युक्तियुक्तकरण प्रक्रिया पर सवाल — आखिर शिक्षा विभाग में कौन चला रहा है सेटिंग का खेल?

छुरा/गरियाबंद (गंगा प्रकाश)। ब्लॉक से जिला स्तर तक – शिक्षा विभाग में चल रही युक्तियुक्तकरण प्रक्रिया (Rationalization) का मकसद था—शिक्षकों की वास्तविक आवश्यकता के अनुसार स्कूलों में पदस्थापना सुनिश्चित करना, ताकि जहां शिक्षक कम हैं, वहां पर्याप्त संख्या में शिक्षकों की तैनाती हो सके। परंतु यह नेक पहल अब सवालों के घेरे में है। गरियाबंद जिले से लेकर रायपुर संभाग तक, “अतिशेष” शिक्षकों की सूची सेटिंग-सिस्टम का पर्याय बन चुकी है।

ब्लॉक स्तर से संभाग तक — ‘रेट तय’, सिस्टम बेअसर

सूत्रों के मुताबिक, छुरा ब्लॉक सहित कई शिक्षा संकुलों में कुछ समन्वयक शिक्षक ऐसे हैं जो अटैचमेंट और अतिशेष से लेकर “अतिविशेष” तक का खेल रचते हैं। बताया जा रहा है कि इसका बाकायदा रेट तय है, और एक खास “लॉबी” इस पूरे ट्रांसफर और युक्तियुक्तकरण प्रक्रिया को प्रभावित कर रही है।

विकास खंड शिक्षा अधिकारी (BEO) द्वारा जिन शिक्षकों का नाम अतिशेष सूची में भेजा गया था, वे नाम जिला स्तर की समिति से गुजरकर रायपुर स्थित संभागीय संयुक्त संचालक (Joint Director, Education Division) तक पहुंचे। लेकिन हैरत की बात यह है कि रायपुर पहुंचते-पहुंचते कुछ नाम जादू की तरह सूची से गायब हो गए।

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हेमलता निर्मलकर का मामला — प्रक्रिया पर सबसे बड़ा प्रश्नचिह्न

छुरा ब्लॉक के पूर्व माध्यमिक विद्यालय सरकंडा में पदस्थ एलबी शिक्षिका हेमलता निर्मलकर का मामला अब इस पूरी प्रक्रिया की साख पर सबसे बड़ा सवाल बन गया है।

हेमलता निर्मलकर को अतिशेष घोषित कर मैनपुर विकासखंड के कुल्हाड़ीघाट स्कूल में पदस्थ किया गया था, जहां उन्होंने बाकायदा ज्वाइनिंग भी कर ली थी। लेकिन गरियाबंद जिले के कई शिक्षकों ने इस युक्तियुक्तकरण प्रक्रिया में अनियमितताओं के खिलाफ हाईकोर्ट में रिट याचिका दायर की। कोर्ट ने आदेश दिया कि याचिकाकर्ता शिक्षकों को संभागीय समिति के समक्ष आवेदन देने और निर्णय होने तक “यथास्थिति बनाए रखने” की अनुमति दी जाए।

इसी आदेश के बाद संभागीय संयुक्त संचालक शिक्षा रायपुर ने 4 जुलाई 2025 को पत्र क्रमांक 2448/युक्तियुक्तकरण के माध्यम से जिला शिक्षा अधिकारी गरियाबंद को निर्देश दिया कि हेमलता निर्मलकर को पूर्व माध्यमिक शाला सरकंडा में उपस्थित कराया जाए। डीईओ गरियाबंद ने भी 4/7/25/4602/युक्तियुक्तकरण के तहत बीईओ को यही निर्देश दिए।

पर बड़ा सवाल यह है कि — जब संभागीय स्तर पर सुनवाई सूची में हेमलता निर्मलकर का नाम दर्ज था, तो फिर सुनवाई के वक्त उनका नाम सूची से गायब कैसे हो गया?,अगर सुनवाई में वे उपस्थित नहीं थीं, तो संभागीय समिति ने निर्णय लिया या नहीं?,और अगर नहीं लिया — तो फिर वे आज भी सरकंडा स्कूल में पदस्थ क्यों हैं?

संभागीय समिति की पारदर्शिता पर उठे गंभीर सवाल

संभाग आयुक्त रायपुर की अध्यक्षता में 22 और 23 अगस्त 2025 को युक्तियुक्तकरण से जुड़ी सुनवाई हुई थी। ग्यारह पन्नों की सूची जारी की गई थी, जिसमें दर्जनों शिक्षकों के नाम थे। लेकिन कुछ नामों का “गायब होना” यह साबित करता है कि सिस्टम पारदर्शी नहीं बल्कि ‘प्रभावशाली’ लोगों के कब्जे में है।

लोगों का कहना है कि “युक्तियुक्तकरण” अब “जुगाड़ियुक्तकरण” में बदल गया है। चायपान से लेकर जेब गरम करने तक के चर्चे अब शिक्षा विभाग के गलियारों से निकलकर चौक-चौराहों तक पहुंच चुके हैं।

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अधिकारियों की चुप्पी — मौन समर्थन या मिलीभगत?

इस पूरे मामले पर ब्लॉक शिक्षा अधिकारी किशुन मतावले का बयान भी सिस्टम की पोल खोलता है। उन्होंने कहा — ब्लॉक और जिला स्तर पर अतिशेष की सूची में हेमलता निर्मलकर का नाम था। लेकिन संभागीय सुनवाई सूची से नाम गायब होना वाकई आश्चर्यजनक है। हम लोगों को भी समझ नहीं आ रहा कि ऐसा कैसे हुआ।

वहीं जिला शिक्षा अधिकारी (D.E.O.) जगजीत सिंह को इस संबंध में व्हाट्सएप पर सवाल भेजे गए, लेकिन 36 घंटे बीत जाने के बाद भी कोई जवाब नहीं मिला।

जनता पूछ रही है — न्याय कहां है?

संभागीय समिति के गठन का उद्देश्य था—न्यायपूर्ण, पारदर्शी और निष्पक्ष निर्णय। लेकिन अगर सुनवाई से ही नाम गायब कर दिए जाएं, तो न्याय की उम्मीद करना बेमानी हो जाता है।

ऐसे में गरियाबंद से लेकर रायपुर तक युक्तियुक्तकरण प्रक्रिया की नैतिकता, पारदर्शिता और वैधता पर गंभीर प्रश्नचिह्न खड़ा हो गया है। शिक्षा विभाग का युक्तियुक्तकरण अब शिक्षकों की जरूरतों से ज्यादा, नेटवर्किंग और नजदीकी पर आधारित होता दिख रहा है। सवाल यह नहीं कि कौन अतिशेष या अतिविशेष है, सवाल यह है कि संभाग में जाकर “अतिशेष” शिक्षक “अतिविशेष” कैसे बन जाते हैं?

अब जनता पूछ रही है— क्या शिक्षा विभाग में ‘सेटिंग’ ही नई नीति बन चुकी है?


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