रायपुर/बिलासपुर(गंगा प्रकाश )। छत्तीसगढ़ के कोनी में 200 करोड़ रुपए की लागत से 11 मंजिला सबसे बड़े और मल्टीस्पेशलिटी सरकारी अस्पताल “सिम्स बिलासपुर” में स्वास्थ्य सुविधाएं वेंटीलेटर पर हैं। इसका कारण जानकर आप हैरान हो जाएंगे। दरअसल, इस अस्पताल के ICU में लगे लगभग 42 एसी इन दिनों ठप्प पड़े हैं। बताते हैं कि चोरों ने एसी यूनिट पर हाथ साफ किया है। इसके चलते एकसाथ लगभग सभी 42 एसी ठप्प हो गए हैं। चोर तमाम एसी के कॉपर वायर ले उड़े है। घटना उस वक्त हुई जब 24×7 मेडिकल स्टाफ डॉक्टर, नर्स, मरीज और उनके परिजनों की ICU में नियमित आवाजाही होती है। यही नहीं अस्पताल परिसर में चौबीसों घंटे निजी सुरक्षा कंपनी के गार्ड तैनात रहते हैं।

बताया जाता है कि एकसाथ दर्जनों एसी ठप्प होने के बावजूद सिम्स प्रशासन ने ना तो मरीजों की सुध ली और ना ही चोरी का पता लगाने के लिए कोई कानूनी कदम उठाए। मामले के संज्ञान में आने के बाद जिला प्रशासन ने चोरों के खिलाफ F.I.R. दर्ज कराने के निर्देश दिए हैं। जानकारी के मुताबिक राज्य के सबसे बड़े अस्पतालों में से एक सिम्स बिलासपुर में मरीजों का बुरा हाल है। भारी गर्मी और वेंटिलेशन की कमी के चलते ICU में भर्ती दर्जनों मरीज हलाकान हो रहे हैं।

भीषण गर्मी के चलते उनका बुरा हाल है। यही हालत उन डॉक्टरों और पैरामेडिकल स्टाफ की है, जिनकी ड्यूटी ICU में लगी है। बताया जाता है कि लगभग दो हफ्ते पहले चोरों ने कई एसी के कॉपर वायर पर हाथ साफ कर दिया था। लेकिन सिम्स प्रशासन हाथ पर हाथ धरे बैठा रहा। उसने ना तो चोरी की घटना को लेकर कोई वैधानिक कदम उठाए और ना ही स्वास्थ्य सेवाओं की बहाली में कोई दिलचस्पी दिखाई। नतीजतन कई मरीजों और उनके परिजनों ने निजी अस्पतालों का रुख कर लिया।

यह भी बताया जाता है कि पीड़ितो के बवाल मचाने के बाद स्थानीय जिला प्रशासन ने घटना की जांच के निर्देश दिए हैं। अस्पताल में तैनात निजी सुरक्षा एजेंसी के खिलाफ F.I.R. भी दर्ज कराई गई है। हालात का जायजा लेने कलेक्टर अवनीश शरण ने खुद सिम्स का दौरा किया है। उन्होंने फौरन 18 एसी के मरम्मत के निर्देश दिए हैं।

सूत्रों के मुताबिक एकसाथ इतने अधिक एसी के ठप्प हो जाने के बावजूद सिम्स प्रशासन ने समय रहते वैधानिक कदम क्यों नही उठाए ? चर्चा का विषय बना हुआ है। पीड़ितो के मुताबिक लगभग दो हफ्ते से सिम्स प्रशासन इस घटना को लेकर चुप्पी साधे रहा। आखिरकर पीड़ितो ने कलेक्टर को अपनी समस्याओं से रूबरू कराया। बताया जाता है कि मामला संज्ञान में आते ही जिला प्रशासन ने सिम्स प्रबंधन को जमकर फटकार लगाई है।

