आलेख : बादल सरोज

मुहावरे जिस तरह बनते हैं, उस तर्ज पर यदि आने वाले दिनों में “मर्ज का हद से गुजरना है मोदी का जी-20 हो जाना” जैसा कोई मुहावरा आम हो जाए तो ताज्जुब नहीं होगा। अंतर्राष्ट्रीय नजरिये से एक महत्वपूर्ण आयोजन – जी-20 – के 18वें सम्मेलन को जिस फूहड़ तरीके से “मोदी नाम पै शुरू, मोदी नाम पै ख़तम” के मनोरंजन मेले – कार्निवाल –  में बदला गया, वह हर लिहाज से असामान्य और असाधारण है। सिर्फ दिल्ली में ही नहीं, पूरे देश में ‘जित देखो तित मोदी’ के पोस्टर्स थे, हर होर्डिंग पर वे ही वे थे, हर अखबार में पूरे-पूरे पन्नों के विज्ञापनों में भी वे ही थे, चैनलों की खबरों में मोदी, छोटे-बड़े-मंझोले भाजपाईयों की बाईट्स में मोदी, सारी हाईलाइट्स में मोदी ही मोदी थे। मौजूदा राज, जो इसके प्रधानमंत्री मोदी के प्रचार और खुद उनके द्वारा किये जाने वाले आत्मप्रचार के लिए इतिहास में रिकॉर्ड तोड़क के रूप में जाना जाएगा, उसके हिसाब से भी इस बार कुछ ज्यादा ही अधिक था। जुगुप्सा जगाने वाली आत्मकेंद्रितता थी, भारतीयों को लज्जित कर देने वाली आत्ममुग्धता थी।

गौरतलब है कि अध्यक्षी का मिलना कोई असाधारण घटना नहीं थी। जी-20 में बारी-बारी से सदस्य देशों में से किसी एक को, सम्मेलन जिस देश में होना है उसके राष्ट्रप्रमुख को, अध्यक्ष बनाए जाने की  प्रथा है। इसका पिछ्ला सम्मेलन इंडोनेशिया के बाली में हुआ था। वहां के राष्ट्रपति जोको विडोडो ने इसकी अध्यक्षता की। इसमें अगले सम्मेलन की जगह दिल्ली तय हुयी और 1 दिसंबर 2022 से 30 नवंबर 2023 तक के लिए भारत के प्रधानमंत्री को इसका अध्यक्ष बनाया गया। अब 2024 का सम्मेलन ब्राजील में होना है, लिहाजा 1 दिसंबर 2023  से इसके अध्यक्ष ब्राजील के राष्ट्रपति लूला डी सिल्वा होंगे। इस तरह यह एक सामान्य परिपाटी है, आम बात है, होती रहती है, हर साल होती है। मगर जी-20 की साल भर की अध्यक्षी को भारत में पिछली साल से धुआंधार तरीके से कुछ इस तरह प्रचारित करना शुरू किया गया कि जैसे यह कोई सामान्य प्रथा नहीं है, बल्कि पूरी दुनिया द्वारा मोदी को अपना नेता मान लिया जाना है। सम्मेलन के आयोजन के समय तो जैसे सारी सीमाएं ही लांघ दी गयीं। यह हल्दी की गाँठ मिलने पर पंसारी की दूकान खोल लेने जैसा आभासीय महानता की आड़ में छुपाया जा रहा बौनापन ही है। भारत के सिवा दुनिया के ज्यादातर मीडिया और राजनीतिक समीक्षकों ने इसे इसी तरह लिया भी और मखौल भी उड़ाया।  

