डॉ. भूपेंद्र कुमार साहू, एसोसिएट प्रोफेसर राजनीति विज्ञान, आईएसबीएम विवि छुरा, की कलम से

लोकतंत्र की सबसे बड़ी खुबसूरती है कि इसके दो पक्ष होते हैं। एक सत्ता पक्ष और दूसरा विपक्ष। सत्ता पक्ष द्वारा किये गये जनविरोधी कार्यो का विरोध करना विपक्ष की महत्वपूर्ण जिम्मेदारी है। विपक्ष, सत्ता पक्ष का विरोध करके ही भविष्य में जनता का विश्वास प्राप्त सत्ता प्राप्त कर सकते हैं। पर ऐसा लगता है मानो भारत का विपक्ष सिर्फ विरोध ही करेगा,चाहे मुद्दा कोई भी हो। नये संसद भवन का उद्घाटन का बहिष्कार कही से भी उचित नहीं है। नये संसद भवन के उद्घाटन समारोह में विपक्षी नेताओं का शामिल होना नहीं होना उनके विवेक पर निर्भर करता है। लेकिन नये संसद भवन का उद्घाटन राष्ट्रपति के हाथों से नहीं होने से लोकतंत्र कमजोर होगा, समझ से परे है। सभी जानते हैं कि राष्ट्रपति संवैधानिक प्रमुख हैं, प्रधानमंत्री वास्तविक कार्यपालिका प्रमुख हैं। संसद भवन का निर्माण सरकार द्वारा किया गया है, उसका उदघाटन प्रधानमंत्री करते हैं तो इसमें कोई बुराई नहीं है और न ही लोकतंत्र की हत्या हो रही है। दरअसल विपक्ष को नये संसद भवन के उद्घाटन की तिथि से आपत्ति हो सकती है, 28 मई को वीर सावरकर जी की जयंती है। निश्चित रूप से कुछ विपक्षी नेताओं द्वारा समय-समय पर गाहे-बगाहे वीर सावरकर जी का विरोध करते हैं। नये संसद भवन का उद्घाटन और वीर सावरकर जी की जयंती भी है। स्वाभाविक रूप से वीर सावरकर जी की चर्चा भी होगी । विपक्ष इसी से बचना चाहता है, कुछ विपक्षी नेता सीधे तौर पर वीर सावरकर जी के विरोध से बचना चाहते हैं।असल विरोध तिथि को लेकर है न कि प्रधानमंत्री द्वारा नये संसद भवन के उद्घाटन से है। भारत की सेंट्रल विस्टा पुनर्विकास परियोजना के हिस्से के रूप में , एक नया संसद भवन वर्तमान में निर्माणाधीन है जो नई दिल्ली में है । एक बार पूरा हो जाने पर, यह भारत की संसद की सीट होगी , जो वर्तमान में संसद भवन में है , जो नए भवन के स्थल के ठीक सामने स्थित है।नए भवन का शिलान्यास समारोह अक्टूबर 2020 में आयोजित किया गया था। 10 दिसंबर 2020 को आधारशिला रखी गई थी।सेंट्रल विस्टा के रिडिजाइन के प्रभारी आर्किटेक्ट बिमल पटेल के मुताबिक , नए कॉम्प्लेक्स का आकार त्रिकोणीय होगा। यह मौजूदा कॉम्प्लेक्स के बगल में बनाया जाएगा और पहले वाले के लगभग बराबर होगा।
इमारत को 150 से अधिक वर्षों के जीवनकाल के लिए डिज़ाइन किया गया है। इसे भूकंप रोधी बनाया गया है और इसमें भारत के विभिन्न हिस्सों की स्थापत्य शैली शामिल होगी। लोकसभा और राज्यसभा के लिए प्रस्तावित कक्षों में वर्तमान में मौजूद सदस्यों की तुलना में अधिक सदस्यों को समायोजित करने के लिए बड़ी बैठने की क्षमता होगी, क्योंकि भारत की बढ़ती जनसंख्या और परिणामी भविष्य के परिसीमन के साथ सांसदों की संख्या बढ़ सकती है।
