खेत बने गोदाम, बाइक बनी ढुलाई मशीन—नाके मौजूद, पर तस्करी बेखौफ

गजानंद कश्यप
गरियाबंद (गंगा प्रकाश)। गरियाबंद जिले के देवभोग और अमलीपदर अंचल में धान तस्करी ने अब ऐसा रूप ले लिया है, जिसने प्रशासन की पारंपरिक निगरानी व्यवस्था को सीधी चुनौती दे दी है। बड़े वाहनों पर सख्ती बढ़ते ही तस्करों ने खेल पलट दिया। अब न ट्रक, न पिकअप—धान तस्करी बाइक और साइकिल से हो रही है। दिखने में मामूली, लेकिन असर में बेहद घातक यह “माइक्रो-तस्करी मॉडल” चुपचाप सीमा पार करा रहा है हजारों क्विंटल धान।

ओडिशा से खेतों तक, खेतों से छत्तीसगढ़ तक

सूत्रों के मुताबिक, ओडिशा से लाई गई बड़ी मात्रा में धान पहले छत्तीसगढ़ सीमा से सटे खेतों में डंप की जाती है। ये खेत अब अस्थायी गोदाम बन चुके हैं। इसके बाद रात के अंधेरे में दर्जनों बाइकर्स और साइकिल सवार सक्रिय होते हैं। हर वाहन पर 1–2 बोरा लादकर कच्ची पगडंडियों से सीमा पार कर दी जाती है खेप।

न नाके की लाइन, न चेक पोस्ट का डर—तस्कर जानते हैं कि छोटी खेप पर शक कम होता है।

बाइक-चेन सिस्टम’—जहां गणित भी तस्करी के पक्ष में

तस्करों ने तस्करी का पूरा गणित फिट कर लिया है— एक पिकअप में औसतन 70 बोरा धान,5 बाइकर्स की टीम एक चक्कर में 10 बोरा पार,7 चक्कर में पूरी पिकअप की खेप छत्तीसगढ़ में खप यानी बड़े वाहन पकड़े जाने का खतरा खत्म और तस्करी का काम लगातार जारी।

नाके खड़े हैं, रास्ते बगल से निकल रहे हैं

अमाड, बरही, त्वासमाला, कैटपदर, खोखसरा, मगररोडा, धूपकोट, पिटापारा, सेंदमुड़ा, तेतलखुटी, चकामॉल, भरवामुड़ा, बुर्जाबहाल, बीरीघाट, उरमाल और पानीगांव जैसे ओडिशा सीमा से सटे इलाके अब माइक्रो-तस्करी के सबसे बड़े रूट बन चुके हैं। नाके अपनी जगह खड़े हैं, लेकिन तस्करी उनसे होकर नहीं, बल्कि उनसे बचकर निकल रही है।
स्थानीय ग्रामीणों का दावा है कि तस्कर 24 घंटे सक्रिय हैं, लेकिन कार्रवाई कहीं नजर नहीं आती।

बड़े वाहन रोके, पर तस्करी नहीं

प्रशासन की सख्ती ने तस्करी को खत्म नहीं किया, सिर्फ उसका चेहरा बदल दिया। ट्रक और पिकअप पर कार्रवाई जरूर हुई, लेकिन बाइक-साइकिल नेटवर्क पर अब तक ठोस रणनीति नहीं बन पाई। यही वजह है कि धान अब बोरा-बोरा कर सीमा पार हो रहा है—और नुकसान कई गुना बढ़ता जा रहा है।

ग्रामीणों की चेतावनी—अब भी नहीं चेते, तो हालात और बिगड़ेंगे
ग्रामीणों और जागरूक नागरिकों की दो टूक मांग है कि नाका-बॉर्डर पर बाइक और साइकिल की भी सघन जांच हो। सीमा से लगे खेतों में हो रही डंपिंग पर तत्काल कार्रवाई की जाए। यदि इस माइक्रो-तस्करी नेटवर्क को समय रहते नहीं तोड़ा गया, तो आने वाले दिनों में यह सिस्टम के लिए सबसे बड़ी चुनौती बन जाएगा।

अंतिम सवाल
जब तस्करी ट्रक से होती थी, तब पकड़ में आ जाती थी।
अब जब साइकिल से हो रही है—तो क्या व्यवस्था की नजर भी उतनी ही तेज है?
धान तस्करी का यह नया अवतार अब सिर्फ कानून व्यवस्था नहीं, बल्कि प्रशासनिक इच्छाशक्ति की भी परीक्षा ले रहा है।


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