कहने को तो जी-20 दो दिनों की शिखर वार्ता के अलावा हाल के कुछ वर्षों से अनेक विषयों पर अलग-अलग सत्र भी आयोजित करने लगा है, मगर मूल रूप से यह रईस देशों की खुद उनकी करतूतों से पैदा हुयी मुश्किलों का, बाकी दुनिया की कीमत पर हल ढूँढने और अपनी नीतियों में ही अन्तर्निहित दुर्बलता की शिलाजीत तलाशने के मंच के रूप में अस्तित्व में आया था। आज इसमें शामिल 19 देश और 20 वां सदस्य यूरोपीय यूनियन भले दुनिया की 85 प्रतिशत जीडीपी और 75 प्रतिशत बाजार का प्रतिनिधित्व करते हैं, मगर 2007 में इसकी स्थापना सात देशों के समूह – जी 7 – के रूप में तब हुयी थी, जब तेल उत्पादक देशों ने इस्राईल का समर्थन करने वाले देशों को तेल न बेचने का निर्णय लिया था और इन बड़े देशों के लिए तेल संकट पैदा हो गया था।  अनेक वर्षों तक यह इन 7 देशों  का समूह रहा। कुछ साल बाद 2007 में पूरी दुनिया पर आर्थिक मंदी का साया मंडरा रहा था, 2008 में तो अमरीका का भट्टा ही बैठ गया ; ऐसे में जी-20 के स्तर को और ऊपर उठाया गया। इसे वित्त मंत्रियों से ऊपर उठाकर राष्ट्र प्रमुखों  का शिखर सम्मेलन बना दिया गया। तब से इसकी बैठक में सदस्य देशों के राष्ट्राध्यक्ष हिस्सा लेने लगे। इस समूह में 19 देश, अर्जेंटीना, ऑस्ट्रेलिया, ब्राजील, कनाडा, चीन, फ़्रांस, जर्मनी, भारत, इंडोनेशिया, इटली, जापान, रिपब्लिक ऑफ़ कोरिया, मेक्सिको, रूस, सऊदी अरब, दक्षिण अफ्रीका,  तुर्की (अब तुर्किए) , ब्रिटेन और अमेरिका शामिल हैं। इसके साथ ही इस ग्रुप का 20वां सदस्य है यूरोपियन यूनियन, यानी यूरोप के देशों का समूह। इस बार अफ्रीकी देशों के संगठन अफ्रीकन यूनियन को भी शामिल कर लिया गया है।   

जी-20 की अब तक की बैठकें अमरीका के अलावा ब्रिटेन, कनाडा, फ्रांस, मैक्सिको, रूस, ऑस्ट्रेलिया, तुर्की, चीन, जर्मनी, अर्जेंटीना, जापान, सऊदी अरब, इटली, इंडोनेशिया में हुईं – इन बैठकों के अध्यक्ष इन देशों के राष्ट्र प्रमुख रहने की वजह से वे विश्व के नेता तो नहीं ही बन गए ; मगर मोदी है, तो मुमकिन हैं। यहाँ बैठक का होना भर ही मोदी का – भारत का नहीं, मोदी का – विश्व का नेता बन जाना है। हालांकि उनकी सरकार की अमरीका-पिछलग्गू विदेश नीति के चलते दुनिया में भारत की हालत कहाँ आ पहुंची है, इसे पिछले महीने दक्षिण अफ्रीका में हुए ब्रिक्स शिखर सम्मेलन ने जाहिर-उजागर करके सबको  बता दिया है।  

इस तरह के अन्तर्राष्ट्रीय समावेश, खासतौर से जब इतने सारे राष्ट्रों के प्रमुख उसमें शामिल होने वाले हों, आयोजक देश ही नहीं, दुनिया भर के लिए दिलचस्पी का विषय होते हैं। यह अवसर होता है, जब दुनिया की मानवता के समक्ष मौजूद चुनौतियों, परेशानियों के बारे में चर्चा हो,  इन सम्मेलनों के एजेंडे पर बहस हो, अलग-अलग नजरियों के बारे में जनता की जानकारी समृद्ध की जाए, धनी साम्राज्यवादी देशों द्वारा इन सम्मेलनों को अपनी स्वार्थ पूर्ति का माध्यम बनाए जाने के विरुद्ध राष्ट्रीय हितों की सुरक्षा और कमजोर देशों के विकास में सहायक बनने वाली नीतियों के पक्ष में माहौल बनाया जाए। मगर इधर न ऐसा कुछ हुआ, न ऐसा करने की कोशिश ही की गयी। जब पूरी सरकार और देश के मीडिया को इस बारे में गहन चर्चा करनी और करानी चाहिए थी, तब खुद मोदी अपने लोगों को ऐसा न होने देने के काम पर लगा रहे थे। जी-20 के ठीक एक दिन पहले स्वयं प्रधानमंत्री मोदी अपने मंत्रियों को सनातन धर्म की रक्षा में बोलने, अभियान छेड़ने का टास्क दे रहे थे। इंडिया की जगह भारत करने, जो पहले से ही इंडिया दैट इज भारत और हिंदी में भारत दैट इज इंडिया है, की निरर्थक बहस उकसाकर इस मौके को भी छद्म राष्ट्रवाद भड़काने के लिए इस्तेमाल किया जा रहा था। एक तरफ अशोक मोदी जैसे अर्थशास्त्री और विशेषज्ञ मोदी सरकार द्वारा की जा रही आंकड़ों की बाजीगरी का भांडा फोड़ रहे थे, गरीबी और बदहाली, खासतौर से भारत में बढ़ती बेरोजगारी और रोजगारहीनता की असलियत उजागर कर रहे थे, दूसरी तरफ सिर्फ मोदी के प्रचार के लिए 4100 करोड़ रूपये से ज्यादा अकेले दिल्ली में फूंके जा रहे थे। राजधानी के आम नागरिकों पर  कोरोना जैसा लॉकडाउन थोपा जा रहा था। दिल्ली के हजारों दिहाड़ी मजदूरों से उनके सप्ताह-दस दिन की रोजी-रोटी छीनी जा रही थी और दुनिया के नेताओं को बेवक़ूफ़ समझते हुए गरीब बस्तियों को परदे में ढांपकर खुद को ज्यादा चतुर समझने की नासमझी दिखाई जा रही थी। इतने पर भी सब्र नही हुआ, तो  फूहड़ता की सारी हदें तोड़ते हुए जी-20 के अतिथियों को सोने और चांदी की थाली में खाना खिलाया भी और उसे भारत की महान संस्कृति बताते हुए प्रचार भी किया।   

