रेशम विभाग की नर्सरी में ऐसा क्या हुआ कि पहले दी गई सूचना भी बेअसर रही? नीलामी की तारीख से लेकर रकम के हिसाब तक उठ रहे कई सवाल
गरियाबंद (गंगा प्रकाश)। ग्राम पंचायत लोहरसी क्षेत्र स्थित रेशम विभाग की नर्सरी/केंद्र से संबंधित लकड़ी की कथित नीलामी अब कई सवालों के घेरे में आ गई है। खास बात यह है कि नीलामी से पहले ही पंचायत के पंच एवं मीडिया की ओर से संबंधित विभागीय अधिकारियों को इसकी जानकारी दिए जाने का दावा किया जा रहा है। इसके बावजूद कथित तौर पर नीलामी प्रक्रिया आगे बढ़ने को लेकर विभागीय कार्यप्रणाली पर सवाल उठ रहे हैं।
मामले में ग्राम पंचायत की भूमिका, रेशम विभाग की संपत्ति पर अधिकार, नीलामी की अनुमति, लकड़ी का मूल्यांकन, प्राप्त राशि और उसके जमा होने के रिकॉर्ड सहित कई बिंदुओं पर स्थिति स्पष्ट नहीं हो सकी है। हालांकि, इन आरोपों की वास्तविकता विभागीय दस्तावेज और निष्पक्ष जांच के बाद ही स्पष्ट हो सकेगी।

18 मई के आवेदन में भी उठ चुका था लकड़ी के हिसाब का मुद्दा
जानकारी के अनुसार ग्राम पंचायत लोहरसी के वार्ड क्रमांक 9 के पंच खेमचंद यादव ने 18 मई 2026 को विभिन्न विषयों को लेकर आवेदन प्रस्तुत किया था। बताया जा रहा है कि आवेदन के बिंदु क्रमांक 9 में पूर्व में बेची गई लकड़ी के हिसाब-किताब को लेकर सवाल उठाया गया था। शिकायतकर्ता पक्ष का आरोप है कि पहले बेची गई लकड़ी की बिक्री प्रक्रिया, प्राप्त राशि और उसके हिसाब-किताब को लेकर पंचायत स्तर पर स्पष्ट जानकारी उपलब्ध नहीं कराई गई। इसी बीच दोबारा लकड़ी बेचने की जानकारी सामने आने के बाद मामला और गंभीर हो गया।
नीलामी से पहले विभागीय अधिकारियों को दी गई सूचना
शिकायतकर्ता पक्ष के अनुसार 9 और 10 जुलाई 2026 को रेशम विभाग के अधिकारियों को लकड़ी की कथित नीलामी के संबंध में जानकारी दी गई थी। दावा है कि अधिकारियों को फोन के साथ-साथ व्हाट्सऐप के माध्यम से भी बताया गया कि लोहरसी स्थित रेशम विभाग की नर्सरी में रखी लकड़ी को ग्राम पंचायत की ओर से बेचे जाने की तैयारी की जा रही है। अब सवाल यह उठ रहा है कि यदि विभाग को नीलामी की जानकारी पहले से थी, तो क्या विभागीय स्तर पर इसकी वैधता की जांच की गई? क्या नीलामी रोकने या प्रक्रिया की निगरानी के लिए कोई अधिकारी मौके पर भेजा गया? इन सवालों का स्पष्ट जवाब सामने आना बाकी है।