बिलासपुर कलेक्टर ने सिम्स अस्पताल में लगे एसी के कॉपर वायर चोरी होने की घटना को गंभीरता से लिया है। अस्पताल की सुरक्षा एजेंसी बुंदेला सर्विसेस के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज करवाई गयी है। कलेक्टर ने सभी 18 एसी के अविलंब मरम्मत के निर्देश दिए हैं। हालाकि कई पीड़ित तस्दीक कर रहे हैं कि लगभग 42 एसी पर हाथ साफ किया गया है। कलेक्टर अवनीश शरण ने आज सुबह सिम्स अस्पताल का औचक निरीक्षण किया।कलेक्टर ने अस्पताल में घूम-घूमकर व्यवस्थाएं देखी। पीडब्ल्यूडी द्वारा बनाये जा रहे टॉयलेट को हर हाल में इस महीने की 25 तारीख तक पूरा करने के निर्देश दिए गए।

सुविधा मिलने का था दावा

न्यूरो सर्जरी, कार्डियोलाजी सहित अन्य सुविधा सुपर स्पेशलिटी हास्पिटल में न्यूरो सर्जरी, कार्डियोलाजी, सर्जरी, पिडियाट्रिक सर्जरी, न्यूरोलाजी व अन्य इलाज की सुविधा रहेगी। इस अस्पताल के बनने के बाद कम खर्च में अधिक सुविधा मिलेगी। एक ही परिसर में सब कुछ रहेगा। कोनी में शासन ने सिम्स को 50 एकड़ जमीन दी है। इसमें से 40 एकड़ जमीन पर सुपर स्पेशलिटी व अन्य जरूरी यूनिट रहेंगी। कोनी में सुपर स्पेशलिटी हास्पिटल के अलावा डाक्टरों और स्टाफ के रहने के लिए भवन बनाने का भी प्रस्ताव है। हालांकि अभी तक ये बनना शुरू नहीं हुआ है। इसके अलावा आने वाले साल में स्टेट कैंसर यूनिट को भी शुरू कर दिया जाएगा। इसके बाद इस हास्पिटल में तमाम तरह के कैंसर का इलाज संभव हो सकेगा, जो क्षेत्र के लिए बड़ी चिकित्सकीय सुविधा साबित होगी।किंतु आज सिम्स ही लाचार और बीमार हैं।