इस सबके बाद भी खुद की सीमित क्षमताओं और असीमित नाकाबिलियत के उजागर होने का भय इतना था कि दुनिया भर के मीडिया को बातचीत करने से रोका गया। यह पहला सम्मेलन था, जिसके समापन पर साझी प्रेस कॉन्फ्रेंस नहीं हुई। सम्मेलन के बीच हुयी द्विपक्षीय वार्ताओं के वक्तव्य जारी करने के लिए भी मीडिया के सामने नहीं आया गया। इतना ही नहीं, अमरीकी राष्ट्रपति बाइडेन के संग आये मीडिया और खुद  बाइडेन को भी प्रेस से बात नहीं करने दी गयी ; क्योंकि यदि वे प्रेस से मुखातिब होते, तो अध्यक्ष होने के नाते मोदी को भी उनके साथ रहना पड़ता। और मोदी देसी प्रेस-मीडिया से डरते हैं, सो दुनिया भर के मीडिया के सामने आने से बड़ा कोई और दु:स्वप्न उनके लिए हो ही नहीं सकता था। अभी कुछ महीने पहले ही वे व्हाईट हाउस में इसका अनुभव लेकर लौटे हैं और उस सदमे से  अभी तक उबरे नहीं हैं। मीडिया को रोके जाने के इस रवैये की दुनिया भर में थू-थू हुयी है। पहले से ही प्रेस स्वतंत्रता के मामले में दुनिया के 180 देशों में 2022 में भारत 150 वे, 2023 में 161 वे स्थान पर था। उसके अगले वर्ष और रसातल में जाने के लिए खुद मोदी सरकार ने ठोस प्रमाण उपलब्ध करा दिए हैं। बेचारी अमरीकी कॉरपोरेट  प्रेस के लिए भी यह विडंबना की बात हो गयी कि उनके नए सहयोगी और प्रिय दोस्त के यहाँ जो पत्रकार वार्ता नहीं होने दी जा रही थी, वह उस वियतनाम में जाकर करना पड़ी, जिसके कम्युनिस्ट शासकों की कथित तानाशाही को कोसते-कोसते झूठ के पहाड़ खड़े किये जाते रहे हैं। वियतनाम में की गई प्रेस कांफ्रेंस में बाइडेन ने तो जैसे मोदी की अगुआई वाली सरकार की सार्वजनिक निंदा ही कर दी, जब उन्होंने कहा कि “जैसा कि मैं मोदी के साथ हमेशा करता रहता हूँ, (वैसा ही इस बार भी किया) मैंने पी एम मोदी के साथ मानवाधिकारों के सम्मान और एक मजबूत और समृद्ध देश के निर्माण में नागरिक समाज और स्वतंत्र प्रेस की महत्वपूर्ण भूमिका के महत्त्व को इस बार भी उठाया है। एक तीसरे देश में किसी दूसरे देश के राष्ट्रपति द्वारा की गयी इस आलोचनात्मक टिपण्णी पर इन पंक्तियों के लिखे जाने तक मोदी सरकार की तरफ से कोई शब्द नहीं बोला गया है। बाइडेन जो बोले, सो बाहर जाकर बोले ; तुर्किये के राष्ट्रपति एर्दोगान तो भारत में ही सुना गए और बोल गए कि “जब मुसलमान अल्पसंख्यकों पर अत्याचार होते हैं, तब वादे, बड़े लोकतंत्र वाले देश और मानवाधिकार संगठन तीन बन्दर बन जाते हैं। एर्दोगान यहीं तक नहीं रुके, वे धमका भी गए । 

