बेंगलूर आश्रम शाला में शिक्षक के ध्वजारोहण को लेकर ग्रामीणों में नाराजगी, प्रशासन से जांच और कार्रवाई की मांग
भूषण सेठिया
भैरमगढ़/बीजापुर (गंगा प्रकाश)। कभी नक्सलवाद की चुनौती से जूझने वाला बस्तर आज शिक्षा, विकास और लोकतांत्रिक व्यवस्था की नई राह पर आगे बढ़ रहा है। नक्सल प्रभावित क्षेत्रों में आश्रम शालाएं शिक्षा की उम्मीद का केंद्र बन रही हैं। ऐसे समय में ग्राम पंचायत बेंगलूर स्थित आश्रम शाला छात्रावास से सामने आई ध्वजारोहण की तस्वीर ने राष्ट्रीय ध्वज के सम्मान और संस्थागत अनुशासन को लेकर सवाल खड़े कर दिए हैं।

आरोप है कि आश्रम शाला में पदस्थ शिक्षक पवन सिन्हा ने जूते पहनकर राष्ट्रीय ध्वज का ध्वजारोहण किया। घटना को लेकर ग्रामीणों और अभिभावकों में नाराजगी है। उनका कहना है कि जिस बस्तर में शिक्षा और लोकतांत्रिक मूल्यों को मजबूत करने के लिए लगातार प्रयास हो रहे हैं, वहां शैक्षणिक संस्थान में राष्ट्रीय ध्वज जैसे राष्ट्रीय गौरव के प्रतीक से जुड़े कार्यक्रम में विशेष सावधानी और मर्यादा बरती जानी चाहिए।
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बारिश का हवाला, शिक्षक के जवाब पर भी उठे सवाल
मामले को लेकर जब शिक्षक पवन सिन्हा से सवाल किया गया तो उन्होंने बारिश का हवाला देते हुए जूते नहीं उतारने की बात कही। शिक्षक ने कहा कि बारिश ज्यादा हो रही थी, इस कारण मैंने जूता नहीं उतारा, इसमें कौन सी बड़ी गलती हो गई।

शिक्षक के इस जवाब को लेकर ग्रामीणों में और नाराजगी देखने को मिली। ग्रामीणों का कहना है कि शिक्षक बच्चों के लिए अनुशासन, संस्कार और राष्ट्रप्रेम का उदाहरण होते हैं। ऐसे में राष्ट्रीय ध्वज से जुड़े कार्यक्रम में शिक्षक के आचरण को लेकर सवाल उठना स्वाभाविक है।
ध्वज संहिता में राष्ट्रीय ध्वज की गरिमा सर्वोपरि
भारतीय ध्वज संहिता, 2002 में राष्ट्रीय ध्वज के सम्मान और उसके प्रदर्शन को लेकर विभिन्न प्रावधान किए गए हैं। संहिता का मूल उद्देश्य राष्ट्रीय ध्वज की गरिमा बनाए रखना है। ध्वजारोहण के दौरान निर्धारित शिष्टाचार और सम्मान का पालन किया जाना चाहिए।
हालांकि केवल जूते पहने होने को अपने आप में ध्वज संहिता का स्पष्ट उल्लंघन बताना उचित नहीं होगा, लेकिन विद्यालय जैसे संस्थान में ध्वजारोहण के दौरान शिक्षक से गरिमापूर्ण एवं अनुकरणीय आचरण की अपेक्षा जरूर की जाती है। यही वजह है कि इस घटना को लेकर ग्रामीणों ने सवाल उठाए हैं और विभागीय जांच की मांग की है।
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नक्सल मुक्त बस्तर में शिक्षा की साख का सवाल
बस्तर लंबे समय तक नक्सलवाद की चुनौती से प्रभावित रहा है। अब नक्सल मुक्त बस्तर की दिशा में आगे बढ़ते हुए शासन-प्रशासन शिक्षा और विकास को गांव-गांव तक पहुंचाने पर जोर दे रहा है। आश्रम शालाएं इस बदलाव में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही हैं। ऐसे दौर में शिक्षण संस्थानों में अनुशासन, राष्ट्रप्रेम और संवैधानिक मूल्यों की मजबूत नींव रखना और भी जरूरी हो जाता है।

ग्रामीणों का कहना है कि बच्चों को किताबों के साथ-साथ राष्ट्रीय प्रतीकों के सम्मान और नागरिक कर्तव्यों की सीख भी विद्यालय से मिलती है। इसलिए ध्वजारोहण जैसे अवसरों पर शिक्षकों का आचरण विद्यार्थियों के लिए उदाहरण बनता है।
जांच के बाद स्थिति हो साफ
ग्रामीणों और अभिभावकों ने जिला प्रशासन तथा संबंधित शिक्षा विभाग से मामले की निष्पक्ष जांच कराने की मांग की है। उनका कहना है कि यदि कार्यक्रम के दौरान निर्धारित प्रोटोकॉल या विभागीय निर्देशों की अनदेखी हुई है तो जिम्मेदारी तय की जाए। साथ ही आश्रम शालाओं में कार्यरत शिक्षकों एवं कर्मचारियों को राष्ट्रीय ध्वज के सम्मान, ध्वज संहिता और सार्वजनिक कार्यक्रमों की मर्यादा के संबंध में आवश्यक प्रशिक्षण देने की मांग भी की गई है।
नक्सलवाद से निकलकर विकास और शिक्षा की ओर बढ़ रहे बस्तर में राष्ट्रीय ध्वज केवल एक कपड़ा नहीं, बल्कि देश की एकता, अखंडता और लोकतांत्रिक विश्वास का प्रतीक है। ऐसे में ध्वजारोहण से जुड़े हर कार्यक्रम में गरिमा और अनुशासन बनाए रखना व्यवस्था की जिम्मेदारी भी है और समाज की अपेक्षा भी।




