पानी, सड़क, आवास और जमीन के लिए जूझ रहे नौ परिवार, सरकारी योजनाओं के दावों पर उठे सवाल
छुरा (गंगा प्रकाश)। प्रदेशभर में इन दिनों शासन-प्रशासन द्वारा “सुशासन तिहार” के माध्यम से जनकल्याणकारी योजनाओं की उपलब्धियों का बखान किया जा रहा है। गांव-गांव शिविर लगाकर समस्याओं के निराकरण और विकास कार्यों की जानकारी दी जा रही है। लेकिन गरियाबंद जिले के छुरा विकासखंड अंतर्गत ग्राम पंचायत बोड़राबांधा के आश्रित पारा खरखरा की तस्वीर इन दावों से बिल्कुल अलग नजर आती है। यहां निवासरत विशेष पिछड़ी कमार जनजाति के नौ परिवार आज भी मूलभूत सुविधाओं के अभाव में जीवन यापन करने को मजबूर हैं।
विशेष पिछड़ी जनजाति की श्रेणी में शामिल कमार समुदाय के ये परिवार आज भी ऐसे हालात में जीवन बिता रहे हैं, जहां स्वच्छ पेयजल, पक्की सड़क, प्रधानमंत्री आवास और कृषि भूमि जैसी बुनियादी सुविधाएं भी उनकी पहुंच से दूर हैं। शासन की विभिन्न योजनाओं के प्रचार-प्रसार के बावजूद इन परिवारों का कहना है कि उन्हें योजनाओं का वास्तविक लाभ नहीं मिल पाया है।

पानी के लिए रोजाना संघर्ष
खरखरा पारा की महिलाओं सुमित्रा बाई और माया बाई सहित ग्रामीण चिरांऊजी राम बताते हैं कि उनके मोहल्ले में आज तक नलजल योजना का लाभ नहीं पहुंचा है। पेयजल और दैनिक उपयोग के पानी के लिए ग्रामीणों को दूर-दराज के स्रोतों पर निर्भर रहना पड़ता है। गर्मी के दिनों में स्थिति और भी गंभीर हो जाती है। ग्रामीणों का कहना है कि कई बार उन्हें घंटों तक पानी की व्यवस्था करने में समय लगाना पड़ता है। ग्रामीणों के अनुसार, कई बार जनप्रतिनिधियों और अधिकारियों को समस्या से अवगत कराया गया, लेकिन स्थिति में कोई ठोस सुधार नहीं हुआ। उनका कहना है कि सुशासन और विकास की बातें केवल मंचों और बैठकों तक सीमित दिखाई देती हैं, जबकि जमीनी स्तर पर हालात जस के तस बने हुए हैं।
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सड़क नहीं, बारिश में बन जाता है दलदल
खरखरा पारा तक पहुंचने के लिए आज भी पक्की सड़क उपलब्ध नहीं है। बारिश के मौसम में पूरा रास्ता कीचड़ और दलदल में तब्दील हो जाता है। ग्रामीणों का कहना है कि बरसात के दौरान बच्चों को स्कूल जाने और मरीजों को अस्पताल पहुंचाने में भारी परेशानियों का सामना करना पड़ता है। ग्रामीण बताते हैं कि कई बार गर्भवती महिलाओं और बीमार लोगों को कंधे अथवा वैकल्पिक साधनों से मुख्य सड़क तक लाना पड़ता है। ऐसे हालात में आपातकालीन चिकित्सा सुविधा तक पहुंचना भी बड़ी चुनौती बन जाता है।

प्रधानमंत्री आवास योजना से अब तक वंचित
राज्य भर में हर गरीब परिवार को पक्का मकान उपलब्ध कराने के दावे किए जा रहे हैं, लेकिन खरखरा पारा के अधिकांश परिवार आज भी घास-फूस, लकड़ी और कवेलू से बने कच्चे मकानों में रहने को विवश हैं। ग्रामीणों का आरोप है कि कई बार आवेदन और मांग करने के बावजूद उन्हें प्रधानमंत्री आवास योजना का लाभ नहीं मिल सका।
ग्रामीणों का कहना है कि बरसात के दिनों में कच्चे मकानों में रहना मुश्किल हो जाता है। छत से पानी टपकने और दीवारों के कमजोर होने का खतरा हमेशा बना रहता है। इसके बावजूद उनकी समस्याओं का स्थायी समाधान नहीं हो पाया है।
चुनाव के समय वादे, बाद में उपेक्षा
ग्रामीणों का आरोप है कि चुनाव के दौरान जनप्रतिनिधि और राजनीतिक दलों के कार्यकर्ता उनके पारा तक पहुंचते हैं, विकास के बड़े-बड़े वादे करते हैं और योजनाओं का लाभ दिलाने का भरोसा देते हैं। लेकिन चुनाव समाप्त होने के बाद उनकी समस्याओं की ओर कोई ध्यान नहीं दिया जाता। ग्रामीणों का कहना है कि वर्षों से वे मूलभूत सुविधाओं की मांग कर रहे हैं, लेकिन आज तक कोई प्रभावी पहल दिखाई नहीं दी। इससे लोगों में निराशा और असंतोष बढ़ रहा है।
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भूमिहीन परिवारों को नहीं मिला पट्टा
कमार जनजाति के अधिकांश परिवार पारंपरिक रूप से जंगल और वनोपज पर निर्भर हैं। ग्रामीणों का कहना है कि आज तक उन्हें कृषि कार्य के लिए पर्याप्त भूमि या स्थायी पट्टा उपलब्ध नहीं कराया गया है। जीविकोपार्जन के लिए वे जंगलों से प्राप्त संसाधनों और मजदूरी पर निर्भर हैं। ग्रामीणों ने यह भी आरोप लगाया कि कई स्थानों पर प्रभावशाली लोगों द्वारा वन भूमि पर कब्जा कर लाभ प्राप्त कर लिया गया, जबकि वास्तविक जरूरतमंद और पात्र परिवार आज भी सरकारी सहायता की प्रतीक्षा कर रहे हैं। हालांकि इन आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हो सकी है, लेकिन ग्रामीणों ने मामले की निष्पक्ष जांच की मांग की है।
प्रशासन से तत्काल हस्तक्षेप की मांग
ग्रामीणों का कहना है कि यदि शासन वास्तव में विशेष पिछड़ी जनजातियों के संरक्षण और विकास के प्रति गंभीर है, तो खरखरा पारा जैसे दूरस्थ इलाकों की समस्याओं को प्राथमिकता के आधार पर हल किया जाना चाहिए। उन्होंने पेयजल व्यवस्था, सड़क निर्माण, प्रधानमंत्री आवास, भूमि पट्टा और अन्य मूलभूत सुविधाएं उपलब्ध कराने की मांग की है।
खरखरा पारा की स्थिति यह सवाल खड़ा करती है कि जब विशेष पिछड़ी जनजातियों के विकास के लिए अनेक योजनाएं संचालित की जा रही हैं, तब भी ऐसे परिवार मूलभूत सुविधाओं से क्यों वंचित हैं। सुशासन के दावों और जमीनी हकीकत के बीच का यह अंतर प्रशासन के लिए गंभीर चिंतन का विषय बन गया है। अब देखना यह होगा कि जिला प्रशासन इन परिवारों की समस्याओं को कितनी गंभीरता से लेकर उनके जीवन में वास्तविक बदलाव ला पाता है।