वैसे यह भारत में हुआ कोई पहला अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलन नहीं था, इससे पहले अनेकों हुए हैं। बुश – ओबामा – ट्रम्प – बाइडेन के संयुक्त राज्य अमरीका को अपना तीर्थ और पुण्यभूमि मानने की हद तक जा पहुंचे मोदी जिस नाम – गुटनिरपेक्ष आन्दोलन – का नाम तक भूल गए हैं, 1983 में उस नाम का एक ऐतिहासिक अधिवेशन इसी दिल्ली में हुआ था। इसमें 99 सदस्य और 27 अतिथि देशों यानि 126 देशों के राष्ट्रप्रमुख शामिल हुए थे। इनके अलावा 15 अंतर्राष्ट्रीय संगठनों के शीर्षस्थ प्रमुख भी थे। तीन-चौथाई से ज्यादा दुनिया दिल्ली में थी। अंतर्राष्ट्रीय जगत में भारत की गुटनिरपेक्षता की नीति की स्वीकार्यता का यह महत्वपूर्ण समय था। मगर उसमें भी इंडिया और भारत केंद्र में था – नेता-नेतानी नहीं थे। जबकि इस बार थे, बल्कि वे ही वे थे। इसकी वजह भारत के लोगों को तो पहले से ही पता थी, इस जी-20 के समय दिल्ली में जमा हुए विश्व मीडिया ने भी ढूढ़ ही ली ; दुनिया भर के मीडिया ने छापा – दिखाया कि किस तरह मोदी ने हर साल होने वाले इस सम्मेलन को अपनी व्यक्तिगत लोकप्रियता तथा पार्टी के चुनाव प्रचार के लिए इस्तेमाल किया है।  दिल्ली के अलावा देश के 58 शहरों में बिखरा – फैला कर किये गए इस सम्मेलन के आयोजनों और इस बहाने मोदी के महिमामंडन का एकमात्र मकसद इसी साल कुछ राज्यों और अगली साल के पूर्वार्ध में होने वाले लोकसभा चुनावों के प्रचार का शंखनाद करना था। यही वजह थी कि सारी परम्पराएं तोड़कर राज्यसभा में विपक्ष के नेता सहित बाकी विपक्षी दलों के नेताओं को राष्ट्रपति भवन के औपचारिक रात्रिभोज में न्यौता तक नहीं भेजा गया।  

इसी की निरंतरता में है 18 सितम्बर से होने वाला संसद का विशेष सत्र, जिसे बुलाने या उसका एजेंडा तय करने के लिए बाकी सभी दलों से पूर्व मंत्रणा करने की संसदीय लोकतंत्र की पूर्व शर्त पर अमल करना तो दूर रहा, इन पंक्तियों के लिखे जाने तक देश को भी नहीं बताया गया कि इसमें आखिर होना क्या है। ज्यादा आशंका इसी बात की है कि इसमें मोदी के यश गान की अहो रूपं अहो ध्वनि का वृन्दगान होगा और नफरती उन्माद को भड़काने के लिए किसी नयी साजिश को मूर्त रूप दिया जाएगा। इतिहास की विडम्बना का चरम तब होता है, जब चुटकुले सच बन जाते हैं, विदूषकी एक  सामान्य बर्ताव के रूप में स्थापित हो जाती है और सहज और सामान्य होना, असामान्य और असहज होना करार दिया जाने लगता है। यह ऐसा ही समय है।  

मगर राह उतनी आसान नहीं है, जितना राज और उसके चाकर मान बैठे हैं। यह पब्लिक है, जो सब जानती है और अपने विरोध को दर्ज कर लेने का कोई-न-कोई रास्ता चुन ही लेती है। आत्म-प्रचार और आत्मालाप की पराकाष्ठा के बीच महज सवा दो मिनट के एकालाप के चलते शाहरुख खान की अन्यथा कमर्शियल फिल्म जवान का कामयाबी का रिकॉर्ड कायम कर लेना इसकी मिसाल है। जनता के वास्तविक मुद्दे अब देश के राजनीतिक मुद्दे बनने लगे हैं, बात निकली है, तो नवम्बर के कुछ राज्यों के विधानसभा चुनावों तक ही नहीं, 2024 के लोकसभा चुनावों तक भी जायेगी। यही डर है, जो उन्हें सबसे ज्यादा सता रहा है।


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