नए परिसर में लोकसभा कक्ष में 888 और राज्यसभा कक्ष में 384 सीटें होंगी। वर्तमान संसद भवन के विपरीत इसमें केंद्रीय कक्ष नहीं होगा। संयुक्त सत्र के मामले में लोकसभा कक्ष 1,272 सदस्यों को समायोजित करने में सक्षम होगा।शेष भवन में मंत्रियों के कार्यालयों और समिति कक्षों के साथ 4 मंजिलें होंगी इमारत का निर्माण क्षेत्र 20,866 मीटर 2 ( एक बरगद के पेड़ के लिए 2,000 मीटर 2 के खुले आकाश क्षेत्र सहित ) होगा, जो इसे 22,900 मीटर 2 (व्यास 170.7 मीटर) की मौजूदा पुरानी गोलाकार इमारत की तुलना में आकार में 10% छोटा बनाता है। ) 6,060 मीटर 2 या 1.5 एकड़ के अपने खुले आकाश क्षेत्र सहित , 3 सेक्टरों में प्रत्येक आधा एकड़ में विभाजित।
नए भवन में एक ‘सेंगोल’ भी होगा। यह तमिलनाडु चोल साम्राज्य का एक ऐतिहासिक राजदंड है, जो अंग्रेजों द्वारा पहले प्रधान मंत्री जवाहरलाल नेहरू को सत्ता हस्तांतरण का प्रतिनिधित्व करने के लिए दिया गया था और 28 मई को प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा उद्घाटन किए जाने वाले नए संसद भवन में स्थापित किया जाएगा। पुराने ढांचे के साथ स्थिरता संबंधी चिंताओं के कारण 2010 की शुरुआत में मौजूदा परिसर को बदलने के लिए एक नए संसद भवन के प्रस्ताव सामने आए।वर्तमान भवन के लिए कई विकल्पों का सुझाव देने के लिए एक समिति का गठन तत्कालीन अध्यक्ष मीरा कुमार ने 2012 में किया था। वर्तमान भवन, एक 93 वर्षीय संरचना, को घर के सदस्यों के लिए जगह की अपर्याप्तता से ग्रस्त माना जाता है और उनके कर्मचारी, और संरचनात्मक मुद्दों से पीड़ित माना जाता है। इसके बावजूद, इमारत को भारत की राष्ट्रीय विरासत के लिए महत्वपूर्ण माना जाता है, और संरचना की सुरक्षा के लिए योजनाएँ बनाई जा रही हैं। पुरानी संसद भवन भवन को ब्रिटिश वास्तुकार एड्विन लैंडसियर लूट्यन्स और सर हर्बर्ट बेकर द्वारा नियत किया गया था और इसका निर्माण 1921 और 1927 के बीच किया गया था। इसे जनवरी 1927 में शाही विधान परिषद की सीट के रूप में खोला गया था। भारत में ब्रिटिश शासन के अंत के बाद, इसे संविधान सभा ने अपने अधिकार में ले लिया, और फिर 1950 में भारत का संविधान लागू होने के बाद भारतीय संसद ने इसे अपने अधिकार में ले लिया। संसद भवन का निर्माण 1921-1927 के दौरान किया गया था। संसद भवन नई दिल्ली की बहुत ही शानदार भवनों में से एक है। यह विश्व के किसी भी देश में विद्यमान वास्तुकला का एक उत्कृष्ट नमूना है। इसकी तुलना विश्व के सर्वोत्तम विधान-भवनों के साथ की जा सकती है। यह एक विशाल वृत्ताकार भवन है। जिसका व्यास 560 फुट तथा जिसका घेरा 533 मीटर है। यह लगभग छह एकड़ क्षेत्र में फैला हुआ है। भवन के 12 दरवाजे हैं, जिनमें से पाँच के सामने द्वार मंडप बने हुए हैं। पहली मंजिल पर खुला बरामदा हल्के पीले रंग के 144 चित्ताकर्षक खंभों की कतार से सुसज्‍जित हैं। जिनकी प्रत्येक की ऊँचाई 27 फुट है। भले ही इसका डिजाइन विदेशी वास्‍तुकारों ने बनाया था किंतु इस भवन का निर्माण भारतीय सामग्री से तथा भारतीय श्रमिकों द्वारा किया गया था। तभी इसकी वास्‍तुकला पर भारतीय परंपराओं की गहरी छाप है। इस भवन का केंद्र बिंदु केंद्रीय कक्ष (सेंट्रल हाल) का विशाल वृत्ताकार ढांचा है। केंद्रीय कक्ष के गुबंद का व्यास 98 फुट तथा इसकी ऊँचाई 118 फुट है। विश्वास किया जाता है कि यह विश्व के बहुत शानदार गुबंदों में से एक है। भारत की संविधान सभा की बैठक (1946-49) इसी कक्ष में हुई थी। 1947 में अंग्रेजों से भारतीयों के हाथों में सत्ता का ऐतिहासिक हस्तांतरण भी इसी कक्ष में हुआ था। इस कक्ष का प्रयोग अब दोनों सदनों की संयुक्क्त बैठक के लिए तथा राष्‍ट्रपति और विशिष्‍ट अतिथियों-राज्‍य या शासनाध्‍यक्ष आदि के अभिभाषण के लिए किया जाता है। कक्ष राष्‍ट्रीय नेताओं के चित्रों से सज़ा हुआ है। केंद्रीय कक्ष के तीन ओर लोक सभा, राज्य सभा और ग्रंथालय के तीन कक्ष हैं। उनके बीच सुंदर बग़ीचा है जिसमें घनी हरी घास के लान तथा फव्‍वारे हैं। इन तीनों कक्षों के चारों ओर एक चार मंजिला वृत्ताकार इमारत बनी हुई है। इसमें मंत्रियों, संसदीय समितियों के सभापतियों और पार्टी के कार्यालय हैं। लोक सभा तथा राज्‍य सभा सचिवालयों के महत्‍वपूर्ण कार्यालय और संसदीय कार्य मंत्रालय के कार्यालय भी यहीं हैं।
पहली मंजिल पर चार समिति कक्षों का प्रयोग संसदीय समितियों की बैठकों के लिए किया जाता है। इसी मंजिल पर तीन अन्‍य कक्षों का प्रयोग संवाददाताओं द्वारा किया जाता है। संसद भवन के भूमि-तल पर गलियारे की बाहरी दीवार को अनेक भित्ति-चित्रों से सजाया गया है। जिनमें प्राचीन काल से भारत के इतिहास तथा पड़ोसी देशों के साथ भारत के सांस्‍कृतिक संबंधों को प्रदर्शित किया गया है।
लोक सभा कक्ष में, आधुनिक ध्‍वनि व्‍यवस्‍था है। दीर्घाओं में छोटे छोटे लाउडस्‍पीकर लगे हुए हैं। सदस्‍य माईक्रोफोन के पास आए बिना ही अपनी सीटों से बोल सकते हैं। लोक सभा कक्षा में स्‍वचालितमत-अभिलेखन उपकरण लगाए गए हैं। जिनके द्वारा सदस्‍य मतविभाजन होने की स्‍थिति में शीघ्रता के साथ अपने मत अभिलिखित कर सकते हैं।
राज्‍य सभा कक्ष लोक सभा कक्ष की भांति ही है। यह आकार में छोटा है। इसमें 250 सदस्‍यों के बैठने के लिए स्‍थान हैं। पुराने संसद भवन को देखने का अवसर मिला था, उम्मीद है बहुत जल्दी नये संसद भवन को देखने का अवसर मिलेगा।


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