व्हाट्सऐप पर बताया गया—रेशम विभाग की लकड़ी इस तरह नहीं बेची जाती
मामले में विभागीय बातचीत को लेकर भी विरोधाभास सामने आने का दावा किया जा रहा है। शिकायतकर्ता के अनुसार विभागीय अधिकारी से बातचीत के दौरान यह बताया गया था कि रेशम विभाग की नर्सरी की लकड़ी इस तरह नहीं बेची जाती। यदि यह बात विभागीय स्तर पर कही गई थी, तो फिर बाद में कथित तौर पर उसी परिसर की लकड़ी की नीलामी कैसे हुई? क्या नीलामी रेशम विभाग की अनुमति से हुई अथवा पंचायत स्तर पर किसी अन्य व्यवस्था के तहत? यही बिंदु अब जांच का विषय बन गया है।
सरपंच को किस अधिकार से मिली भूमिका?
मामले का सबसे अहम सवाल ग्राम पंचायत और रेशम विभाग के अधिकार क्षेत्र को लेकर है। यदि संबंधित लकड़ी रेशम विभाग की शासकीय संपत्ति है, तो ग्राम पंचायत के सरपंच को उसकी बिक्री अथवा नीलामी में भूमिका किस आदेश के तहत मिली? यदि रेशम विभाग ने ग्राम पंचायत अथवा सरपंच को कोई जिम्मेदारी सौंपी थी, तो उसका लिखित आदेश क्या है? क्या नीलामी के लिए विभागीय अनुमति जारी की गई थी? यदि अनुमति थी तो उसकी प्रति सार्वजनिक क्यों नहीं की गई?
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वहीं, यदि कोई लिखित आदेश नहीं था तो सरकारी संपत्ति की बिक्री अथवा नीलामी किस प्रक्रिया के तहत की गई—यह सवाल जांच की मांग कर रहा है।
रविवार को नीलामी क्यों? प्रक्रिया पर भी सवाल
शिकायतकर्ता के अनुसार पहले प्रस्तावित नीलामी की जानकारी सामने आने के बाद मामला मीडिया के संज्ञान में आया और प्रक्रिया रुकने की बात कही गई। इसके बाद कथित तौर पर रविवार को लकड़ी की नीलामी किए जाने की बात सामने आई है।
ऐसे में सवाल उठ रहे हैं कि क्या नीलामी के लिए सार्वजनिक सूचना जारी की गई थी? क्या निविदा या बोली की प्रक्रिया अपनाई गई? क्या नीलामी की तारीख निर्धारित करने संबंधी आदेश था? क्या विभागीय अधिकारी मौके पर मौजूद थे? क्या लकड़ी का मूल्यांकन किया गया था और क्या पंचनामा तैयार किया गया?
इन सवालों का जवाब नीलामी से संबंधित आधिकारिक दस्तावेजों से ही सामने आ सकता है।
कितनी लकड़ी थी, कितने में बिकी और पैसा कहां जमा हुआ?
पूरे मामले में लकड़ी की मात्रा और उसकी बिक्री राशि भी महत्वपूर्ण है। विभाग एवं पंचायत से यह स्पष्ट किए जाने की मांग उठ रही है कि नीलामी में कुल कितनी लकड़ी थी, उसका मूल्यांकन किसने किया, कितनी राशि में बिक्री हुई, खरीदार कौन थे और प्राप्त राशि किस खाते में जमा की गई।
साथ ही पूर्व में बेची गई लकड़ी से संबंधित रिकॉर्ड भी सार्वजनिक किए जाने की मांग की जा रही है।
सरपंच से संपर्क का प्रयास, नहीं मिल सका पक्ष
नीलामी के संबंध में ग्राम पंचायत लोहरसी के सरपंच लोमेश साहू से उनका पक्ष जानने के लिए फोन पर संपर्क करने का प्रयास किया गया। बताया गया कि 19 जून 2026 को दोपहर 1:04 बजे फोन किया गया। इसके बाद 1:05 बजे बातचीत हुई, जिसमें उनके द्वारा मीटिंग में होने और मीटिंग के बाद फोन करने की बात कही गई।
इसके बाद 20 जून को दोपहर 12:16 बजे पुनः संपर्क करने का प्रयास किया गया, लेकिन फोन रिसीव नहीं हुआ। इस कारण नीलामी के संबंध में सरपंच का विस्तृत पक्ष समाचार तैयार होने तक प्राप्त नहीं हो सका।

उपसंचालक सहित विभागीय अधिकारियों को भी जानकारी का दावा
मामले की जानकारी रायपुर में पदस्थ विभागीय उपसंचालक ठाकुर राम उइके सहित अन्य संबंधित अधिकारियों को पहले दिए जाने का दावा शिकायतकर्ता पक्ष ने किया है। आरोप है कि पूर्व सूचना के बावजूद नीलामी प्रक्रिया को रोकने अथवा उसकी वैधता की जांच के लिए प्रभावी कार्रवाई नहीं की गई।
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हालांकि, अधिकारियों की भूमिका अथवा किसी प्रकार की मिलीभगत के आरोपों को जांच के बिना तथ्य नहीं माना जा सकता। इसके लिए विभागीय पत्राचार, व्हाट्सऐप संदेश, नीलामी रिकॉर्ड और मौके की कार्रवाई की जांच आवश्यक होगी।
मिलीभगत के आरोप, लेकिन जांच से ही सामने आएगा सच
शिकायतकर्ता की ओर से पंचायत और विभागीय अधिकारियों के बीच मिलीभगत के आरोप लगाए जा रहे हैं। यह गंभीर आरोप है और इसकी पुष्टि केवल स्वतंत्र जांच तथा दस्तावेजी साक्ष्यों के आधार पर ही हो सकती है।
इसलिए पूरे मामले में निष्पक्ष जांच की आवश्यकता बताई जा रही है। जांच में यदि यह सामने आता है कि सरकारी संपत्ति को सक्षम अनुमति और निर्धारित प्रक्रिया के बिना बेचा गया, तो जिम्मेदारी तय करने के साथ-साथ लकड़ी की वास्तविक कीमत, बिक्री से प्राप्त राशि और उसके उपयोग अथवा जमा होने का पूरा हिसाब भी सामने लाया जाना चाहिए।
अब निगाहें जांच पर—सवालों के जवाब दस्तावेजों से मिलेंगे
लोहरसी स्थित रेशम विभाग की नर्सरी से जुड़ी लकड़ी की कथित नीलामी ने पंचायत और विभागीय संपत्ति के प्रबंधन को लेकर कई सवाल खड़े कर दिए हैं। पूर्व में उठाए गए हिसाब-किताब के सवाल, नीलामी से पहले अधिकारियों को दी गई सूचना, कथित नीलामी प्रक्रिया, सरपंच की भूमिका और बिक्री राशि—इन सभी बिंदुओं पर पारदर्शिता जरूरी है।
अब देखना यह होगा कि संबंधित विभाग इन सवालों की जांच कर वास्तविक स्थिति सामने लाता है या मामला विभागीय फाइलों तक ही सीमित रह जाता है। फिलहाल पूरे मामले में नीलामी के आदेश, मूल्यांकन रिपोर्ट, पंचनामा, बोली/नीलामी प्रक्रिया, बिक्री रसीद और राशि जमा होने के रिकॉर्ड सबसे अहम दस्तावेज माने जा रहे हैं।





