“सुशासन तिहार बना दिव्यांग रमेश की ज़िंदगी का टर्निंग पॉइंट – मजदूरी मांगने गया, मेट बनकर लौटा!”

 

कोरबा/पोड़ी उपरोड़ा (गंगा प्रकाश)। छत्तीसगढ़ में मुख्यमंत्री विष्णु देव साय के नेतृत्व में चल रहे सुशासन तिहार 2025 ने एक बार फिर साबित कर दिया है कि जब सरकार संवेदनशील हो, तो बदलाव महज़ कागज़ों में नहीं, ज़मीन पर नज़र आता है। ऐसा ही एक प्रेरणादायक किस्सा सामने आया है पोड़ी उपरोड़ा जनपद के ग्राम अटारी से, जहां दिव्यांग रमेश कुमार मजदूरी के लिए जॉब कार्ड की मांग लेकर सुशासन शिविर में पहुंचा था — लेकिन लौटा तो मनरेगा मेट की जिम्मेदारी के साथ, आंखों में आत्मविश्वास और दिल में कृतज्ञता लिए।

मजदूरी नहीं, सम्मान मिला!

15 मई को सिरमिना में आयोजित जनसमस्या समाधान शिविर में रमेश कुमार ने जब जॉब कार्ड की मांग रखी, तो वहां मौजूद जनपद अधिकारियों ने उसकी समस्या को केवल सुना ही नहीं, बल्कि समझा भी। 12वीं पास रमेश की दिव्यांगता को बाधा नहीं, उसकी मेहनत की भूख को ताक़त समझा गया। अधिकारियों ने तुरंत उसे जॉब कार्ड प्रदान किया और उसके जज़्बे को देखते हुए मनरेगा में मेट की ज़िम्मेदारी भी सौंप दी।

मेट की जिम्मेदारी से छलकी खुशी

रमेश का कहना है, “मैं मजदूरी करके अपने परिवार का पेट पालना चाहता था, लेकिन सरकार ने मुझे जो जिम्मेदारी दी है, वह सिर्फ रोजगार नहीं, मेरे आत्मसम्मान और भविष्य की दिशा तय करने वाला फैसला है। यह मेरी जिंदगी का सबसे बड़ा मोड़ है।”

कभी ठोकरें खाई थीं, अब नेतृत्व करेगा

गांव के मजदूरों के बीच अब रमेश मेट के रूप में मनरेगा कार्यों का नेतृत्व करेगा। जो व्यक्ति अब तक काम मांगने जाता था, अब उसी के निर्देश पर काम होगा। उसकी यह उपलब्धि न सिर्फ उसके लिए, बल्कि पूरे गांव के लिए गर्व का विषय बन गई है।

सरकार की तत्परता ने रचा बदलाव

जनपद कार्यक्रम अधिकारी दिलीप कुमार मेहता ने बताया कि रमेश जैसे पात्र लोगों को जब सही समय पर सही मंच मिलता है, तो वे सिर्फ अपना नहीं, समाज का भी उत्थान करते हैं। “हमारा उद्देश्य है कि शासन की योजनाएं वंचितों तक पहुंचे और रमेश इसका जीवंत उदाहरण है।”

मुख्यमंत्री के अभियान का असर

सुशासन तिहार 2025 का आयोजन 8 अप्रैल से 31 मई तक तीन चरणों में हो रहा है, जिसमें शासन द्वारा जनसमस्याओं के त्वरित समाधान के लिए ग्राम पंचायत स्तर पर शिविर लगाए जा रहे हैं। मुख्यमंत्री विष्णु देव साय के निर्देश पर चल रहे इस अभियान का असर अब स्पष्ट रूप से नज़र आ रहा है।

रमेश ने जताया आभार, कहा — “मेरे जैसे लोगों को भी मिली आवाज़”

भावुक होते हुए रमेश ने कहा, “यह मेट की जिम्मेदारी नहीं, मेरे संघर्षों की जीत है। मैं मुख्यमंत्री, जनपद के अधिकारियों और पंचायत प्रतिनिधियों का आभार व्यक्त करता हूं, जिन्होंने मेरी आवाज़ सुनी और मुझे पहचान दी।”

यह सिर्फ रमेश की नहीं, सुशासन की जीत है!

दिव्यांग रमेश की यह कहानी बताती है कि सुशासन तब होता है जब व्यवस्था संवेदनशील हो, समाधान तत्पर हो और बदलाव ज़मीनी हो। आज रमेश जैसे कई लोगों के लिए यह तिहार सिर्फ एक सरकारी कार्यक्रम नहीं, उनके सपनों का सेतु बन चुका है।


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