आंगनबाड़ी कार्यकर्ता बनने के बाद भी नहीं छोड़ी शिक्षा, अब भी जारी है उच्च अध्ययन
छुरा (गंगा प्रकाश)। गरियाबंद जिले के छुरा विकासखंड मुख्यालय से लगभग 12 किलोमीटर दूर स्थित ग्राम पंचायत सेमहरा के आश्रित ग्राम छत्तरपुर से एक ऐसी प्रेरणादायक कहानी निकलकर सामने आई है, जो संघर्ष, मेहनत और शिक्षा के महत्व को बयां करती है। यह कहानी है विशेष पिछड़ी जनजाति कमार समाज की बेटी सावित्री कमार की, जिसने अभावों और कठिन परिस्थितियों के बावजूद अपने सपनों को जीवित रखा और शिक्षा के बल पर अपनी अलग पहचान बनाई।

सावित्री कमार के पिता स्वर्गीय पाताल सिंह का निधन वर्षों पहले हो गया था। पिता की छाया सिर से उठने के बाद परिवार की जिम्मेदारी उनकी मां के कंधों पर आ गई। आर्थिक स्थिति कमजोर होने के बावजूद उनकी मां ने मेहनत-मजदूरी कर अपनी बेटियों की पढ़ाई जारी रखी और उन्हें आत्मनिर्भर बनाने का संकल्प लिया।
आज सावित्री आंगनबाड़ी कार्यकर्ता के पद पर कार्यरत हैं। उन्होंने बीकॉम की पढ़ाई पूरी कर ली है और वर्तमान में बीए की पढ़ाई कर रही हैं। नौकरी और पढ़ाई दोनों को साथ लेकर चलना उनके लिए आसान नहीं है, लेकिन शिक्षा के प्रति उनके समर्पण ने उन्हें लगातार आगे बढ़ने की प्रेरणा दी है।
मां-बाप चले गए, पर बेटियों ने हार नहीं मानी… और सिस्टम ने मुड़कर भी नहीं देखा!
सावित्री की मां बताती हैं कि उन्होंने हमेशा अपनी बेटी को पढ़ा-लिखाकर बड़ा मुकाम हासिल करते देखने का सपना देखा है। उनका कहना है कि गरीबी और संसाधनों की कमी के बावजूद उन्होंने कभी अपनी बच्चियों की पढ़ाई नहीं रुकने दी। उन्हें उम्मीद है कि सावित्री आगे चलकर किसी बड़े पद पर पहुंचेगी और अपने परिवार के साथ-साथ समाज का भी नाम रोशन करेगी।

ग्रामीणों का कहना है कि सावित्री की सफलता कमार समाज की बेटियों के लिए प्रेरणा का स्रोत है। जिस क्षेत्र में आज भी कई परिवार आर्थिक तंगी के कारण बच्चों की पढ़ाई पूरी नहीं करवा पाते, वहां सावित्री ने यह साबित कर दिया है कि दृढ़ इच्छाशक्ति और मेहनत के बल पर हर बाधा को पार किया जा सकता है।
उठ रहे सवाल
सावित्री की कहानी यह भी सवाल खड़ा करती है कि विशेष पिछड़ी जनजातियों के मेधावी और संघर्षशील युवाओं को आगे बढ़ाने के लिए सरकारी स्तर पर और अधिक प्रभावी प्रयास क्यों नहीं किए जा रहे हैं। यदि ऐसे प्रतिभाशाली युवाओं को उचित मार्गदर्शन, छात्रवृत्ति और प्रतिस्पर्धी परीक्षाओं की तैयारी के अवसर मिलें, तो वे समाज और क्षेत्र का नाम राष्ट्रीय स्तर तक रोशन कर सकते हैं।
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छत्तरपुर की यह बेटी आज साबित कर रही है कि हौसले बुलंद हों तो गरीबी, अभाव और विपरीत परिस्थितियां भी सफलता का रास्ता नहीं रोक सकतीं। मजदूर मां की मेहनत और बेटी के जज्बे की यह कहानी क्षेत्र के लिए गर्व का विषय बन गई है।





