुके हैं कि अब लोग इस रास्ते पर जाने से कतराने लगे हैं।

बंद शीशों वाली कारों में बैठे नेताओं को क्या मालूम जनता का दर्द?

जनता में इस बात को लेकर भारी आक्रोश है कि चुनाव के समय बड़े-बड़े वादे करने वाले राजनेता आज मौन हैं। नेता और बड़े अधिकारी जब भी इस मार्ग से गुजरते हैं, तो वे अपनी महंगी, वातानुकूलित (AC) गाड़ियों के कांच बंद कर के सरपट निकल जाते हैं। उन्हें बाहर उड़ते धूल के गुबार और पत्थरों के बीच संघर्ष करते आम जनता और दोपहिया वाहन चालकों की बेबसी नजर नहीं आती।

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जनता का तीखा सवाल:

आखिर कब तक सुकमा की इस लाइफलाइन को मौत का मार्ग बनने के लिए छोड़ दिया जाएगा? क्या सरकार और प्रशासन किसी बड़े हादसे का इंतजार कर रहे हैं, या फिर शहीदों की शहादत और आम जनता की सहूलियत की कीमत इन फाइलों और कागजी मरम्मत के खेल से कम है? जनता अब खोखले वादे नहीं, बल्कि जीरम घाटी का पक्का और स्थाई निर्माण चाहती है।

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