सरकारी अस्पतालों में सुविधाओं का अकाल


देश व प्रदेश की सरकारें सदैव बेहतर स्वास्थ्य सुविधाएं देने का दम तो भरती हैं लेकिन ऐसा हो पाने के लिए अभी काफी लम्बे समय का इंतजार करना पड़ेगा। सरकारी क्षेत्र में यदि अस्पतालों में पूरी स्वास्थ्य सुविधाएं मिलें तो लोगों को निजी अस्पतालों का रुख करने की आवश्यकता ही नहीं होगी। यूं तो सरकारों की तरफ से गांव-गांव में प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र, फिर सामूहिक, स्वास्थ्य केंद्र, फिर सिविल अस्पताल के साथ जिला स्तर पर भी बड़े अस्पताल बनाए गए हैं लेकिन वहां यदि देखा जाए तो कहीं पी.एच.सी. में डाक्टर नहीं केवल फार्मासिस्ट के सहारे काम चल रहा है। कहीं सिविल अस्पताल में लैबोरेट्री है तो टैक्नीशियन नहीं। कहीं एक्सरे मशीन है तो उसे चलाने वाला आप्रेटर नहीं। यहां तक कि बड़े जिला स्तरीय अस्पतालों में भी पूरे टैस्टों की सुविधा नहीं है। अल्ट्रासाऊंड आदि का भी प्रावधान नहीं है। आपरेशन थिएटर बढिय़ा हैं तो सर्जनों की कमी है। किन्हीं जिला मुख्यालयों पर तो विशेषज्ञ डाक्टर एवं सर्जनों की भरमार है तो कई जिला मुख्यालयों पर कई विशेषज्ञ नहीं हैं। कहीं आप्रेशन थिएटर भी हैं, सर्जन भी हैं तो एनैस्थीसिया देने वाला डाक्टर नहीं है। कुल मिलाकर ऐसी हालत में मरीजों को फिर निजी अस्पतालों में मजबूरन जाना पड़ता है। वहां महंगे इलाज करवाने के लिए मजबूर होना पड़ता है। सरकारी अस्पताल में जाकर भी मरीजों को बाहर से टैस्ट करवाना, एक्सरे व अल्ट्रासाऊंड इत्यादि करवाने पड़ते हैं। इससे बेहतर लोग अब सीधे ही निजी अस्पतालों में जाने लगे हैं क्योंकि वहां भले ही अधिक पैसा खर्च होगा लेकिन सारा काम एक ही छत के नीचे हो जाएगा। सरकार द्वारा बनाए गए हिमकेयर कार्ड या आयुष्मान कार्ड इत्यादि का लाभ भी लोगों को सरकारी अस्पतालों के साथ-साथ निजी अस्पतालों में बाकायदा मिल रहा है। इन सभी के बीच भले ही सरकारी डाक्टर हो या प्राइवेट, इलाज के दौरान मरीज गंभीर हो जाए या उसकी मृत्यु हो जाए तो उसका सारा जिम्मा डाक्टरों के ऊपर आ जाता है। ऐसे में कई बार डाक्टरों को लोगों की खरी-खोटी सुनने के साथ-साथ कई तरह की प्रताडऩा भी झेलनी पड़ती है। ऐसे आतंक के माहौल में डाक्टर कैसे इलाज कर पाएंगे। एमरजैंसी में आए मरीज को जिंदगी व मौत के बीच जूझते हुए देख डाक्टर का मन उसका इलाज करने को तो करता है लेकिन इलाज के दौरान कुछ ऐसा-वैसा हो जाने के डर से अब एमरजैंसी में डाक्टर मरीज को देखकर इलाज करने से कतराने लगे हैं। सरकारी अस्पतालों में डाक्टर मरीज का चैकअप कर उसका इलाज न हो पाने की स्थिति में पी.जी.आई. आदि बड़े संस्थान में रैफर कर देते हैं। पिछले कुछ समय से ऐसे कई मामले सामने आए हैं जिनमें डाक्टरों को ऐसी हालत का सामना करते हुए भारी मानसिक एवं आर्थिक हानि उठानी पड़ी है। ऐसा प्राइवेट डाक्टरों के साथ ही नहीं बल्कि सरकारी डाक्टरों के साथ भी होता है। अनेक सरकारी डाक्टरों पर लोगों द्वारा अपने काम में कोताही के मामले दर्ज करवाए गए हैं जिनमें अधिकांश मामले स्त्री रोग विशेषज्ञ या जनरल सर्जनों के देखने में आए हैं। लगभग एक दशक पूर्व किसी मामले को लेकर एक निजी अस्पताल में दिन-दिहाड़े कुछ लोगों द्वारा डाक्टर के साथ मारपीट की गई, उसके अस्पताल की इतनी बुरी तरह से तोड़-फोड़ की गई कि उसे ठीक करवाते समय अस्पताल का नक्शा तक बदलना पड़ गया।

वहीं इतने बड़े सीनियर डाक्टर को देर रात्रि तक पुलिस की प्रताडऩा का शिकार होना पड़ा। सालों से यह मामला अदालतों में चल रहा है। इसी तरह से सरकारी डाक्टरों को भी कुछ ऐसी ही दशा से कई बार गुजरना पड़ता है। ऐसे मामलों से तंग आकर कई बार डाक्टर वी.आर.एस. तक ले लेते हैं। कई बार कई अस्पताल केवल धंधा एवं मुनाफा कमाने के लिए चलाए जा रहे होते हैं जिनमें सुविधाएं पूरी नहीं होतीं व मरीज की हालत बिगड़ जाने पर उससे निपटने का हल भी उनके पास नहीं होता। ऐसे में सरकार को निजी अस्पतालों की जांच-पड़ताल एवं निरीक्षण नियम एवं कायदे कानूनों के साथ-साथ समय पर करते रहना चाहिए। जो निजी अस्पताल मापदंड एवं सुविधाएं पूरी नहीं कर रहे उन पर कानून के तहत कार्रवाई होनी चाहिए।  वहीं इसे रोकने के लिए सरकारी अस्पतालों में पूरी सुविधाएं मिलें तो आम लोग निजी अस्पतालों का रुख न करके सरकारी अस्पतालों में जाने को प्राथमिकता देंगे।(साभार न्यूज़ टुडे छत्तीसगढ़)


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